सोमवार, 30 दिसंबर 2013

।। नीदरलैंड समुद्रतट ।।




















नार्थ-सी पुत्र नीदरलैंड
ऋतु के ग्रीष्म होने पर
सूर्य-बिंब में
बन जाता है दर्पण
स्वयं देखता है प्रतिबिंब
अंतरिक्ष अपना सर्वांग ।

रेत की रेती में
उतरता है सूरज
बच्चों के तलवों में
सूर्य-शक्ति भरने के लिए
और शीश-भीतर
अंतरिक्ष का कौतुहली ज्ञान ।

मछली की तरह
सागर प्रिय जन मन की
देह को सेंकता है सूर्य
और प्रक्षालित करता है सागर
पयोधरों को बनाता है स्वर्ण-कलश ।

वेद की ऋचाओं से
बाहर ही सूर्य स्नान करता है
नार्थ-सी के जल में ।

वेदों के ज्ञान से अज्ञान
प्रकृति के नैसर्गिक प्रेमी
पृथ्वी की शांति में
जीते हैं आत्म-शांति ।

छूट रहे रिश्तों में
खो रहा है अपनापन
प्रणय अन्वेषी जन
नई परिभाषाओं के साथ
जन्म देना चाहते हैं नया प्रेम ।

रिश्तों से ऊबे हुए
फिर भी
रिश्तों के लिए प्यासे
घर से थके हुए
रेतीले घरौंदों के खेल में
घर को जीते हुए लोग
नीले आकाश तले
बुझाते हैं अपनी प्यास
और आँखों से पीते हैं
अछोर समुद्र की गति का छोर ।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

।। योरस ।।



















योरस
अपनी अविवाहित माँ मरियम के चेहरे के पीछे
छिपाए हैं अपने पिता अलेक्सेंडर का प्यार
और प्यार करना चाहते हैं दुनिया को
दुनिया की गोद में जाकर ।

योरस के चेहरे पर
उतरे हैं अपनी माँ के नयन-नक्श
जिसके भीतर से
बोलता है पिता का विश्वास ।

योरस
हँसते हैं रसीली हँसी
अपनी छह दँतुलियों के भीतर
दुनिया की खुशी के लिए
कि धुआँई जग से थकी ऊबी आँखें सीखे जीना
बच्चों की खुशी के लिए ।

दो वर्षीय योरस
देखना चाहते हैं
दोनों गोलार्द्धों को
अपनी नन्हीं ललाई मुट्ठी में कि
आणविक युद्ध की आग से
अधिक ताकत है
मुट्ठी की लालिमा में
अपना बनाने के लिए ।

नीली आँखों में समेटे हैं
अपनी मातृभूमि हालैंड की
दीर्घजीवी शांति
शांति-दूत कपोत
का संदेश संस्पर्श करता है मौन ।

चलने में असमर्थ
पर, बैठे ही बैठे घिसटकर
पहुँच जाना चाहते हैं
हर उस चाहत के पास
जो चाहती है उन्हीं की तरह ।

योरस से आती है
मानव-शिशु होने की
अलौकिक सुगंध
कि परफ्यूम्ड सुगंध के मिलते ही
चिहुँककर पलट लेते हैं
नाक मसलते
नहीं भूले हैं वे
अपनी माँ की सृजनधर्मी
गर्भ की वासंती सुगंध
जिसमें सृष्टि के सृजन की शक्ति है
सारे विरोधों के बावजूद ।

देशी-विदेशी
रिश्तों की छाती से लगकर
किलककर जी लेना चाहते है
पर अपने पिता और माँ की गोद के अलावा
सप्ताह में एक दिन मिलती है दादी और नानी
वे अपने आजा और नाना की हथेली में
मुँह छुपा जीना चाहते हैं अपनी दूधिया हँसी
पर
कभी-कभी ही
छाती से लगकर हुलास में जी पाते हैं
अपना अनजाना प्यारा बचपन ।

सब
उनके अपने
पसारे हैं अपनी हथेली
कि कब
योरस के पाँव बढ़े
दुनिया को नापने
और रास्ता निकालें
मानव-विरोधी नीतियों के विरुद्ध
आतंक के जहर को
रोक सकें अपने कंठ में
नीलकंठी शिव की तरह
वे संतान हैं
शिवत्व के शिव के
जिसके उपासक हैं
योरस के आजा ।

चम्मच भर लंबे हाथ की
नन्हीं ऊँगलियों से चम्मच थाम
चुगना चाहते हैं दो दाने
दुनिया के स्वाद के लिए
खुद-ब-खुद ।

ममा, पपा और ओपा(आजा)
के अलावा उनकी वाणी में है ऑतो (कार)
जब होते हैं
अपने ममा-पपा की कार की
स्टेयरिंग के सामने
तो लगता है समय उनके हाथ
और खुलती हैं मुट्ठियाँ
ऊँगलियाँ दबाती हैं हर बटन
खुल जा सिम सिम की जगह
चल री सिम सिम की तरह
चीखते हैं दमभर भरदम
ऑतो … ऑतो … ऑतो
अपनी ताकत भर
लगाते हैं धक्का
और स्टेयरिंग पर जोर
जैसे अपनी तिपहिया कठगाड़ी की सीट पर बैठ
कोमल तलवों से
धरती को दबाते हुए दौड़ाते हैं
कमरा-दर-कमरा
न जाने क्या खोजती हैं
उसकी नादान लेकिन गंभीर आँखें
चंचल लेकिन सधी ऊँगलियाँ
अशक्त लेकिन गति से संपूर्ण
कोमल पाँव
जिसमें धरती से अंतरिक्ष धाँगने की है
अद्भुत आकांक्षा ।

ऑतो चलाने के लिए
मचले योरस को अचानक याद आती है चाभी
पर बोलने-बताने में असमर्थ
ताकते हैं ममा-पपा की ओर
जबकि जानते हैं
माँ के वक्ष से तो मिल सकता है दूध
लेकिन पापा की छाती में ही है प्यार
और इच्छाओं के पूरा होने की गुंजाइश ।

योरस की दो आँखें हैं
समय-घड़ी की सुइयाँ
अलेक्स और मरियम के लिए
उसकी आँखों में देखते हैं वे अपना समय
नहीं टलने देना चाहते हैं
योरस के सोने का समय
याकि
सपनों का समय
वाइन या बियर की रंगत में
क्योंकि
अपने पापा और ममा की तरह
काम पर जाने की तरह
उन्हें जाना है क्रचेस शिशुशाला में
योरस के सपनों में है
वाइन का रंग विलक्षण
जिसका कार्क खुलेगा
उनकी अपनी चाहत से
समय आने पर ।

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

।। छोर से परे ।।


 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
समुद्र के निनाद में है
बच्चों की ध्वनि तरंग प्रतिध्वनित
लहरें
जैसे कि उनके ही उठे हुए हाथ
और
बच्चों में होता है
समुद्र का अछोर कोलाहल
आकुल और व्याकुल
माँ के आँचल के भी
छोर से परे ।

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

।। अंतर्ध्वनि ।।

























औरत
चुप रही
दुनिया बोलती रही ।

ऐसे ही
एक सदी बीत गई ।

औरत
सुनती रही है
दुनिया के खोखले
और डरावने शब्द ।

बच्चे
जिन्हें मुखौटा कहते हैं ।

गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

।। इफोन ।।



















इफोन
सबके लिए
एक स्त्री का नाम है
वह सिर्फ ख़ुशी का प्रतीक है ।

स्विट्जरलैंड, इटली, आस्ट्रिया की मिलन भूमि 'नाउदर्स' के
एक होटल की स्वागत रमणी है मालिक के लिए
आगंतुकों के लिए ।

उत्साहपूर्ण
सेवातुर ।

'प्लोनर' होटल मालिक
तीन कन्याओं के पिता ने
नहीं पहचाना इफोन के भीतर का बेटी मन ।

पल्लव-सी स्वयं
फूलों-सा सजाकर रखती है खुद को
पर
तितली की तरह
बैठ जाना चाहती है हर अतिथि के
पर्यटकी मन पर ।

अपनी आँखों की खुशी में
सोख लेना चाहती है वह अतिथियों की थकान ।

पक्षियों की तरह
यायावरों के कंधों पर
बैठकर घूम आना चाहती है देश-विदेश ।

संचार-युग में
तस्वीर खिंचवाने में
सहमती-सकुचती
इफोन स्वयं अपनी माँ की
एक सुंदरतम तस्वीर है
होटल के फ्रेम में जड़ी हुई ।

भविष्य की प्रतीक्षा में जीती
लेकिन, भविष्य से डरती
अपनी हथेलियों को
बंद रखती है अक्सर
जब से उसने जाना है कि
मुट्ठी में रहता है भविष्य ।

आस्ट्रिया के लिबास
नाउदर्स गाँव की संस्कृति के प्रति
उसके भीतर है खूबसूरत विद्रोह ।

इफोन रचना चाहती है
अपने इलाके के लिए नए सपने
होटल के पर्यटकों के लिए
स्वागत के आत्मीय लहजे
अकेले ही सबके साथ खड़े होना चाहती है
एक जगह रहकर भी यायावर होना चाहती है ।

अपनी माँ के साथ
वह देखती है सूरज का निकलना
चर्च के घंटों और कमरे की घड़ी से
जान पाती है वह सूरज का छुप जाना
और अपने एक दिन का
अँधेरे में डूब जाना ।

पहुँचती है घर
या कि माँ की गोद में
फिर दूसरे दिन के लिए सूरज की रोशनी ।

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

।। अपनों की याद में ।।


















(एक)
विदेश-प्रवास में
तपन और पाले में
एकाकी पड़ा है मेरे मन का चबूतरा
जैसे हवा में
किसी स्मृति-घाव का
गीला निशान ।

इच्छाओं के नाव-घर से
ढूँढ़ती हैं बूढ़ी आँखें
बीते कल
उजले अतीत ।

प्रिय की स्मृति में
अपनी ही अंजुलि में
अपना चेहरा टिकाए
कि मेरी हथेलियाँ
उसकी ही हथेली हो
बैठी हैं
स्वदेशी इच्छाएँ
आत्मसुख के लिए ।

(दो)
बेआबरू मौसमों की तरह
पड़े हैं सपने
आँखों के कोने में
एकाकी परदेश प्रवास में
सूरज की सेंक में
सुलगते हैं स्वप्न
जिंदगी फिर भी
रचती रहती है नए नए ख्वाब
विदेशी मित्रों की तरह ।

विदेश में
याद आती हैं सहमी हुई स्मृतियाँ
चाँदनी से भी झरता रहता है अँधेरा
पूर्णिमा की पूरी रात
अकेले में
'उदास' शब्द के
गहरे अर्थ की तरह ।

इच्छाएँ माँगती रहीं
नए पत्ते
जहाँ साँस ले सके इच्छाएँ
और उनसे जन्म ले सकें
अन्य नवीनतम इच्छाएँ ।

इच्छाओं के साँचे में
समा जाती हैं जब भी इच्छाएँ
जिंदगी हो जाती है जिंदगी के करीब
जैसे कागज के आगोश में
होती है कलम
कुछ कहने को बेक़रार
कलम की स्याही से अधिक
देह की स्याही से लिखने को बेचैन ।

रविवार, 15 दिसंबर 2013

।। हथियार ।।


















कविता को
रचना है हथियार
सारे हथियारों के विरुद्ध
अपनी भाषा में ।

बिना युद्ध किए
जीतने हैं सभी युद्ध
आज की
सभी भाषाओँ को ।

धर्म के भीतर
बचाना है धर्म
बिना ईश्वर के । 

सारे धर्मों से बाहर निकालना है धर्म को
ईश्वर नहीं
आदमी के पक्ष में
कविता को
अपनी भाषा में
फिर वह कोई भी भाषा हो … ।

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

।। नाम ।।



















विदेश-प्रवास में
हम दोनों प्रवासी शब्द की तरह हैं
हेमचंद्र के शब्दानुशासन से परे
पाणिनी के अष्टाध्यायी के व्याकरण से दूर
शब्दकोश से परे
आखिर
मैं और तुम
शब्द ही तो हैं ।

शब्द में साँस लेती धड़कनें
नवातुर अर्थ के लिए आकुल
सघन-घन कोश में
आँखें पलटती हैं मेघों को पृष्ठ-दर-पृष्ठ
कभी फूलों के पन्नों को उलट-उलट
सूँघती हैं सुगंध का रहस्य
कभी सूरीनाम और कमोबेना नदियों से
पूछती है अनथक प्रवाह का अनजाना रहस्य

हम दोनों
प्रवासी शब्द की तरह हैं
अधीर और व्याकुल
अंतःकारण के वासी
नाम
शब्द की तरह
ओठों की मुलायम जमीन पर खेलते हैं
स्नेह-पोरों से पलते हुए बढ़ते हैं शब्द
समय में समय का
हिस्सा बन जाने के लिए
अंश में अंशी की तरह
रहते हैं शब्द
जैसे विदेश में
समाया रहता है स्वदेश
जैसे मुझमें बसा रहता है तुम्हारा
जीवन बोध ।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

।। दूब ।।

























दूब की कोमल नोकें
चलते हुए पाँव में
लिखती हैं
अपने छोटी होने की
बड़ी कहानी ।

पाँव ने रची हैं पगडंडियाँ
पगडंडियाँ पकड़कर
पाँव पहुँचते हैं रास्ते तक
चलते हुए पाँव बतियाते हैं रास्तों से
बिछी हुई दूब पूछती है
तलवों का हाल
और पोंछती है माटी ।

दूब की हरी नोक की कलम
तलवों की स्लेट पर
लिखती हैं
माटी के तन भीतर
हरियाला मन ।

उड़ते हुए पक्षी की
परछाईं से खेलती है दूब
रात-दिन
धूप
थककर विश्राम करती है
दूब की सेज पर ।

चाँदनी करती है
रुपहला श्रृंगार
और ओस बुझाती है
दूब की प्यास
थके हुए पाँव को
देती है विश्राम
बेघरों को देती है
घर का रास्ता
और भटके हुओं को पथ
और रात का बसेरा
दूब
अनाथ बच्चों का है
पालना और
खेल का मैदान ।

दूब
पृथ्वी पर
जहाँ भी उगी है
जमी है
और चलते हुए
पाँव में लिखती है
अपने छोटे होने की
बड़ी कहानी ।

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

।। कवि श्रीनिवासी ।।

























श्रीनिवासी कवि ने
अपनी जन्मभूमि में
कलम-हल से बोए हैं शब्द बीज ।

सूरीनाम को
जिलाया है अपनी कविता में
अपना खून देकर ।

सूरीनाम धरती पर
बूढ़ा हो रहा है सूरीनाम
पचासी वर्ष के होने पर भी
अपनी कविता में है जवान
कंधे पर हल लिए हुए
किसान की तरह ।

न्यू एम्स्टर्डम के
नदी तट पर
कविता का आकाशदीप
लिए हुए खड़ा है कवि
जिसकी तस्वीर की
सजल आँखों में
बची है स्याही
अपनी नई कविता के लिए ।

न्यू एम्स्टर्डम के
जंगल होते हुए तट पर
शताब्दियों का दुःख जीते-जानते
वृक्षों की तरह खड़ी है कवि की कविता ।
जिस तरह शाखाओं पर पक्षियों ने बसाए हैं
नए पौधे … नई लताएँ … नई जटाएँ और नए घोंसले ।
कवि की कविता की तरह ।

किसी ज़माने में इसी तट पर
 मातृभूमि के पक्ष में
माँ की तरह लड़ती हुई तोपें आज चुप पड़ी हैं
अपनी ही संतानों के कंधे पर सिर टिकाए हुए ।

तट के पुलिस थाने की चौखट पर
पहरेदार की तरह तैनात
खड़ी है श्रीनिवासी की कविता हथियार की तरह
मातृभूमि के पक्ष में ।

कविता ही न्यू एम्स्टर्डम का स्मारक है
और सूरीनाम का स्मृति-चिह्न
पुलिस स्टेशन के झंडे तले
फहराती है अलग से
कविता की शांति पताका ।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

।। हनिका ।।

























एक यूरोपीय स्त्री के
भारतीय मन-तन का
नाम है हनिका ।

नाम से डच
पर पहचान में इतर ।

निष्पलक
खुली आँखों सुनते हुए
देखती है सर्वस्व
बहुत चुपचाप
निश्छल नदी की तरह ।

हर एक उसकी आँखों में
देखता है अपना प्रतिबिम्ब
वह चौंकती नहीं है
किसी के आने-जाने से ।

उसके कान
देखते हुए सुनते हैं सब कुछ
जैसे
उसकी आँखें सुनती हुई देखती हैं अहर्निश
सोचती है अक्सर
आँख न चाहते हुए भी
सब कुछ देखने को विवश
कान न चाहते हुए भी
सब कुछ सुनने को विवश
अगर ऐसे ही होते अधर
और बोलते रहते आत्मा की वाणी
अनवरत
तो सृष्टि का होता दूसरा स्वरूप ।

दुनिया इतनी डरावनी नहीं होती तब
हर हालत में लोग नहीं रहते असुरक्षित ।

सत्ता और भय की शक्ल
हथियार में नहीं बदलती ।

आजादी का दूसरा नाम आतंक नहीं होता ।

ताला और पहरा
सुरक्षा का पर्याय नहीं बनते ।

औरत और आदमी के बीच
जन्मती विश्वास की संतानें
परिवार का हर सदस्य
देह का अंग होता ।

देश-दर-देश में घूमती
उसकी आँखें
पृथ्वी की तरह घूम रही हैं चुपचाप ।

प्रिय का हाथ थामे
परियों की तरह उड़ना चाहती है वह
देखना चाहती है वह
प्रेम से भीगी आँखें
जैसे प्रकृति के प्रेम में
रातभर में
भीग जाती है धरती
फूलों से चूती-टपकती है
ओस बूँद पराग के साथ
धरती का विलक्षण प्रेम-सुख
जीती है प्रकृति
प्रकृति की होकर
बहुत कम बोलते हुए हनिका
अपनी चुप्पी में बोलती है बहुत कुछ
खोलती है अनबुझे सवालों के जवाब
उसकी तरल और सरल आँखों से
करता है जब भी कोई संवाद ।

हनिका रचाती है परिसंवाद की नूतन कला
शब्दों की नवीन व्यंजना
आँखों में सहेज रखी है सुहासी मुस्कराहट
और सुकोमल स्पर्श
जिसकी मीठी झनक सुनाई देती है
जब मिलाती है अपने प्रिय की आँखों से आँख ।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

।। कवि माइकल स्लोरी ।।

























माइकल स्लोरी
सूरीनाम की धरती का
चलता फिरता मानव-बॉक्साइट
जिसके शब्द
स्वर्णगर्भी धरती के
भूगर्भ से निकले खरा सोना ।

बॉक्साइट और सोने की तरह
खरे हैं माइकल स्लोरी
भूमध्यरेखीय सूर्य-ताप की स्वर्ण-सुरा को
घुमंतु माइकल की खोपड़ी
पीती  है दिन-दोपहरी ।

वर्षाधिक प्राचीन
धूप से झुलसते
वृक्षों की छाया तले
नहीं सुस्ताते हैं माइकल
शब्द उन्हें चलाते रहते हैं
शब्द-सखा सहचर हैं माइकल स्लोरी ।

चिड़ियों की ध्वनि-गूँज से
अपनी कविता के रचते हैं शब्द
कभी जिसमें मन-भीतर की चीख
कभी अंतस का उल्लास
खदानी मजदूरों की तरह
लातीन अमेरिकी उपमहाद्धीप के
बहुदेशीय मानव-मन की खदानों से
खनते हैं अपनी कविताएँ ।

देश के डच भाषी अख़बार में
प्रति सप्ताह होता है
उनके मन की आँखों का
जीवंत दस्तावेज ।

पाँवचारी करते हुए माइकल
जोड़े रखते हैं
अपनी देह-माटी को
सूरीनाम की सबानाई माटी से ।

अंतर्दृष्टि की जड़ें फेंक
धरती पर
उगाए रखना चाहते हैं
मानवीय मूल्यों के लिए
मानव-वृक्ष
सूरीनामी जनजीवन का वंशवृक्ष ।

विज्ञापनी लिफाफे के
रिक्त हिस्से की
सूनेपन की पुकार
जैसे सुनते हैं माइकल
अपनी हस्तलिपि में लिखते हैं
जन-मन की हार्दिक भाषा
ग्व्रीचबी पक्षी के लिए
शब्द हैं उनके पास
जैसे अख़बार में कहने के लिए अपनी बात
कोरे और ताजे शब्द
प्रतिदिन के सूर्य की धूप की तरह
या नई खुदी खदान की तरह ।

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

।। बच्चों के सपनों के लिए ।।

























बच्चों के बड़े होते ही
खिलौने छोटे हो जाते हैं
माँ खिलौनों को
सहेज-सहेज रखती है
बच्चों के विदेश जाने पर
उनके छूटे हुए बचपन को
फिर-फिर छूने की अभिलाषा में ।

बच्चे जान जाते हैं जैसे ही
खिलौनों के खेल में
छुपे जीवन के झूठ को
घर-बाहर हो जाते हैं
जीवन के सच की तलाश में ।

माँ ढूँढ़ती रहती है
खिलौनों में छिपी उनकी ऊँगलियों को
अपने बच्चों के मुँह में लगाए गए
खिलौने को चूमती है
विदेश पढ़ने गए बच्चे के
बिछोह को भूलने के लिए ।

खिलौनों में बची हुई
बच्चों की स्मृतियों को
छू-छू कर वह कम करती है
अपनी स्मृतियों की पीड़ा
अपनी यादों में रखती है वह
अपने बच्चों के खिलौने
यह सोचकर कि
आखिर उसकी ही तरह
खिलौने भी याद करते हैं उसके बच्चों को ।

पुरानी तिपहिया साइकिल को भी
कभी खड़ा कर देती है सूने बगीचे में
और याद करती है बच्चों के पाँव
जो अब मिलिट्री की परेड में हैं
या वायुयान की उड़ान में
या अपने देश की सुरक्षा में
या देशवासियों की सेवा में ।

अभी भी बचपन में गाई गई
तुलसी की चौपाई को
ई मेल में लिख पठाती है
रामचरितमानस ही नहीं
जीवन का सार भी
'पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं' और
'जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू
सो तेहि मिलहिं न कछु संदेहू' ।

बच्चे
खिलौनों के जानवर को छोड़
निकल पड़ते हैं
आदमी के भीतर छुपे
हिंसक जानवरों के विरुद्ध
जंग जीतने के लिए ।

बच्चे
खिलौनों के कार और जहाज को छोड़
निकल जाते हैं
हवाई जहाज में
एक नई जिंदगी की तलाश में
जो उनके माँ-बाप की दुनिया से बेहतर हो
जिसे कभी
बचपन में पिता की छाती से लग कर
धड़कनों में सुना था
कभी माँ की आँखों के झूले में
सपनों की तरह देखा था ।

गुरुवार, 5 दिसंबर 2013

।। डॉलफिन ।।

























डॉलफिन
सामुद्री ममता की प्रतीक
सागर की ह्रदय बनी हुई
धड़कती रहती है
लहरों के बीच
लहर बन कर ।

ऋषि समुद्र की संतान
सागर-मेधा-डॉलफिन
सागर की मेधस्वी नागरिक
न्यूजीलैंड, उत्तरी अमेरिका, कैरेबियाई सागर
दक्षिण अमेरिका और अर्जेंटाइनी तट पर
समुद्र की लहरों को
चुनौती देती हुई
लहरों की
बाधक दौड़ से
निर्बाध खेलती रात-दिन
कभी पानी के भीतर
कभी पानी के ऊपर ।

समुद्र की
स्मृतियों का घर है
डॉलफिन के भीतर
जलजीवों की सहचरा
मनुष्यों की भेंट पर
करती है मानवोचित आचरण
चूमती है हाथ और ओंठ
खेलती है बच्चों की तरह ।
समुद्र और पृथ्वी का भेद मिटाकर
लौटती है रेत-तट पर
और अपनी खिलखिलाहट में
उद्घोष करती है
सार्वभौमिक आनंद का रहस्य ।

समुद्र के भीतर है
सृष्टि की प्रकृति
प्रकृति की छटा
मनमोहक
जल ही जहाँ का पवन है
और जीवन भी ।

पञ्च तत्वों ने
रचा है समुद्र भीतर समुद्री पृथ्वी
जीवंत आलोक से भरपूर
जहाँ मछलियाँ तैरने से अधिक
उड़ती हैं तितलियों सी
जिनका रंग
सपनों की तरह
घुला है समुद्र में
जिसे पीती है डॉलफिन ।

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

।। गठीले हाथ ।।


















वे हमारी खुशियों को रचाने में
शामिल हैं
जिन्हें हम नहीं जानते हैं
पर वे पहचानते हैं
अपने से अधिक हमारी खुशियाँ
खुशियों का स्वाद
रंग-रूप और चाल-गति ।

उनके हाथों से
रचा जाता है सुख का संसार
हम सिर्फ
खरीदते हैं जिसे ।

बड़े लोग
मानते हैं रुपया खुशी है
छोटे लोग
जानते हैं मेहनत मजूरी ।

नया साल आने से पहले
फड़फड़ाने लगता है कागजों का सफ़ेद सीना
मशीनों के नीचे
और उनके पीछे
मेहनत-मजदूरी वाले गठीले हाथ
जहाँ बदलती हैं तारीखें
और सपने भी ।

कम्प्यूटर की बटन
करती है अग्रिम बुकिंग
नए साल में
नए देश में
नए होटल में.… ।

समय भी जागता है जैसे तब
अपनी करवट में अंक बदलता है
तीन सौ पैंसठ दिन जैसे
पहनने के लिए वस्त्र हों ।

समय देखता है जागकर
नए वर्ष का चश्मा लगाकर
और हम नए ढंग से सोने के उपाय बाद
सो चुके होते हैं
पटाखों के शोर और शराब के स्वाद बाद
देर रात सो चुकने के बाद
देर दोपहर जागते हैं लोग ।

जबकि
घर में न समाने वाले
छोटे बच्चे घर-बाहर
बीन चुके होते हैं
छूटे हुए पटाखों के बुकले
अपने सपनों में उजियारी बारूद
भरने के लिए ।

जबकि हम सो चुके होते हैं गहरी नींद
वर्ष भर के लिए ।

वर्ष भर बाद, वर्ष बदलने की आहट पर
फिर जागते हैं
नए ढंग से खाने-नाचने और सोने के लिए ।

हमारी खुशियों में
लग जाता है हर छोटा आदमी
हमारे सपनों से जोड़ देता है अपनी आँखें
और हमारी हँसी में अपनी खुशी
कि अपने शिशु और पत्नी के नववर्ष के सपने भी
भूले से भी नहीं कौंधते हैं उसके भीतर
हमारी सेवा की भाग-दौड़ के कारण ।

हम सब की मुस्कराहटों में
भूल जाते हैं वे
अपने बच्चे की खिलखिलाती बाँहें
अपनी पत्नी की सुहराती मुस्कराहट ।

उनकी अभ्यासी हथेलियाँ
ड्रमिंग या प्यानो या किसी भी वाद्य-यंत्र पर
थिरकती हैं
उनके पाँव दौड़ते हैं
खुशियाँ खरीदने वालों की मेजों की ओर
शैम्पेन और वाइन की बोतल में बंद
खुशियों को कार्क से बाहर करने के लिए ।

वर्ष बदलने पर भी
उनकी तकदीर और उम्र के भीतर भी
वर्ष का बदलता है हर्ष
जिसकी परवाह किए बगैर
दौड़ाते रहते हैं टैक्सी, बस, ट्राम, ट्रेन, जहाज
सीमाओं की सरहदों पर
लगे रहते हैं घर-द्धार छोड़कर
मेहनतकश छोटे लोग ।

फैक्टरियों से बाहर निकलकर
नाचने लगती हैं फुलझड़ियाँ
पटाखे मचाने लगते हैं शोर
रंगों का चमकता-दहकता रंगीला शोर
बारूद को खुशी में बदलने में
लगे हुए हैं वे लोग
जो अपनी जिंदगी को बदलना चाहते हैं
खाती-पीती अँधाधुंध सुख भोगती दुनिया में ।

ख़ुशी उगाने के बीज बने हुए
वे धँसे हैं चुपचाप
समय की जमीन के भीतर ।

बुधवार, 27 नवंबर 2013

'तुम हो मुझमें' का लोकार्पण

नॉर्थ हॉलैंड के शहर लांगाडाईक के सिटी हॉल में आयोजित एक भव्य समारोह में वहाँ के मेयर हाँस कोरनीलिसा ने पुष्पिता अवस्थी के हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह 'तुम हो मुझमें' का लोकार्पण किया । दिलचस्प संयोग यह है कि पुष्पिता अवस्थी ने नई दिल्ली के राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अपना यह कविता संग्रह हाँस कोरनीलिसा को ही समर्पित किया है । इस आयोजन को लेकर तथा पुष्पिता जी की कविता को लेकर नीदरलैंड के कई अख़बारों में रिपोर्ट्स प्रकाशित हुईं हैं । ऐसी ही एक प्रकाशित रिपोर्ट की कतरन हमें मिली है, जो यहाँ प्रस्तुत है :  


सोमवार, 25 नवंबर 2013

।। स्मृति में … हिन्दुस्तानी माँ ।।


















मातृभूमि सरीखी माँ
सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच
टघरती हुई
चलाती है अपना समय
देश और परदेश के
अपने घर और परिवार में
ठियाँ के लिए
गठरी सकेले
उजारती रही
अपने जाये बच्चों और रिश्तेदारों के दुआरी दुआरी
और जान गई
कि पिता के देह तजते ही
दरक जाता है
उसके अपने देह से तजा
परिवार का घरौंदा भी

बुढ़ापे के उत्तरार्ध में भी
अपने जीवन के सारे प्रयोग करती हुई
मृत्यु के विरुद्ध
मृत्यु से लड़ती हुई
थकी-हारी माँ
ऋतुओं के बदलाव में
याद करती है
अपने जीवन का ऋतु चक्र
धुँधली दृष्टि
और झुर्राई देह में बरसात होने पर
महसूस करती है बरखा का सुख 
और भीग उठती है मातृभूमि की तरह
स्मृतियों में

थकी-हरी माँ बताती है
अपनी जरूरत
जैसे
यह उनकी ही नहीं
धरती की भी जरूरत है

माँ में बोलती है मातृभूमि
और मातृभूमि में बोलती है माँ

जब
उसकी ही जुती-जुताई धरती पर
खेती करने की जगह
लगता है कोई कारखाना
अपने पोपले मुँह से
चीखती है वह
मशीन से भी अधिक तेज आवाज़ में
जैसे उसकी छाती में भी हो
विष्फोटक बगावत

यूरोप में
रह कर भी
नहीं बदले
उसके धरती के संस्कार
इसीलिए
वह माँ होकर भी
मातृभूमि है
जिसमें समाई है सम्पूर्ण पृथ्वी ।

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

।। गर्भस्थ माँ ।।


















इकली गर्भस्थ स्त्री
सकेल लेना चाहती है अपनी साँसें
गर्भस्थ शिशु के प्राण के लिए

वियोग-संतप्ती अपनी माँ की साँसों से
खींच रहा है साँस
प्रणयी शिशु
देह भीतर
अपनी माँ की तरह

सैनिक पिता की अनुपस्थिति की अनुभूति ही
रक्त-पहचान गर्भस्थ शिशु की

आँखों का अँधेरा
आँसू में
घोल रहा है
इतिहास की काली स्याही
माँ के एकाकीपन का तिमिर
गर्भ-कोठरी में

आकाश-गंगा का नक्षत्र
प्रेम गंगा का सितारा
अवतरित हुआ
विरही माँ की देह में
प्रणय का शिशु
चाहत के गर्भ में

सामुद्रिक दूरियों के बीच
छटपटाती है हृदयाकुलता मछलियों सरीखी
मँडराती रहती हैं आकांक्षाएँ तितलियों सी
ह्रदय के रिक्त वक्ष-मध्य
अकेली माँ और शिशु के भीतर एक साथ

खुँटियाएँ शुष्क पौध
और अरुआये काँटे सा
धँसता है अकेलापन
माँ और गर्भस्थ शिशु भीतर

प्रिय की साँसों के साथ
साँस लेना चाहती है गर्भस्थ स्त्री
शिशु की साँस के लिए
अपनी ही तरह से

शिशु के पिता की आवाज को सुनकर
धड़कना चाहता है माँ का ह्रदय
शिशु के लिए
कि वह
युद्ध के चक्रव्यूह से अधिक
जीवन के षड्यंत्र व्यूह के विरुद्ध
अपनी वाणी में सान सके
अपने माँ-पिता के प्रणय सींजे शब्द

गर्भस्थ माँ
अपनी देह ऊपर
चाहती है सैनिक पिता की मातृभूमि प्रेरक
रक्षात्मक प्रिय हथेलियाँ
अजन्मे शिशु के लिए
कि देह-गर्भ की माटी में पड़े
प्रणय-बीज की काया में
उभर सके
सैनिक हथेलियों के छापे
दस्तावेजी मोहर की तरह अनोखी लिपि में

माँ को देखती हुई देखेंगी
पिता की प्रणयातुर आँखें
अजन्मे शिशु के
शांत गर्भाकाश में
शुभांकित नक्षत्र की तरह

पुलकित किलक की
प्रथम सुगंध को
सूँघ सकेगा पिता
माँ की देह-कुसुम से

जन्म से पूर्व विरही माँ
सिखा देना चाहती है अपने शिशु को
पिता की तरह ही मुस्कराना
उसे देखना
और रह रह कर
अपना सब काम छोड़ कर
चुम्बन देना
जिसमें उसका प्रिय
          शिशु का पिता
भूलता रहा है अपनी थकान

माँ चाहती है
शिशु के गर्भकाल में
उसका प्रिय उसके साथ रहे
अपने प्रथम चुम्बन की तरह

गर्भस्थ शिशु
मान पहचान ले उसे अपना पिता
माँ के बताने से पहले ही
पिता अपनी
आँखों का प्रणयी प्रकाश
शिशु की मुँदी पलकों पर रखे
गर्भ के भीतर ही
प्रणय-उर्मि की अक्षय बूँद

दुनिया देखने से पूर्व ही
गर्भ-गेह के भीतर ही
अनुभव करे
पिता की गोद
बाँहों और छाती के स्पर्श से जाने
पिता के साथ होने का आह्लाद-सुख

माँ
अपने प्रिय के साथ
सूर्योदय देखते हुए
जीना चाहती है
अपने भीतर का सूर्योदय
गर्भ में उसे अपने साथ लिए हुए
कि वह कहला सके
प्रणय का सूर्य-सुत
           प्रकृति-पुत्र

पिता के ओंठों से पहचाने वह
संबंधों की कोमलता
और जाने कि
पिता ने कितना प्यार किया है माँ को

प्रकृति की सर्वोत्तम सृष्टि की तरह
सम्मानित कर अंगीकार किया है उसकी माँ को
अपने जीवन का सर्वस्व सौंप
देह गर्भ भीतर गढ़ा उकेरा है शिशु के रूप में
                                    अपना नाम
खजुराहो के शिल्पी की तरह
जो खजुराहो के मंदिरों की भित्तियों
         और गर्भ गृह में रचने से रह गया
शिल्पी के द्धारा भी
शिशु देह रूप में

एक दूसरे के लिए
पृथ्वी के कोमलतम प्रेम से रचित शिशु
प्रणय का जीवित जीवंत ह्रदय है

दोनों ने मिलकर
बहुत चुपचाप
विध्वंसक दुनिया से
बच बचा कर
रचा है एक महान प्रणय
जैसे
सृष्टि रचने के साथ
ईश्वर ने रचा होगा प्रथम प्रेम

पुनः
पुनर्जन्म लेगा
शिशु के रूप में
प्रणय का विलक्षण प्रतिरूप
लघु मुस्कान की कल्पनां भर से
छलक पड़ते हैं नयन के भीतर
दुग्धामृत की धवलता
ममता से फड़क उठती है पयोधर की नसें
उसके दूध के दो दाँतों की स्मृति में
जो उगेंगे उसके भीतर
चारों दिशाओं में तीर की तरह
विध्वंसक युद्धों के विरुद्ध

इससे पहले शिशु की
दुग्ध दँतुलियाँ धसेंगी
अपने पिता की छाती में
जहाँ उसकी माँ ने बनाया था
अपने 'प्रेम का पहला घर'
गर्भस्थ शिशु से पूर्व
उसके घर के लिए

गर्भस्थ शिशु की
जीवन गति .. स्पन्दन, स्वप्न आहट
और हलचली ध्वनियाँ
रचती हैं सृष्टि के नव-शब्द
माँ के उर-प्रांतर में
पिता के संबोधन के लिए
गर्भस्थ माँ

प्रतीक्षा करती है शिशु के पिता का
चार आँखों से
अपने गर्भस्थ शिशु के ह्रदय और आँखों के
अपनी अधीर आकुल आँखों में साथ लिए हुए ।

(यह कविता विश्व भर के सैनिकों की उन गर्भस्थ पत्नियों को समर्पित है, जिनके पति अपने अपने राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर सीमाओं पर तैनात हैं ।)

बुधवार, 20 नवंबर 2013

।। मृत्यु से लड़ती है ।।

























माँ
जीवन भर
लड़ती है मृत्यु से

मृत्यु
सिर्फ देह की ही
नहीं होती है
बल्कि
जब भूख
      फसल
      घर
      जीवन
      अपने आदमी
      और बच्चों की
हर जरूरत के लिए
लड़ रही होती है माँ
तब भी
मृत्यु से लड़ रही होती है माँ

माँ
जीवन भर
लड़ती है मृत्यु से ।

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

।। सीशिल ।।


















सीशिल
धरती पर वृक्ष सरीखी अपनी जड़ें धँसाएँ हुए
कैरेबियाई हस्तशिल्पी स्त्री का नाम है

तराश से जन्म लेती है
वृक्ष के शुष्क तने से
न जाने कितनी काष्ठ सामग्री मनका और बाजूबन्द तक

तने की तरह तनी हुई
पर, रेशे-रेशे की मुलायम
काष्ठाग्नि प्रज्वलित है
उसकी जीवनोन्मुखी जिजीविषा की पर्तों में

जंगल बीच
वन की कला देवी सी अड़ी-खड़ी
बरखा को पीती
समुद्र के सौंदर्य की सरल हार्दिकता की
संपत्ति को जीती
वह जानती है
ग्रीन हार्ट और महोगनी जैसे
गठीले वृक्षों की जल विरोधी मजबूती की तरह
पत्थर या लौह स्तम्भ की तरह
जलधार बीच खड़ी
सीशिल जानती है
वृक्ष का वक्ष
वक्ष के स्वप्न

स्वप्न की आकांक्षा को
सूखी लकड़ी की देह में जीती हुई
सीशिल उकेरती है
संसार की कलाओं का सौभाग्य-सुख
ऋतुओं में
कालिदास का ऋतुसंहार
इंद्र का ऐंद्रिक जाल
फाल्गुन का उन्माद
जबकि
ग्रीन-हार्ट सम्पूर्ण वृक्ष
एक दिन में जीता है अपना पीताभी बसंत

मानव देह में प्रवेश की हुई
मृतात्मा की छाया को
अपनी आँखों से डसती हुई
साँसों से झाड़ फेंकती है पापात्मा की छाया
कि जैसे मानव-देह के वृक्ष तने में
लगा हुआ कीड़ा हो वह कोई
जिसे फलने से पूर्व ही नष्ट करती है कुत्सित आत्मा

वन के वृक्षों के हित में लगी
गाँवों में सँस्कृति के वृक्ष लगाती
कि 'काराबासी' नाम की आफरो सँस्कृति
बन सके जनप्रिय विश्व सँस्कृति
काष्ठ की देह में
कलाकृतियों के बहाने से

(ग्रीन हार्ट - ब्राजील और गयानी तटों के जंगल का जलजीवी वृक्ष है, जो गदराई देह वाली समृद्ध नदियों को पार करने के लिए पुल के लकड़ी के रूप में इस्तेमाल में लायी जाती है । इससे बने पुल पचासों वर्षों तक मजबूत बने रहते हैं । यह वृक्ष वर्ष में सिर्फ एक बार कुछ दिनों के लिए वासंती पुष्पों से लद जाता है । यह करीब सप्ताह भर तक विशाल ऊँचा पीत वृक्ष-सा प्रदर्शित होता है ।
काराबासी - कैरेबियाई देशों में प्रसिद्ध आफरो काष्ठ कला का नाम ।)

सोमवार, 18 नवंबर 2013

।। जंगल जग के मानव प्राणी ।।


















अमर इन्डियन के गाँव

सघन घन बीच
पथ और पगडंडियों से परे
विमान ही पहुँचने का एकमात्र माध्यम जहाँ
और दृष्टि ही पथिक

नदियाँ हैं
जंगल का रास्ता
और जंगल देते हैं
नदियों को रास्ता

वृक्षों की देह से बनी
लम्बूतरी डोंगी ही
गाँव से गाँव
जंगल से जंगल
तट से द्धीप की दूरी का वाहन
जलवाहन ही केवल साधन

सघन घन बीच
मछली-सी बिछलती तैरती
जंगली मानसूनी पानी पीकर
जीवन जीती नदियों में
अपने जीवन की कटिया डाले हुए जीती हैं वन जातियाँ
अमर इन्डियन परिवारों में
परिवार कबीलों में
और कबीलों के लोग
जंगलों में तीर-धनुष और भालों से करते हैं शिकार

वृक्षों के तनों के ऊपर से
शुरू करते हैं अपने काष्ठ-घर
और विह्वर मंकी (बुनकर वानर) की तरह
बुनते हैं अपना हैमक पालना
वृक्षों के वक्ष-बीच तना झूलता
उन्हीं के पाँव पर खड़े हैं अमर इन्डियन के बसेरे
लकड़ी के पटरों और लट्ठों से
बने हैं घरों के घोंसले
चार फुट की ऊँचाई से
शुरू होते हैं अमर इन्डियन के वन-जीवी घर
तासी पत्तियों की छत ओढ़े हुए

कपासी सूत के हथ बने
पालनों में पड़ी जिंदगी
कसाबा रोटी
और मछली शोरबे में
जीती है अपना रात-दिन
कसीरी शराब की
गुलाबी रंग-गंध में
देखती है उल्लासी स्वप्न
थमी हुई जिंदगी की
ठहरी हुई मौत में
जिंदगी जागने के सपने

झरनों में अटकी
वृहत मछलियों के फँसने पर
हिरणी की हड्डी की सी बाँसुरी पर
धरकर अनुरागी ओंठ
फेंकते हैं साँस
उमंगी उत्सव के लिए

कभी राग से भरकर
कछुए के खोल पर
शहद के मोम को यंत्र पर चढ़ा कर
देते हैं उँगलियों से राग भरी रगड़
और छेड़ते है
अनूठी जंगली टेर
कि वन देवी
प्रसन्न हों अलोप ही
देखें समर्पण नृत्य
और आशीषें कि वे बचाये हुए हैं वन
और वन-माँ को

डॉलरी और यूरो 'सभ्यता' के
दारू दम जत्थों की
भोग परस्ती के बावजूद
मिलने पर उनसे
हाथ तो मिलाते हैं अपना
लेकिन
ह्रदय और प्राण सहेजे रखते हैं प्राण प्रण से
वन देवी की पूजा के लिए ही
वन देवी के घर
जो हैं वन के भीतर
और उपासना करते हैं
सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की वर्ष भर

अमर इन्डियन
जीते हैं अपनी भक्ति में
निज की शक्ति
आत्मीय सँस्कृति की आत्मीय भाषा में
मानवोचित और मानवीय

अमर इन्डियन
नहीं सीखना चाहते हैं
ड्यूरो और डॉलर कमाने वाली
धोखे और ठगी से भरी
छल-प्रपंच की कृत्रिम मीठी भाषा
ब्राजील के
अमर इन्डियन की
कसीरी देशी शराब-सी है
धीमी ध्वनि और गति गति की
मोहमयी मृदुल भाषा
अपनेपन के मधुरास के
बीज-शब्द से संपन्न
कि उन्हें मनोरंजन के लिए
कभी किसी टी वी या ब्ल्यू फ़िल्म
या पब या बार या क्लब की
जरूरत नहीं पड़ती

अमर इन्डियनों के
अध्-वस्त्र में भी
आच्छादित है नग्नता
जबकि जादुई सभ्यता की चकाचौंध में
पल रही
तथाकथित सुंदर से सुंदरतर सभ्यता भी
नग्न से नग्नतर लगती है कि
देह पर पड़ा हुआ वस्त्र
देह को ढकने से अधिक
             उघार कर रख देता है देह कि
             मनुष्य को
             हिंसक बनने में
             देर नहीं लगती है
             सारी सभ्यताओं के बावजूद ।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

।। इकली स्त्री ।।


















घर पर
छोड़ आती है अकेलापन
जिसे जीती है वह
और जो जीता है उसे
आमने सामने होने पर

अकेलापन
घर में रहता है उसके साथ
पहने हुए कपड़े की तरह
मन देह के अंतस का
एकांत ढाँपने के लिए

अवकाश के दिन
घर के भीतर देखता है
उसका अकेलापन
और सहलाता है उसे
सोयी हुई
अपनी मुलायम साँसों से

अकेलापन
घर-भीतर छिपा बैठा है
उसके हर सामान में
एक उदास ठंडक की तरह

आईना तक
ओढ़े रहता है अनुपस्थिति की स्याह चादर
समय का मौन समाया है घर के सन्नाटे में
अकेलेपन ने ऊब कर
घर के भीतर और बाहर उढ़ा दी है
उपेक्षा की श्वेत चादर

पूरे घर में
फैली रहती है
मौत की परछाईं
और अकेलेपन की कसक
जो
घर का ताला खुलते ही
उझक कर आ गिरती है
अकेली स्त्री की सूनी हथेली बीच
जिसे
सहेज कर रखती है अपनी मुट्ठी में
घर के अकेलेपन को कम करने के लिए
जो उस इकली स्त्री से भी ज्यादा झेलता है घुटन
उसके काम पर जाने के बाद

घर और स्त्री
दोनों पहचानते हैं एक दूसरे का अकेलापन
और दमतोड़ कोशिश करते हैं उसे कम करने की
एक दूसरे के आमने-सामने होने पर
स्त्री-पुरुष की तरह प्रायः   

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में

पुष्पिता अवस्थी जी को पिछले माह आयोजित फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था । यहाँ पुष्पिता जी ने आमंत्रितों के समक्ष अपनी कविताएँ तो सुनाई हीं, साथ ही बुक फेयर की अन्य गतिविधियों का भी जायेजा लिया । आयोजन से संबंधित कुछेक डिटेल्स और दो तस्वीरें यहाँ प्रस्तुत हैं :




बुधवार, 30 अक्तूबर 2013

।। अनगिनत नदियाँ ।।






















प्रेम के हठ योग में
जाग्रत है
प्रेम की कुंडलिनी ।

रंध्र-रंध्र में
सिद्ध है साधना ।

पोर-पोर
बना है अमृत-कुंड ।

प्रणय-सुषमा
प्रस्फुटित है सुषुम्ना नाड़ी में
कि देह में
प्रवाहित हैं अनगिनत नदियाँ ।

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2013

।। झील का अनहद-नाद ।।




















शताब्दियाँ ढोती
कोमो झील की
तटवर्ती उपत्यकाओं में बसे गाँवों में
तेरहवीं शताब्दी से बसी हैं
इतिहास की बस्तियाँ ।

प्राचीन चर्च के स्थापत्य में
बोलता है धर्म का इतिहास
इतिहास की इमारतें
खोलती हैं अतीत का रहस्य ।

सत्ता और धर्म के
युद्ध का इतिहास
सोया है आल्पस की
कोमो और लोगानो घाटी में
झूम रहा है झील की लहरियों में
अतीत का विलक्षण इतिहास ।

वसंत और ग्रीष्म में
झील के तट में गमक उठते हैं
फूलों के रंगीले झुंड ।

रंगीन प्रकृति
झील के आईने में
देखती है अपना झिलमिलाता
रंगीन सौंदर्य ।

झील का नीलाभी सौंदर्य
कि जैसे पिघल उठे हों
नीलम और पन्ना के पहाड़
प्रकृति के रसभरे आदेश से ।

झील के तटीले नगर-भीतर
टँगी हैं पत्थर की ऐतिहासिक घंटियाँ
जिनकी टन-टन सुनता है
पथरिया आल्पस
रात-दिन
और जिसका संगीत
गाती हैं अनवरत झील की तरंगें ।

तट से लग कर ही
सुना जा सकता है जिसका अनहद नाद
झील का अनहद नाद
और जल के सौंदर्य में
बिना डूबे ही
पिया जा सकता है जल को
जैसे आँखें जीती हैं
झील-सुख
बग़ैर झील में उतरे-उतराये ।

झील के दोनों पाटों के गाँव घर
अपनी जगमगाहट में मनाते हैं रोज़
देव-दीपावली
जैसे काशी की कार्तिक पूर्णिमा
होती हो रोज़
झील के मनोरम अभिवादन में ।

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

।। ग़रीब का चाँद ।।





















पूर्ण चाँद
अपने रुपहले घट के अमृत को
बनाकर रखता है
तरल पारदर्शी
नारियल फल भीतर
चुपके से
गहरी रात गए
अनाथ शिशुओं का दूध
बनने के लिए ।

निर्धन का धन
सूरीनामी वन
जिन पर ईंधन भर
या हक़ छावनी छत भर
जैसे गाय या बकरी का
पगडंडियों की घास पर
होता है हक़ ।

पत्तों की छतों पर
पुरनिया टीन की छाजन पर
चंदीली वर्क लगाता है चाँद
ताज़ी बर्फी की तरह
मीठी लगती है ग़रीब की झोपड़ी
विश्राम के आनंद से भरपूर ।

रुपहले रंग की तरह
पुत जाता है चाँद
पूर्ण पृथ्वी पर
बगैर किसी भेद के
जंगल, नदी, पहाड़ को
एक करता हुआ ।

घरों को अपने रुपहले
अंकवार में भरता हुआ
मेटता है गोरे-काले रंग के
भेद को ।

पूर्ण चाँद
प्रियाओं के कंठ में
सौंदर्य का लोकगीत बनकर
तरंगित हो उठता है
जबकि
रात गए सन्नाटे में
झींगुर भी
अपनी ड्यूटी से थककर
सो चुका होता है
नए कोलाहल के
स्वप्न देखने के लिए ।

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

।। माँ ।।

























पृथ्वी छोड़कर
माँ के जाने पर भी
माँ बची रहती है
संतान की देह में ।

संतान की देह
माँ की पृथ्वी है
माँ के देह त्यागने पर भी ।

माँ के जाने पर भी
माँ बची रहती है
प्राण बन कर ।

कठिन समय में
शक्ति बनकर
बची रहती है माँ ।

माँ के जाने पर भी
बचपन की स्मृतियों में
बची रहती है माँ ।

माँ अपने जाने पर भी
बची रहती है
अपनी संतानों में
शुभकामनाएँ बन कर ।

माँ जाने पर भी
कभी नहीं जाती है
बच्चे बूढ़े हो जाएँ फिर भी ।

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

।। ईश्वर ।।






















दुःख में
बचा है ईश्वर

ईश्वर को
खोजती हैं आँखें
दुःख में

अपनी आत्मा में
खड़ा करती हैं ईश्वर
दुःख के विरुद्ध
बुद्ध बनकर ।

सोमवार, 21 अक्तूबर 2013

।। पुकारती है पुकार ।।

























अन्याय के विरुद्ध आत्मा चीखती है अक्सर
पर, कोई नहीं सुनता सिवाय आत्मा के ।

झूठ के विरुद्ध आत्मा रोती है अक्सर
पर, सिर्फ़ आँखें देखती हैं सच्चे आँसू ।

सच्चाई के लिए भूखी रहती है आत्मा प्रायः
पर, कोई नहीं समझता है आत्मा की भूख ।

थककर
अंततः
उसकी आत्मा पुकारती है उसे ही अक्सर
सिर्फ वही सुनती है अपनी चीख
सिर्फ वही देखती है अपने आँसू
सिर्फ वही समझती है अपनी भूख
सिर्फ वही सुनती है अपनी गुहार
और पुकारती है अपनी आत्मा को
चुप हो जाने के लिए ।

वह जानती है क्योंकि
सब एक किस्म के
बहरे और अंधे हैं यहाँ
वे नहीं सुनते हैं
आत्मा की चीख
वे नहीं देखते हैं
आत्मा के आँसू ।

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

।। शब्द-बैकुंठ ।।




















बादल
चुप होकर बरसते हैं
मन-भीतर
स्मृति की तरह ।

सुगंध
मौन होकर चूमती है
प्राण-अंतस
साँसों की तरह ।

उमंग
तितली-सा स्पर्श करती है
मन को
स्वप्न-स्मृति की तरह ।

विदेश प्रवास की
कड़ी धूप में
साथ रहती है
प्रणय-परछाईं ।

सितारे
अपने वक्ष में
छुपाए रखते हैं प्रणय-रहस्य
फिर भी
आत्मा जानती है
शब्दों के बैकुंठ में है
प्रेम का अमृत ।

गुरुवार, 10 अक्तूबर 2013

।। शब्दों के भीतर की आवाज़ ।।




















शब्दों से
पुकारती हूँ तुम्हें
तुम्हारे शब्द
सुनते हैं मेरी गुहार ।

तुम्हारी हथेलियों से
शब्द बनकर उतरी हुई
हार्दिक संवेदनाएँ
अवतरित होती हैं
आहत वक्ष-भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध ।

बचपन में साध-साधकर
सुलेख लिखी हुई कापियों के काग़ज़ से
कभी नाव, कभी हवाई जहाज
बनानेवाली ऊँगलियाँ
लिखती हैं चिट्ठियाँ

हवाई-यात्रा करते हुए शब्द
विश्व के कई देशों की धरती और ध्वजा को
छूते हुए लिखते हैं
संबंधों का इतिहास ।

तुम्हारे शब्द
अंतरिक्ष के भीतर
गोताखोरी करते हुए
डूब जाते हैं मेरे भीतर ।

बुधवार, 9 अक्तूबर 2013

दो कविताएँ


 















।। अपने ही अंदर ।।

आदमी के भीतर
होती है एक औरत
और
औरत के भीतर
होता है एक आदमी ।

आदमी अपनी जिंदगी में
जीता है कई औरतें
और
औरत ज़िंदगी भर
जीती है अपने भीतर का आदमी ।

औरत
अपने पाँव में चलती है
अपने भीतरी आदमी की चाल
बहुत चुपचाप ।

आदमी अपने भीतर की औरत को
जीता है दूसरी औरतों में
और
औरत जीती है
अपने भीतर के आदमी को
अपने ही अंदर ।

।। शंख ध्वनि ।।

स्त्री
शब्दों में जीती है प्रेम
पुरुष
देह में जीता है प्रेम

स्त्री
आँखों में जीती है रात
और पुरुष
रात में जीता है स्त्री ।

स्त्री
शंख ध्वनि में
जीती है आस्था के स्वर
पुरुष
शंख देह में
भोगता है विश्वास-रंग ।

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2013

।। छुअन ।।

























प्रेम
घुलता है
द्रव्य की तरह
पिघलता है

राग-प्रार्थना में
लिप्त जाती है आत्मा ।

मुँदी पलकों के भीतर
प्रेम का ईश्वर
जुड़े हाथों के भीतर
हाथ जोड़े है
प्रेम ।

प्रेम में
बगैर संकेत के
देह से परे हो जाती है देह ।

रेखा की तरह
मिट जाती है देह
और अनुभव होती है
आत्मा की छुअन ।

सोमवार, 7 अक्तूबर 2013

।। हवा ।।




















हवाओं में
होती है आवाज़
अपने समय को जगाने की ।

चुप रहने वालों के खिलाफ़
बवंडर उठाने की ।

हवाएँ
चुपचाप ही
आँधी बन जाती हैं ।

हवाएँ
बिना शोर के
तूफ़ान ले आती हैं ।

हवाएँ
हमेशा पैदा करती हैं आवाज़
प्रकृति के पर्यावरण को
हवाएँ पोंछती हैं
अपनी अलौकिक हथेली से ।

हवाएँ गूँजती हैं धरती में
जैसे देह में साँस ।

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

दो कविताएँ


 






















।। चिट्ठी के शब्द ।।

चिट्ठी के शब्द
पढ़ने से भ्रूण में बदल जाते हैं
मन के गर्भ में ।

वे विश्वास की शक्ल में
बदलने लगते हैं ।

शब्दों की देह में
आशाओं की धूप समाने लगती है
और अँधेरे के विरुद्ध
कुछ शब्द
खड़े होकर रात ठेलने लगते हैं ।

।। कैनवास ।।

बच्चे
अपने सपनों की दीवार पर
पाँव के तलवे बनाता है
लावा के रंग में
और उसी में सूरज उगाता है ।

आकाश उसका
नीला नहीं पीला है
सूरज उसके लिए
पीला नहीं लाल है ।

पेड़ का रंग उसने
हरा ही चुना है
उसी में उसका मन भरा है ।

बच्चे ने
सपनों के रंग बदल दिए हैं
अपने कल के कैनवास के लिए ।

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

।। समय के विरुद्ध ।।

























रेत में
चिड़िया की तरह
उड़ने के लिए फड़फड़ाती ।

नदी में
मोर की तरह
नाचने के लिए छटपटाती ।

आकाश में
मछली की तरह
तैरने के लिए तड़पती ।

विरोधी समय में
मनःस्थितियाँ जागती हुई
जीती है अँधेरे में
उजाले के शब्द के लिए ।

शब्द से फैलेगा उजाला
अँधेरे समय के विरुद्ध ।

बुधवार, 2 अक्तूबर 2013

।। भीड़ के भीतर ।।


















पवन
छूती है नदी
और लहर हो जाती है ।

पवन
डुबकी लगाती है समुद्र में
और तूफ़ान हो जाती है ।

पवन
साँसों में समाकर
प्राण बन जाती है
और
देखने लगती है सबकुछ
आँखों में आँखें डालकर
और चलने लगती है
भीड़ के भीतर ।

सोमवार, 30 सितंबर 2013

।। कथा ।।


देखते-देखते सूख गया पेड़
देखते-देखते कट गया पेड़
कई टुकड़ों में
जैसे चिता में जल जाती है
मानव देह
देखते-देखते ।

वृक्षों के नीचे की
सूख गई धरती
जड़ों को नहीं मिला
धरती का दूध ।

हवा-धूप और बरसात के बावजूद
वृक्ष नहीं जी सकता धरती के बिना ।

वृक्ष !
धरती का संरक्षक था जैसे
सूनी हो गई है धरती पेड़ के बिना
उठ गया है जैसे पर्यावरण का पहरुआ ।

घर के बाहर सदा बैठा
घर का वयोवृद्ध सदस्य
बिना पूछे अचानक
जैसे छोड़ गया हमें

वह देखता था हमें

कंधों पर कबूतर
करते थे उसके कलरव
उसकी बाँहों में लटकती थी झरी बर्फ
उसकी देह को भिगोती थी बरसात ।

ठंडी हवाओं को अपनी छाती पर रोककर
बचाता था वह हमें और हमारा घर
उसकी छाया जीती थी हमारी आँखें
हम अकेले हो गए हैं
जैसे हमारे भीतर से कुछ उठ गया हो ।

कटे वृक्ष की जगह
आकाश ने भर दी है
सूर्य किरणों ने वहाँ
अपनी रेखाएँ खींच दी हैं
धूप ने अपना ताप
भर दिया है वहाँ ।

फिर भी
एक पेड़ ने हमें छोड़कर
न भरने वाली जगह
खाली कर दी है ।

रविवार, 29 सितंबर 2013

।। स्वाद के अभाव में ।।



















वह नहीं हँस पाती है अपनी हँसी
ओंठ भूल गए हैं
मुस्कराहट का सुख

नहीं जागती है अब वैसी भूख
स्वाद के अभाव में

आँखें नहीं जानती हैं नींद
सपने में भी रोती हैं
काँप-सिहरकर

एक पेड़
जैसे जीता है
माटी के भीतर
अपनी जड़ें फेंक कर
जीने का सुख
औरत नहीं जान पाती है वैसे ही

एक नदी
जैसे बहती है
धरती के बीच
औरत बहते हुए भी
नहीं जान पाती है वह सुख ।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

।। आँखों के घर में ।।


















रात भर
आँसू लीपते रहते हैं
आँखों का घर

अँगूठा लगाता है
ढांढस का तिलक

हथेलियाँ आँकती हैं
धैर्य के छापे
जैसे
आदिवासी घर-दीवारों पर
होते हैं छापे और चित्रकथा
उत्सव और मौन के संकेत चिन्ह

सन्नाटे में
सिसकियाँ गाती रहती हैं
हिचकियों की टेक पर
व्यथा की लोक धुनें ।

कार्तिक के चाँद से
आँखें कहती रहती हैं
मन के उलाहने ।

चाँद सुनता है
ओठों के उपालम्भ
चाँद के मन की
आँखों में आँखें डाल
आँखें सौंपती रहती हैं
अकेलेपन के आँसू
और दुःख की ऐंठन ।

अनजाने, अनचाहे
मिलता है जो कुछ
           विध्वंस की तपन
           टूटन की टुकड़ियाँ
           सूखने की यंत्रणा
           सीलन और दरारें
           मीठी कड़ुआहट
           और जोशीला ज़हर

तुम्हारे 'होने भर के'
सुख का वर्क लगाकर
छुपा लेती हूँ सबकुछ
फड़फड़ाती रुपहली चमक के आगोश में

आँखों के कुंड में भरे
खून के आँसूओं के
गीले डरावनेपन को
घोल देती हूँ तुम्हारे नाम में
खुद को खाली करने की कोशिश में
जहाँ तुम्हारा अपनापन ठहर सके
ठहरी हुई आत्मीय छाँव के लिए ।  

बुधवार, 25 सितंबर 2013

।। नहीं पहचान पा रहा है कोई ।।


















आँखों में बैठी-बैठी
दृष्टि की उँगलियाँ
छूती हैं यूरोप की जादुई दुनिया
शामिल है जिसमें आदमी
                      औरत
                      और उनका तथाकथित प्रेम भी

दृष्टि-उँगलियाँ रहती हैं
आँखों की मुट्ठियों के साँचे भीतर
बहुत चुपचाप

वे कुछ नहीं
पकड़ना-छूना चाहतीं

मन
संगमरमर की तरह
चिकनाकर पथरा गया है
 नहीं पकड़ पाता कोई मन
खेल खेलने के नाम पर भी

मुस्कराना
ओठों का व्यायाम भर
ह्रदय की मुस्कराहट नहीं

आँसू, बहने के बाद नहीं सूखते
सूखे आँसू ही बहते हैं अब
गीला दुःख भीतर ही भीतर
गलाता रहता है चुपचाप सबकुछ

चेहरे की मुस्कराहट
आधुनिक सभ्यता की
प्लास्टिक सर्जरी की तरह
भीतर का कुछ भी
नहीं आने देती है बाहर

देह भर बची है सिर्फ
मानव पहचान की
खुद से खुद को
नहीं पहचान पा रहा कोई

लोग पहचानते हैं सिर्फ
डॉलर, यूरो और उसकी
निकटवर्ती दुनिया
किसी भी संबंध से पहले
और
किसी भी संबंध के बाद ।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

।। पृथ्वी अनुभव ।।


















नदी को
नदी की तरह सुनो
सुनाई देगी नदी
अपनी अंतरंग आवाज की तरह ।

चाँद को
चाँद की तरह देखो
दिखाई देगी चाँदनी
अपनी आँख की तरह ।

धरती को
धरती की तरह अनुभव करो
महसूस होगी पृथ्वी
अपनी तृप्ति की तरह ।

प्रकृति को
प्रकृति की तरह स्पर्श करो
तुममें उतर जायेगी प्रकृति
प्रेम सुख की तरह ।

सोमवार, 23 सितंबर 2013

।। दस्तक ।।


















दरवाज़े
बने होते हैं
दस्तकों के लिए ।

दस्तक से
तड़प उठते हैं
किवाड़ के रोम-रोम ।

दरवाज़े
सुनना जानते हैं दस्तक
पर चुप रहते हैं
गरीब के सपनों की तरह ।

दरवाज़े
जानते हैं
दस्तकों की भाषा ।

सुनवाई
न होने पर
दरवाज़े छोड़ देते हैं दीवारें
और दीवारों के घर ।

रविवार, 22 सितंबर 2013

।। सेंट लूशिया द्धीप ।।

























कैरीबियाई सागर का सौंदर्य प्रतिनिधि
सेंट लूशिया द्धीप
जिसने जने
नोबेल पुरस्कार विजेता कवि डेरक वालकॉट
और अर्थशास्त्री

आकाश-अंग-वस्त्रम को
देह पर ओढ़े हुए
नीलिमा को जीता है
अपने वक्षाकाश में
सूर्य के स्वर्णिम स्वप्निल कशीदे
काढ़ता है नित्य अपने अंगरखे में

कैरीबियाई द्धीपों का
जल-जीवन-जनक-सागर
नील-मंजुषा-रत्ननिधि संपन्न
मौन ही रहता है आतुर
अपने विविधवर्णी असंख्य द्धीपों के प्रति

रुपहली-रेतीली शैय्या पर
सोये-जागे सागर के वक्ष भीतर
जीती तैरती रंगीन मछलियाँ
जल जन्नत की तितलियाँ
रंगों का पनीला सौंदर्य
आँखों से पीती
सौंदर्यप्रेमी गोताखोरों से
अभयजीती मछलियाँ
खेलती हैं उनकी हथेलियों से
और देह चूम हल्के से
तैर जाती हैं लहरों में

समुद्र का अंतरंग
उनका जलाकाश
तैरना ही उनकी उड़ान

कैरीबियाई द्धीप देश
रचते हैं अपने तरह की कैरब बीयर
कि जैसे सेंट लूसिया द्धीप
द्धीप से अधिक नशे और सौंदर्य की
मधुशाला हो

पर एक्बेरियम की मछलियाँ
पिंजड़ों की चिड़ियाँ
फड़फड़ाहट में
जीती हैं जो
अपनी उड़ान
हम सब की तरह ।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

।। आयक्स एरीना में ।।



















5 मई 2013 से पहले
कभी नहीं, कोच फ्रान्क द बूर ने बजायी होंगी
इतनी सीटियाँ
शायद अपने जीवन में भी नहीं
और लड़कियों के लिए तो कभी नहीं

हालैंड देश के लिए
फ्राई दाख़
स्वतंत्रता दिवस 5 मई

जहाँ लोग
आपस में कह रहे थे
बीयर है स्वतंत्रता
तो कोई कहता संगीत है फ्राई हाइड

लेकिन

आयक्स एरीना में
फुटबॉल खिलाड़ी
5 मई को 5 गोल बनाकर
आयक्स क्लब देश का फुटबॉल चैम्पियन होकर
पाँचों उँगलियों की मुट्ठी तानकर
कोच फ्रान्क द बूर के साथ
'एक' होकर घोषणा कर रहे थे कि
फुटबॉल खेल है फ्राई हाइड
चैम्पियनशिप है फ्राई हाइड
सच्चेमन और सच्चेपन का खेल है फ्राई हाइड
खिला खुश जीवन है फ्राई हाइड
प्रेम है फ्राई हाइड

कोच फ्रान्क द बूर ने
5 मई 2013 को
आयक्स एरीना में
अपने जुड़वाँ भाई रोनाल्ड के नवसिखवे खिलाड़ियों को
वर्ष भर में किया दक्ष
और बना दिया देश का फुटबॉल चैम्पियन खिलाड़ी

जबकि
अपने एरीना घर में ही
ए जेड क्लब के कीपर एस्तबान को
लाल कॉर्ड मिलने पर
आग बबूला हो उठे थे
कोच खेट यान फरबेक
कूद पड़े थे अम्पायर और खिलाड़ियों के बीच
खेल को अपने हाथ में लेकर
खिलाड़ियों को इशारे से करते हैं मैदान बाहर
और अम्पायर से कहते हैं मैच इज ओवर
अट्ठावन मिनट में ख़त्म हो जाता है खेल
फिर भी
अपने खिलाड़ियों का हिम्मत और हौंसला बने हुए
चुप रहते हैं फ्रान्क द बूर

ऐसे ही
आयक्स टीम की
अपने ही एरीना में
दो-दो पैनाल्टी को अम्पायर ने
जानबूझकर नजर अंदाज़ कर दिया था
और बने हुए दो गोल को 
ऑफ साइड करार कर
छीन लिए थे आयक्स क्लब के सारे प्वाइंट

और उधर लिओन ने
बना डाले सात गोल
अम्पायर की पैनाल्टियों की कृपा से
आयक्स टीम 2012 की
यूरोपियन लीग चैम्पियनशिप की प्रतियोगिता से
देखते-देखते बाहर हो गयी थी
चालीस मिनट के भीतर

कहाँ से लाते हैं धैर्य
और कैसे बर्दाश्त करते हैं अन्याय
अपने खिलाड़ी बच्चों के साथ
जिन्हें पाल रहे हैं
रोनाल्ड और फ्रान्क द बूर जुड़वाँ भाई
अपने हुनर का खून पिला कर

मार्को और मारोवाइक ने
विश्व कप की लड़ाई में
ऐसे ही सहा था अन्याय

फुटबॉल खेल के मैदान में
अब सिर्फ बॉल नहीं है खेल के बीच
बल्कि खेल रहे हैं
अम्पायर और उसको खिलाने वाले संगठन
प्रभुत्व, सत्ता और धन का खेल
चाहे, इसके लिए करना पड़े
कोई भी भ्रष्टाचार या कुछ भी

फिर भी
अन्याय सहने के बावजूद
गहरे रात गये
मिलती होगी तसल्ली
यह सोचकर कि
योहान क्रॉउफ की
फुटबॉल खेल परंपरा को
आगे बढ़ा रहे हो तुम
अपने नवयुवा खिलाड़ियों के साथ

इस दुष्ट हुए समय में भी

जबकि
फुटबॉल खेल भी
युद्ध और व्यवसाय में
बदल गया है ।