सोमवार, 24 जुलाई 2017

।। स्मृतियों का स्पर्श ।।

'अकेलापन' पतझर की तरह
उड़ता फड़फड़ाता है ।

तुम्हारी तस्वीर से
उतरता है स्मृतियों का स्पर्श
देह मुलायम होने लगती है
तुम्हारी चाहत की तरह

तुम्हारे शब्द
सपनों की आँख हैं 
जिससे रचती हूँ भविष्य  

तुम्हारी हथेलियों ने
मेरी हथेली में
छोड़ा है    भावी रेखाओं का छापा
जैसे मेरे हृदय ने
तुम्हारे हृदय ने
छोड़ा है     अपनेपन का विस्मरणीय स्मृति चित्र
कि तुम्हारे प्राणों में मैं
अपने पूर्ण को देखती हूँ

तुम्हारी साँसों से
लेना चाहती हूँ     साँसों की शक्ति
जिससे मेरे भीतर
तुम्हारे सपने जी सकें
वैसे ही       जैसे चाहत से
गर्भ में मुझसे साँस ले रहा है शिशु

तुम्हारे नाम को
लिख रहा है
मेरे गर्भ की दीवारों में
और रक्त में सान रहा है
तुम्हारे बीज का रस सुगंध
जो प्रणय का प्रथम प्राण बीज है
तुम्हारे नाम का
मेरी देह भूमि को
मातृभूमि में तब्दील करते हुए ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

।। सूखी गंगा ।।



















मेरे ओंठ में
सूख गई है     नदी
अकेलेपन की रेत की
नदी है     ओंठ
दो बूँद की प्यास में
देह को तपाते हुए

अँधेरे में बदल चुकी आँखों में
काले हो चुके हैं     सपने
दिन की कोई रोशनी
कठफोड़वा की तरह
देह के तने में
नहीं बना पाती    कोटर
भावी प्रकाश शिशु के प्रसव के लिए

दुनिया की
मांसाहारी दृष्टि से थक चुकी आँखें
तुम्हारी आँखों की गोद में
सिर रखकर
तुम्हारी देह की नदी में डूब कर
नहाते हुए विश्राम करना चाहती है
अगली सदी तक

तुम्हारी आँखों के साथ के रास्ते से
दौड़ने के लिए
पहुँचने के लिए
अपने हृदय की तरह
तुम बनाए रखना चाहते हो
मेरा मन तन और समय

लाल स्याही की तरह
तुम्हारे ओठों ने भरी है
मेरे मन के पृष्ठों की माँग
जो मेरे तुम्हारे
संबंधों का
दस्तावेज है     ऐतिहासिक

प्रणय-कथाओं से परे
नवीन प्रणय का
आधार पृष्ठ
ईश्वरीय कानून का
घोषित दस्तावेज
मेरे-तुम्हारे शब्द । 

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

सोमवार, 17 जुलाई 2017

पुष्पिता अवस्थी सम्मानित हुईं


भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने हाल ही में आयोजित हुए एक भव्य तथा गरिमापूर्ण समारोह में पुष्पिता अवस्थी को 'पद्मभूषण डॉक्टर मोतुरी सत्यनारायण अवॉर्ड' से सम्मानित किया । 1989 में स्थापित केंद्रीय हिंदी संस्थान द्वारा वर्ष 2002 से हर वर्ष दिया जा रहा यह अवॉर्ड प्रतिष्ठित हिंदीसेवी सम्मान अवॉर्ड का एक हिस्सा है, जो दुनिया के विभिन्न देशों में हिंदी को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को दिया जाता है । भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा समर्थित इस अवॉर्ड की दुनिया भर में प्रतिष्ठा 'ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पॉयर' जैसी है । कानपुर में जन्मी, बनारस में पढ़ने और पढ़ाने वाली और अब नीदरलैंड में 'हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन' के निदेशक के रूप में हिंदी के पठन-पाठन की जिम्मेदारी निभा रहीं बहुमुखी प्रतिभा की धनी पुष्पिता अवस्थी को सम्मानित करते हुए राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने प्रशंसा पत्र, शॉल और पाँच लाख रुपए उन्हें सौंपे । 

शनिवार, 11 मार्च 2017

।। अपनापन ।।

तुम्हारी मुट्ठी में है
मेरी हथेलियाँ
बर्लिन शहर के बीच
ढही हुई दीवार के बाद जैसे

साँझ की निलाई के साथ
आँखों में समाता है
तुम्हारा चेहरा
द्धितीय विश्वयुद्ध बाद बसे हुए
बर्लिन शहर की मुस्कुराहट की तरह

मुझे चूमते हुए
तुम्हारे अधर
जैसे      सोखते हैं
इतिहास और शब्दकोष से
अर्थ की गहरी जड़ें
जो सोयी हुई हैं
विश्व युद्धों के इतिहास में
ऋग्वेद की ऋचाओं में
उपनिषद, पुराण और जातक कथाओं के
अर्थ-सूत्रों में

तुम्हारी मुट्ठी
अक्सर छूट जाती है
मेरी हथेली में
विश्व के अनकहे
संकटों को कहने के लिए

जिन्हें गहरी रात गए
आँखें पढ़ती हैं
अपनी ही हथेली
जिसमें तुम्हारी हथेली ने
रचा है       अनरचा इतिहास
तुम्हारी अनुपस्थिति को
रोपती हूँ       शब्दों में
तुम्हारे शब्द-बीजों से
उगाती हूँ कविता की फसल
प्रेम और आज के समय के लिए

जो मेरे खालीपन को
खलिहान में तब्दील कर सके

ईश्वर-प्रतिमा पर
चढ़ा हुआ पुष्प-हार
कभी आ जाता है
जैसे हथेलियों में
चरम सौभाग्य सुख की तरह
वैसे ही
तुम्हारी आँखें
सर्वस्व सौंपती हैं     अपना
निज प्रेम को

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

।। गदराई हुई नदी ।।
















तुम्हें
अवतरित करती हूँ
स्मृतियों की देह में
जहाँ से
प्रवेश करते हो तुम
सर्वाङ्ग में

सूर्य रश्मियाँ
चिड़ियों की तरह
गुनगुनाने लगती हैं      अनोखे शब्द
कहीं भीतर से भीतर तक

अनुभूति में
उतरने लगती है
उष्म तासीर
पूरी संजीदगी के साथ

भोर होने से पहले ही
महसूस होते हैं    अजोरे के
            'वे' कुछ शब्द
            तुम्हारी हथेली सरीखे
            अपने कंधे पर

जो अपने स्पर्श में
रचते हैं      विश्वास की भाषा
            पीठ पर
            नई इबारत
            निर्मल
            अलिखित ही

संवेदनाओं की पोरों से
कि अनुभव होते हो तुम
मुझमें ही उतरे हुए
जैसे       धूप
            बरखा
            ऋतुएँ और उनकी सुगंध
            अपनी तासीर के साथ

ऐसे में
स्मृतियों में
तुम्हारे प्रतिबिंब के
उझकते ही
मैं महानदी हो जाती हूँ     अमेज़न सरीखी
प्रवाहित होने लगता है      मुझमें जीवन
            तुम्हारी बाँहों के दोनों तटों बीच
            मैं उठने लगती हूँ
            अपनी देह की सतह से
            गदराई हुई नदी की तरह

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

दो कविताएँ

।। एकात्म अवस्था ।।

देह अंतरिक्ष के नक्षत्र हैं
नयन और अधर
सूर्य और चन्द

देह में देह का
लीन हो जाना
और फिर विलीन
विदेह प्रणय की
एकात्म अवस्था

।। स्मृति-भवन ।।

शब्दों से परे जाकर
रचे जाते हैं     शब्द
प्रेम में

संप्रेषण की सरस भाषा
प्रेम से परे जाकर रचती है
प्रेम

बह सकें जिसमें
बाधाओं के पाषाण-खंड
और बनाये 'घर'
जो मृत्यु के बाद भी
शेष रहे
स्मृति-भवन स्वरूप

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

तीन कविताएँ

।। ओढ़नी की रंगीनियाँ ।।

वह
पहनता है     मेरी आँखें
अपने चश्में की तरह

वह
धारण करता है     मेरा समय
अपनी घड़ी की तरह

वह
सुनता है        मेरे ही शब्द
अपनी आवाज में

वह
देखता है         अपने सपनों में
मेरी ओढ़नी की ही रंगीनियाँ
प्रेम में

।। सुंदरतम रहस्य ।।

ख़ुद को
छोड़ दिया है      मुझमें
जैसे      शब्दों में
छूट जाता है     इतिहास

सपनों की कोमलता
आकार लेने लगती है      सच्चाई में
अनुराग का रंग
उतरने लगता है      देह में
पलकों में लरजने लगते हैं
ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य

आँखें       ओंठों की तरह
मुस्कुराने लगती हैं
सिर्फ़, तुम्हें सोचने भर से

।। विश्वास के पर्याय ।।

बहुत चुपचाप
व्याकुल चित्त में
गूँथती है     शब्दों की परछाईं
साँसों में      सुगंध
धड़कनों में       आवाज़
सब पर्याय हैं       प्रेम में
स्पर्श के लिए

तृषा के क्षणों में
उसे सिर्फ़ 'प्रेम चाहिए'
जैसे       प्रकृति को वसंत

अपने सिरहाने
रखती है        प्रिय के शब्द
विश्वास के पर्याय

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)