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July, 2013 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

।। संबंध ।।

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तुम्हारी आवाज़ की चिट्ठी पढ़वाती हूँ
हवाओं से और तुम्हारी साँस-सुख महसूस करती हूँ वृक्षों से और तुम्हारे अस्तित्व में विलीन हो जाती हूँ सूर्य से और तुम्हारा प्रणय ताप रक्त में जी लेती हूँ मेघों से और तुम्हारे विश्वासालिंगन में सिमट जाती हूँ
तुम्हारी छवि परछाईं के रोम रोम के दर्पण में उतर जाती हैं पुतलियाँ
महुए-से चुए तुम्हारे शब्दों से सूँघती हूँ प्रणय की सुगंध ।

।। देह विदेह ।।

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दो गोलार्दों में बाँट दिए जाने के बावजूद पृथ्वी भीतर से कभी दो ध्रुव नहीं होती मेरी-तुम्हारी तरह
तुम्हारी साँसें हवा होकर हिस्सा होती हैं मेरी मेरे बाहर और भीतर की प्रकृति की सृष्टि बनती है तुमसे
तुम्हारा होना मेरे लिए सूर्य-प्रकाश है तुम्हारा वक्ष धरती बनकर है मेरे पास
तुम्हारे होने से पूरी पृथ्वी मेरी अपनी है घर की तरह
चिड़ियों की चह-चह में तुम्हारे ही शब्द हैं मेरी मुक्ति के लिए
मुक्ति के बिना शब्द भी सहचर नहीं बनते हैं
मुक्ति के बिना सपने भी आँखों के घर में नहीं बसते हैं
मुक्ति के बिना प्रकृति का राग भी चेतना का संगीत नहीं
मुक्ति के बिना आत्मा नहीं समझ पाती है प्रेम की भाषा
मुक्ति के बिना सब कुछ देह तक सीमित रहता है मुक्ति में ही होती है देह विदेह ।

।। अल्पना ।।

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कलाई की आँखें
प्रतीक्षा में हैं
आँखों की चौखट में विश्वास की अल्पना है ।
मथुरा-मंदिर के पाषाण छत्र पर अपने दुःख को मौन में साधे हुए कपोत-युगल समूह कृष्ण और राधा के प्रणय की अनन्य रागिनी को सुनते हैं हवाओं की साँसों में और गुनते हैं प्रणय की प्राण-शक्ति जो एकनिष्ठ होकर ही सर्वनिष्ठ है
राधा-भाव की तरह स्मृति में जीती हूँ कृष्णानुराग और 'तुम' हो जाती हूँ तुम्हारी प्रतीक्षा में ….।

।। अक्षय स्रोत ।।

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शब्द तुम्हारी तरह देखते हैं मुझे और मैं शब्दों की तरह तुम्हें
ईश्वर के प्रेम की छाया है तुम्हारी आत्मा पर ईश्वर अंश है तुम्हारा चित्त
तुम्हारे प्रेम में प्रेम का ईश्वर देखती हूँ तुम्हें स्पर्श कर मैं प्रेम का ईश्वर छूती हूँ
शब्दों में तुमने रचा है प्रेम का ईश्वर पवित्र पारदर्शी ईश्वरीय प्रेम …. I

।। अग्निगर्भी शक्ति ।।

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धूप में बढ़ाती हूँ अपनी आत्मा की अग्निगर्भी दीप्ति तुम तक पहुँचती हूँ तुम्हारे लिए ।
अक्षय प्रणय प्रकाश तुम्हारी मन-खिड़की से पहुँचता होगा निकट से निकटतर कि नैकट्य की नूतन परिभाषाएँ रचती होंगी तुम्हारी अतृप्त आत्मा ।
वृक्ष को सौंपती हूँ वृक्ष की अंतस अनुभूतियाँ
अपनी धड़कती आकांक्षाएँ जो तुम तक मेघदूत बन पहुँचता है गहरी आधी रात गए ।

।। ईश्वरानन्द ।।

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मैं
तुम्हारे प्रेम का धान्य हूँ और तुम ह्रदय का विश्वास ।
तुम्हारी स्मृति-कुठले में संचित उपजाए अन्न की तरह हूँ ।
अपनी अन्तःसलिला में रूपवान मछली की तरह तैरने देना चाहते हो मुझे ।
तुम जीना चाहते हो मुझमें प्रेम का सौन्दर्य और मैं पीना चाहती हूँ सौन्दर्य-सुख ।
जीवन का विलक्षण आनन्द-प्रेम 'धर्म' के लिए 'ईश्वरानन्द' है जो ।

।। योग साधना ।।

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प्यार की
पहली सिहरन में मुँदी पलकों के भीतर जगी आँखों ने जाना देह-भीतर देह का जादू ।
खामोश शब्दों ने किलक कर जन्म लिया नवानुभूति से भरकर ।
अनुभूति की उड़ान-सुख में अनुभव किया अपनी ही देह का अमृतस्राव प्रिय अधर में ।
चाँद निहारने वाली आँखों ने जाना चाँद का सुख जो साधना के योग से मिलता है भोग की साधना से नहीं ।
तुम्हारे स्पर्श ने पिलाया है प्यार का अमृत अपने स्पर्श में भर लेना चाहती हूँ तुम्हारे अंतरंग का रोम-रोम ।

।। अवगाहन के लिए ।।

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सेमल के फूल-सी अनुभूति की मुट्ठी में समेट लेना चाहती हूँ प्रणय का संपूर्ण सुख तुम्हारी हथेली थामकर ।
प्रकृति का अनन्य सुख जानने के लिए देह से रिसकर एक अनंत राग के अवगाहन के लिए तुम्हारे अपनेपन में समाती हूँ चुपचाप कभी तुम्हारे विश्वास की प्रणय-घाटी में कभी तुम्हारे आत्मीय अधर के अमृत-कुंड में ।
मेरे ही प्राण तुम्हारे प्राण बनकर धड़कते हैं अब मेरे वक्ष-भीतर तुम्हारी छवि छूती है मेरी मन-छाया
तुम्हारी हुई धड़कनों में बजती है तुम्हारी ही धुन जैसी कृष्ण ने बजायी थी आत्मा के प्रणय-नाद के निनाद के लिए ।

।। वियोग-सुख ।।

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तुमसे छुपाकर जीती हूँ तुम्हारा वियोग ।
आवाज में ही दवा ले जाती हूँ रूलाई । लिखने से पहले शब्दों से खींच लेती हूँ बिछोह की पीड़ा ।
तुम तक पहुँचने वाले सूर्य और चन्द्र में चमकने देती हूँ तुम्हारा चूमा हुआ प्रेम ।
वियोग-संताप को घोलती हूँ रक्त भीतर कि आँख में जन्म न ले सकें आँसू ।

।। तुम्हारे शब्द ।।

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घर में तुम घर की तरह बचे हो मुझमें मेरी तरह ।
मेरे मौन में समाई है तुम्हारी ख़ामोशी जैसे मेरे शब्दों में तुम्हारे शब्द ।
तुम्हारी कंघी को फिर लेती हूँ अपने केशों में तुम्हारी सहलाती हथेली हैं वे
तुम्हारी अनुपस्थिति को भरती हूँ तुम्हारी ही सुगंध से तुम तक पहुँचने के लिए घनेरी रात में ।
तुम्हारी छोड़ी हुई हर चीज को छूती हूँ कि जैसे अपने स्पर्श में से बचे हो तुम हर वस्तु में ।
तुम्हारे देखे गए दर्पण में आदमकद देखती हूँ खुद को लेकिन तुम्हें ही पुनर्प्राणार्जित मेरी साँसों में चलती हैं तुम्हारी साँसें ! जैसे तुम्हारे जीवन में मेरा जीवन ।

।। व्याकुलता के विरुद्ध ।।

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मेरी घड़ी में जागता है तुम्हारा समय मेरी साँसों में तुम्हारी साँसें ।
अपनी आँखों को जोड़ दिया है तुम्हारी आँखों से जी जुड़ाने के लिए ।
तुम्हारी महक को
बचा लाई हूँ सामानों में  कि वे स्वप्न बन गए और कमरे में तुम्हारी पहचान की सुगंध अकेलेपन की घुटन के विरुद्ध है ।
तुम्हारे सामान मेरे सामानों को अपनी पहचान दे रहे हैं, तुम्हारी हथेली की तरह ।
मेरा प्रेम धरती के अनोखे पुष्प-वृक्ष की तरह खिला है तुम्हारे भीतर
आँखें अपना चेहरा देखना चाहती हैं तुम्हारी आँखों के प्यार में ।

।। चुपचाप ।।

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आँखों के भीतर आंसुओं की नदी है । पलकें मूँदकर नहाती हैं आँखें । अपने ही आँसुओं की नदी में दुनिया से थककर ।
ओठों के अंदर उपवन है, जीते हैं ओठ । चुप होकर स्मृति प्यास से जलकर एकाकीपन की आग में ।
ह्रदय की वसुधा में प्रणय का निर्झर नियाग्रा है मेरे लिए ही झरता हुआ ...।

।। मानसरोवर में ।।

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खिलती है पँखुरी दर पँखुरी सृष्टि पराग की पुनर्सृष्टि के लिए देह के मानसरोवर में ।
देह की परतों के भीतर स्पर्श रचता है प्यार का भीगा-भीना सुख विलक्षण अनुभूति इतिहास ।
देह प्रणय का ब्रहमाण्ड है । साँसों की आँखें स्पर्श करती हैं स्नेह का अंतरंग कोना तक जहाँ साँस लेता है ब्रहमाण्ड ।
प्रणय की पुनर्सृष्टि की शक्ति है अदृश्य लेकिन स्पर्श के भीतर दृश्य इसी विश्वास में प्रेम धड़कता रहता है भजन बनकर ।

।। प्राणाग्नि ।।

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अशोक वृक्ष-सा आवक्ष लेता है प्रणय साँसें लिखती हैं अछोर गुप्त-लिपि मन की जड़ों तक तितिक्षा से मिलने के लिए ।
मेरे-तुम्हारे प्रणय की साक्षी है प्राणाग्नि अधरों ने पलाश-पुष्प होकर अभिषेक किया है प्रणय-भाल मन-मृग की कस्तूरी सुगंधित है जहाँ साँसों ने पढ़े हैं अभिमंत्रित सिद्ध मंत्र
एक दूसरे के देह-कलश के अमृत-जल ने पवित्र की है देह मौन स्पर्श ने लिखे हैं अघोषित शब्द
देह के हवन कुंड में पवित्र-संकल्प के साथ समर्पित हुई है प्राणों की चिरायु शक्ति
अधरों ने अधरों पर लिखा है प्रणय का प्रथम संविधान प्रेम का नव्य संयुक्तानुशासन एकत्व और एकात्मकता के लिए ।

।। साधक की तरह ।।

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आँखों में रखी हैं तुम्हारी तस्वीरें मेरी आँखें तुम्हारा ही एलबम हैं ।
प्रेम की आवाज गूँजती और बजती है भीतर-ही-भीतर नए राग की तरह रागालाप में लगी रहती है निरंतर साधक की तरह ।
धड़कनों में धड़कती हैं तुम्हारी ही धड़कनें साँसों में प्रणय-साधना अविचल
खजुराहो के शिल्पी की तरह गढ़ी है एक प्रणय-प्रतिमा जीवंत जिसे अपनी आँखों से अनावृत्त किया है तुमने मेरी आँखों में ।