शनिवार, 31 अगस्त 2013

।। सजल ।।


















उसने
अपनी माँ का
बचपन नहीं देखा
पर
बचपन से देखा है उसने
अपनी माँ को ।

जब से
समझने लगी है
अपने भीतर का सब कुछ
और
बाहर का थोड़ा-थोड़ा

लगता है
उसकी माँ की तरह की औरत
आकार लेने लगी है उसके भीतर

वैसे ही
गीली रहती हैं आँखें
वैसे ही
छुपाकर रोती है वह ।

दुःख से ललाये गालों को देख
किसी के टोकने पर तपाक बोल पड़ती है वह
प्रेम-सुख से बहुत सुंदर हो रही है वह
इसीलिए कपोल हैं लाल
और आँखें सजल ।

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

।। एक दूसरे में ।।

















चिड़िया की देह का
हिस्सा होकर भी
कुछ पंख
चिड़िया की उड़ान में
शामिल नहीं हैं ।

पर्वत होने पर भी
शिखर बनने से
रह जाते हैं
पहाड़ के कुछ हिस्से ।

हवाएँ
लिखती हैं उन पर
चढ़ाई की वेदना ।

नदियाँ
अपनी तरल धार के प्रवाह में
हथिया कर बहा लाती हैं उन्हें ।

नदी में
घुल जाते हैं शिखर
शिखर के रंग को रँग कर
नदी कभी हो जाती है शिखर
शिखर हो जाता है नदी
रेतीला, रुपहला और कभी
गेरुई और मटियाला ।

दोनों की देह विसर्जित
एक दूसरे में
एक दूसरे के लिए ।

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

।। हम दोनों ।।


















विदेश प्रवास में
हम दोनों प्रवासी शब्द की तरह हैं
हेमचन्द्र के शब्दानुशासन से परे
पाणिनी के अष्टाध्यायी-व्याकरण से दूर
शब्दकोष से परे
आखिर,
मैं और तुम
शब्द ही तो हैं

शब्दों में साँस लेती हुई धड़कने
नवातुर अर्थ के लिए आकुल
सघन-घन-कोश में
आँखें पलटती हैं मेघों को पृष्ठ-दर-पृष्ठ
कभी फूलों के पन्नों को उलट-उलट
सूँघती हैं सुगंध का रहस्य
कभी सूरीनाम और कमोबेना नदियों से
पूछती है अनथक प्रवाह का अनजाना रहस्य

हम दोनों
'प्रवासी' शब्द की तरह हैं
अधीर और व्याकुल
अंतःकरण के वासी
नाम
शब्दों की तरह
ओठों की मुलायम धरती पर खेलते हैं
स्नेह-पोरों से पलते हुए बढ़ते हैं शब्द
समय में समय का
हिस्सा बन जाने के लिए
अंश में अंशी की तरह
रहते हैं शब्द
जैसे विदेश में
          समाया रहता है स्वदेश
जैसे मुझमें बसा रहता है
          तुम्हारा आत्मीय अर्थ-बोध ।

बुधवार, 28 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (6)


















गोल्फ अमीरों का खेल है, अपनी इस धारणा के नाते उसने कभी अमीरों के इस खेल की ओर देखा तक नहीं था । खेल तो खेल …स्पोर्ट्स की ख़बरों और अख़बारों में छपती तस्वीरों और पत्रिकाओं के प्रचार पृष्ठों पर गोल्फ की गेंद तक को वह नहीं निहारती थी । लेकिन अब वह गोल्फ के मैदान में है …और इस खेल को सीखना शुरू किया है । पहली दफा अपने गोल्फ शिक्षक को एक घंटा सिखाने के लिए पचास यूरो देते समय उसे लग रहा था …बस…अब अगली बार गोल्फ खेलने के लिए कोई दिन …समय …तिथि नहीं निश्चित करेगी । नो एपाइंटमेंट एट ऑल । मन ही मन रोप की हथेली में पचास यूरो मतलब ढाई हज़ार से अधिक की रकम रखते हुए शीला ने मन से उन्हें नमस्कार किया था । लेकिन उसके खेल की शुरुआत अच्छी होने के कारण और उसके ट्रेनर रोप के बेहतर तरीके से टिप्स दिए जाने के कारण उसे भीतर से यह लगा था कि वह गोल्फ खेल सकती है । फिर उसके पति ने भी गोल्फ के लिए उससे बहुत ज़िद की थी । गोल्फ के प्रति उसकी रूचि जगाई थी । उनका मानना है कि गोल्फ से 'जीवन के साथ का' और 'साथ के जीवन का' अद्भुत सुख महसूस किया जा सकता है जो अन्य किसी खेल से संभव नहीं है । हर खेल का अपना एक तनाव होता है । कन्टीन्यूस एक्टिव रहने की डिमांड होती है । लेकिन गोल्फ में ऐसा नहीं है । प्रायः यह 'दोस्तों का' और 'दोस्ती का' खेल है । ख़ैर …शीला ने यह सारी दलीलें मान लीं और पंद्रह दिन में एक दिन फिर प्रशिक्षण लेने का निर्णय लिया और शेष सप्ताह में तीन दिन स्वयं प्रैक्टिस करती थी ।
एक दिन शीला ने नाइन्थ होल कवर करके रोप से कहा कि मेरा पर्स कार में रह गया है …मैं वहीं चलती हूँ …फिर गोल्फ ऑफिस जाकर शीला को नया अपाइंटमेंट भी बनाना था …इसलिए उसने कार में अपनी टॉली रखी, जूते बदले और गोल्फ ऑफिस की ओर बढ़ी । जहाँ रोप एक स्त्री के साथ खड़ा उसका इंतज़ार करता हुआ दिखाई दिया । पहुँचने पर उसने परिचय कराया ।
'सी इज़ माई गर्लफ्रेंड एना' रोप ने कहा ।
'नाइज़ टू सी यू, आई एम शीला' कहते हुए शीला ने बढ़कर हाथ मिलाया । शीला ने देखा कि उसकी गर्लफ्रेंड को तकरीबन सात या आठ माह का गर्भ था । शीला ने आँखों में खुशी लेकर उसे फिर से शुभकामनाएँ देते हुए हाथ बढ़ाया और कहा, 'व्हेन दिस ड्रीम इज़ एस्पेक्टेड ।' 'ऑफ्टर टू मन्थ्स' रोप ने उमगकर जवाब दिया और एना के पेट पर ऐसे हाथ फेरने लगा जैसे अपने शिशु को सहलाते हुए उस पर अपना प्यार उड़ेल रहा हो ।
'कॉन्ग्रुचुलेशन्स, आई वान्ट टू गो नाओ, माई हस्बैंड इज़ वेटिंग देअर' शीला थोड़ा शरमाते हुए बोली ।
'एस, एस, हैव ए नाइस इवनिंग' कहकर दोनों विदा हुए । शीला तेज़ी से बार-लाउंज की ओर बढ़ी । अब वह गर्भवती स्त्रियों के पूरी तरह से झाँकते-उझकते हुए उदर को देखकर चौंकती नहीं है । गर्भवती महिलाओं के लिए आरामतलब परिधानों की भरपूर विशिष्ट दुकानें हैं, जहाँ गर्भ को प्रोटेक्ट और प्रोजेक्ट करने वाली विशेष ड्रेसेज मिलती हैं । यह सोचते हुए वह अपने हस्बैंड के सामने पहुँच गयी जहाँ वे बीयर का गिलास लिये हुए शीला की राह देख रहे थे ।
'हैलो माई डियर …हाउज़ योर प्ले' शेखर ने उमगकर पूछा ।
'फाइन, अरे, रोप की गर्लफ्रेंड मिल गयी थी । वह तो फुल डेज़ में प्रेगनेंट है …। बिना विवाह के ही …। वंडरफुल …।' शीला ने बैठते ही बताया ।
'इसमें चौंकने की कौन-सी बात है …यह कोई अपराध थोड़े ही है …इट इज़ नॉर्मल हियर । बच्चे के जन्म से पहले सिर्फ पार्टनर के रूप में रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी है । विवाह करना यहाँ की दृष्टि से जरूरी नहीं है । यह सिर्फ लक्ज़री है …वैसे रोप अगले हफ्ते अपने विवाह की औपचारिकता भी पूरी करने जा रहा है ।' शेखर ने बहुत इत्मीनान से बताया ।
'हम लोग चलेंगे या नहीं ।' शीला ने उत्सुकता से जानना चाहा ।
'तुम्हें तो मालूम है, यहाँ विवाह में प्रायः पंद्रह-बीस लोगों को ही बुलाते हैं । सिटी हॉल में रिंग सेरेमनी होती है और इसके बाद एक हल्का-सा वाइन-बीयर का रिशेप्सन होता है । वैसे मैंने रात में उसके घर के लिए अपने डीलर को शैम्प्येन भेजने का ऑर्डर कर दिया है जिससे मैरिज सेरेमनी के बाद घर आकर वह शैम्प्येन से अपने उस मूवमेंट को इन्ज्वॉय कर सके ।' शेखर ने तसल्ली से अपनी बात कह दी । शेखर दूसरों की खुशी का बहुत ख्याल रखते हैं और यही शेखर की खासियत है जो उनकी पहचान को और आदमियों से अलग करती है ।
वेटर के आने पर शीला के लिए भी बीयर और क्रोकेड '1' का शेखर ने ऑर्डर किया । इसी बीच शेखर का एक गोल्फ पार्टनर भी आ गया । शेखर ने उसका शीला से परिचय कराया और फिर वे दोनों डच में बातें करने लगे ।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

।। मन-माटी ।।



















प्रेम
धरती के अनोखे
पुष्प-वृक्ष की तरह
खिला है
तुम्हारे भीतर

अधर
चुनना चाहते हैं
वक्ष धरा पर खिले
पुष्प को ।
जिसमें
तुम्हारी मन-माटी की सुगन्ध है
अद्भुत ।

तुम्हारे
ओठों के तट से
पीना चाहती हूँ
प्रेम-अमृत-जल
शताब्दियों से उठी हुई
प्यार की प्यास
बुझाने के लिए ।

सोमवार, 26 अगस्त 2013

।। प्रकाश-सूर्य ।।

























मौन प्रणय
लिखता है शब्द
एकात्म मन अर्थ

मुँदी पलकों के
एकान्त में
होते हैं स्मरणीय स्वप्न

प्रेम
उर-अन्तस में
पिरोता है स्मृतियाँ
               स्मृतियों में राग
               राग में अनुराग
               अनुराग में शब्द
               शब्द में अर्थ
               अर्थ में जीवन
               जीवन में प्रेम
               प्रेम में स्वप्न

प्रणय-रचाव शब्दों में
होता है सिर्फ प्रेम
जैसे सूर्य में सिर्फ
प्रकाश और ताप ! 

रविवार, 25 अगस्त 2013

।। स्नेह-ग्रंथ ।।

























देह
नेह-ग्रंथ है
अधर
पृष्ठ-दर-पृष्ठ पर
लिखते हैं
बोले हुए अनबोले शब्द
चुपचाप
कि
बिछोह के व्याकुल क्षणों में
फड़फड़ाती है देह
शब्द-पक्षी की तरह

शब्द
उड़ जाना चाहते हैं
प्रिया के देह-पृष्ठ से
प्रिय के देह-पृष्ठों से
गुँथने के लिए ।

शनिवार, 24 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (5)


















शेखर और शीला घर पहुँचे । शेखर ने विशेष चाभी लगाकर अपने अपार्टमेंट का प्रवेश-द्धार खोला । लिफ्ट का बटन दबाया । लिफ्ट में उन्हें अपनी ही बिल्डिंग की ओल्ड डच लेडी रित मिली । उनका चेहरा बहुत उदास था । शीला ने आगे बढ़कर उनसे पूछा, 'सब कुछ ठीक है …।' रित ने धीमी और रूँधी हुई बुझी आवाज में डच में जबाव दिया । 'परसों रात ग्यारह बजे विम को ब्रेन हेमरेज हो गया था । चेहरा और सिर बुरी तरह सूज और फूल गया था । मैं तो बहुत डर गई थी । अब बायाँ हाथ-पाँव पैरालाइज्ड हो गया है …न कुछ देख पाते हैं और न बोल पाते हैं …पूरे सिर में खून इस तरह फैल गया है और भर गया है कि कैट-स्कैनिंग भी नहीं हो सकती है अभी । वह जब थमे तो ठीक से ईलाज शुरू हो । मैंने तो डॉक्टर से कह दिया है कि ऐसी स्थिति में इन्हें मरने की दवा दे देना क्योंकि ऐसे व्यक्ति के साथ अपनी ज़िंदगी लेकर जीना बहुत मुश्किल है ।' रित एक साँस में पूरी बात कह गयी थी । सुनकर शीला सन्न रह गयी थी । विम के ब्रेन हेमरेज की खबर सुनकर वह इतना आश्चर्य और दुःख से नहीं चौंकी थी जितना रित की कहनी से वह डर गयी थी ।
पिछले ही साल रित के पचहत्तर साल पूरे होने की खुशी में विम ने दौड़-भाग करके सारी तैयारी की थी । सबके दरवाज़े-दरवाज़े दस्तक देकर न्यौता दिया था । शैम्प्येन पिलाई थी । शीला को विम के इस उत्साह से इतनी खुशी हुई थी कि ऊपर अपने अपार्टमेंट में जाकर, कैमरा लाकर, इन दोनों की कई तस्वीरें बनाई थीं । जैसे लोग नवविवाहित होने पर पोज़ और मुद्राएँ देकर फोटो खिंचवाते हैं, वैसे ही उन्होंने फोटो खिंचवाईं । इस उम्र में भी विम ही घर-बाहर का सब काम देखता था । किचन से लेकर गैराज और गार्डन तक उसके जिम्मे था । कपड़ा, बर्तन धोने से लेकर कार ड्राइव करने तक का काम भी वही सँभालता था । तभी तो रित की झुर्री लिपटी हथेली में भी गुलाबी नेल पॉलिश दमकती रहती थी और पचहत्तर वर्ष की उम्र में भी रित की मुस्कान चमकने से पहले गुलाबी लिपस्टिक की चमक लोगों की आँखों में चिपक जाती थी । रित के बुढ़ापे का यौवन विम की सेवा से खिला हुआ था । वह रित आज विम के ब्रेन हेमरेज होने पर उसके मर जाने की इच्छा रखती है । इतना तक प्यार नहीं कि कुछ तो सेवा कर ले …। आखिर विम को ब्रेन हेमरेज के बाद यह तो सदमा न लगे कि जिसका उसने जीवन-भर ख्याल रखा …सेवा की, प्यार किया, वह कुछ माह भी न सँभाल सकी उसे । आखिर कितने दिन अब वह और ठीक से जियेगा ? लेकिन रित …आह ? ऐसा नहीं सोचती है । वह ज़िन्दगीभर अपने लिए जीती रही थी । और आज भी सिर्फ़ अपने लिए जीना चाहती है और शेखर की माँ, बप्पा के न होने पर आज भी बप्पा के लिए जी रही है और सपने में भी उनकी ही सेवा के बारे में सोचती है ।
शीला को समझ में नहीं आता है कि आखिर ज़िन्दगी कैसा कौर है जिसे कितना भी खा ले, पर उसका पेट नहीं भरता है और कोई है कि चखते ही वह उसे दुबारा अपने मुँह में नहीं रखना चाहता है । ज़िन्दगी और प्यार का स्वाद हर एक के लिए अलग है इसलिए भूख भी अलग और चाहत भी अलग …साथ ही उसको पाने के तरीके और भी अलग …और भी अनोखे…।  

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

।। परिभाषाओं से परे ।।


















प्रेम में
व्यक्ति
अपने प्रिय के लिए रचता है
बाहर और भीतर
एक नई दुनिया

प्रेम के अनुकूल
और उसके ही
प्रेम से बनी
जैसे कोरे काग़ज़ पर
वह लिखता है
प्रेम के लिए चिट्ठी
प्रेम की सारी परिभाषाओँ से अलग ।

प्रेम की नई भाषा
अपने अनोखे प्रिय के
समर्पित प्यार के लिए
वैसे ही
वह उसके लिए
बनाना चाहता है नया घर
प्रेम-घर ।

अतीत के सभी चिन्हों को मिटाकर
बीते हुए एकाकीपन से पियराये
और गली हुई उदास साँसों से
धुआँई दीवार पर
अपने प्यार की चमकती साँसों से
धवल कर देना चाहता है
ज़िन्दगी के अकेलेपन की
कालिख हुई दीवार को

प्रिय के प्यार के
सुख के लिए
रचना चाहता है
एक नया संसार
जो किसी भी दुनिया से
सुन्दर हो
और उसके कहे की तरह
विश्वसनीय

प्रकृति की बदनीयती से भी
बचाकर रखना चाहता है
अपना प्यार

प्रकृति की दैविक, दैहिक और भौतिक आपदाओं से
परे रखना चाहता है वह
अपना प्यार और प्रिय

प्रकृति को
सबसे सुन्दर सृष्टि के रूप में
बचाए रखना चाहता है
अपना प्रिय
और उसके लिए
प्रकृति

प्रकृति से मिटा देना चाहता है
वह हिंसा का खून
और अविश्वास का झूठ
कि उसकी प्रिया के ह्रदय से
डर मिट सके ।

अपने जीवन का
सर्वोत्तम सौंपकर
पृथ्वी की ओर से
अपनी प्रिया की
आँखों में विश्वास का संसार
रचना चाहता है वह

निर्भय होकर
अपनेपन से भरकर
उसके भुजपाश में सिमटकर
विश्वास के वक्ष का आलिंगन
ले सके
जैसे पक्षी … ।

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (4)


















पिता की देह में ही जिस माँ की जान थी और जीवन था वह माँ अब पिता के बिना अकेले वृद्धालय में रह रही हैं । उनके इस भीतरिया दुःख को शेखर और शीला अपनी रगों में महसूस करते हैं । शीला और शेखर रोज़ ही साँझ को समय निकाल कर उनके पास जाते हैं । यूरोपीय वृद्धालय का उबला हुआ खाना … माँ को भला कहाँ तक भाता होगा । यद्यपि बूढ़े लोगों का सारा खर्च सरकार उठाती है और प्रति बूढ़े व्यक्ति पर साढ़े तीन हज़ार यूरो हर माह खर्च करती है । ओल्ड हाउस में मनुष्यों की जरूरतों का बसा-बसाया कैम्पस-घर होता है । फिर भी दस-दस बच्चे पालने वाली माँ के लिए घर का कोना भी घर होता है । वह अपने लक्ज़री से पूर्ण कमरे से भी या तो हमेशा सड़क देखती रहती है या तो पाँचवीं मंजिल से झाँक-झाँक कर शेखर और शीला के आने की, पहचानने की कोशिश करती रहती है और अँधेरा होने पर अपने कमरे में अध-अँधेरा किये - दरवाज़े की ओर मुँह ताके आरामकुर्सी में बेचैन बैठी रहती है कि कब वे दोनों आयें और माँ के बुढ़ापे के अकेलेपन के अँधेरे को दूर करें । अपनी आँखों के उजाले से माँ की बूढ़ी आँखों में देखने की रोशनी दें ।
'ममा' शब्द सुनकर शेखर की माँ जैसे जीवन पा जाती हैं । प्रतीक्षा की कशिश से मुरझाया चेहरा खिल पड़ता है । यद्यपि बुढ़ापे ने उनकी देह की कांति को खुरचकर उस पर झुर्रियों की पर्तें चिपका दी हैं । बावजूद इसके झुर्रियों के बीच से भी शेखर और शीला को देखने का सुख रिस आता है जिसे पीकर शीला की आँखें भी बहुत आत्मीय आनंद से जीती हैं ।
आठ बज रहा था । वैसे वे दोनों रोज़ ही सात बजे तक कुछ पका हुआ भारतीय स्वाद का खाना और संतरे या अनन्नास का जूस लेकर पहुँचते थे … पर आज देर हो गयी थी ।
बयासी वर्ष की बूढ़ी देह की करिहाऊँ और पीठ पिरा आई होगी । पीठ के साथ-साथ गर्दन भी कुछ झुक और लटक गयी होगी । यह सोचकर शीला कुछ तेज़ बढ़ी । दोनों लिफ्ट के भीतर हुए । लिफ्ट के आईने में एक-दूसरे ने अपने को निहारा । हल्का-सा निरखा । फिर एक-दूसरे की आँखों में … और मुस्कराकर होंठ चूम लिये । पाँचवीं मंजिल आयी । लिफ्ट का दरवाजा खुला । वे कॉरीडोर से होते हुए पाँच सौ पाँच नंबर के अपने माँ के कमरे के सामने पहुँचे । दस्तक दे कर उन्होंने दरवाजा धकेला ।
आधे कमरे में अँधेरा था और उस अँधेरे में माँ उदास बैठी हुईं थीं । लेकिन दरवाजे के खुलने से उनके सिकुड़े होठों में मुस्कराहट ने भी जैसे अपने कपाट खोल दिए थे ।
माँ की बगल में अपनी कुर्सी खींचते हुए शीला ने पूछा, 'ममा ! दोपहर में क्या खाने को मिला था ?'
'अरे कुछ न पूछ … वो ही रोज़ की नाई उसनन आलू और पोई की भाजी … और एतत लम्बका रहा … हम न जानी कौन चीज़ का गोश रहा … हम न खइली ।' हर दिन की तरह बड़े उदास मन से माँ ने कह दुहराया । शीला रोज-रोज यही किस्सा सुनकर मन ही मन खीझ उठी थी ।
'माँ, अभी तुम्हें बीस बरस और जीना है' - माँ में नये तरह का उत्साह भरने के उद्देश्य से अतिरिक्त जज्बे से शीला बोली ।
'अरे, न बोल अइसन ।' माँ ने बरजते हुए कहा ।
'पता नहीं, इसके बाद कौन और कैसी दुनिया में जाओ । यहाँ तो हम सब हैं … सब सुख है । तुम्हारी तंदरुस्ती अच्छी है । एक दवाई नहीं लेनी पड़ती है और क्या चाहिए तुम्हें ?' शीला ने हार न मानते हुए माँ को फिर हिम्मत बँधाने की कोशिश की ।
'न अअअ … अब हम हियाँ न जिअब … । थक गइली हई । बहुत भइल' माँ ने बहुत बुझे हुए मन से लेकिन दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया ।
'काहे ?' शीला तपाक से माँ के लहजे में पूछ बैठी ।
'अरे, अब तोके का बताई हुँआँ … ऐकेर बप्पा हमार बाट जोहत बाटें । जब, तब सपना में आवे हैं … अब्बे काल सपना में आये रहें तो बोलत रहे कि हम बहुत दिन से भात न खइली हई । मकई के दाना भूज-भूज के भूख काटत बाटी । हमार शर्टवा भी बहुत दिन से न धुलल है … और अब का-का बताई ?' बोलकर माँ चुप्पी लगा गयी । जैसे वह यहाँ बेवजह फँसी हुई है … उनकी जरूरत और दरकार तो बस बप्पा के पास ही है । वह उन्हीं के लिए बनी हैं और बप्पा की दुनिया में ही उनकी दुनिया है ।
सुनकर शीला की आँखों में आँसू भरभरा आये । प्रेम… पति से प्रेम … और पति के प्रेम के विश्वास के साथ ऐसा अटूट लगाव … वह भी इस युग में । जहाँ दुनिया ही बदल गई है । दूसरा विवाह या इतर संबंध जैसे जीने की जरूरत बन गये हों । संबंध स्वार्थ के पर्याय बनकर बचे हुए हैं । सेवा और त्याग सिर्फ़ होठों के लिए शब्द के रूप में शेष हैं । वहाँ बयासी वर्ष की माँ आज भी पिता की सेवा के लिए उनके ही लोक जाना चाहती हैं, जहाँ वे हैं । जबकि ख़ुद की जर्जर देह की हालत यह है कि कोई नहलाये तो नहा लेंगी । कोई खाना सामने रख दे तो अपने काँपते से किसी तरह से कौर अपने मुँह में धर लेंगी । ऐसी हालत में वह बप्पा खातिर भात बनाने और शर्ट धोने के लिए यह धरती छोड़कर भागना चाहती हैं । यूरोप का चकाचौंधी लास्य उनकी धुआँई आँखों को अपनी चमक की बाँहों में नहीं समेट पाता है । अभी भी इनकी आँखों में चइला से सुलगने वाले चूल्हे की आग ही भभकती रहती है जिस पर हँड़िया धरकर वह बप्पा के लिए जब-तब भात बनाकर इंतज़ार करती रहती हैं ।
इस दिल हिलाने वाली भावुक संवेदना में धँसकर शीला माँ से आगे बातें न कर सकी । माँ को हँसाने का साहस उसके भीतर से निकल गया था । उसने भीतर ही भीतर अपने आँसू सोखते हुए माँ के कपड़े बदले । सोने के लिए गाउन पहनाया । उनके नकली दाँतों का सेट मुँह से निकलवाकर अपने हाथ में लिए । टूथब्रश से साफ करते हुए सोच रही थी, ममा अब नकली दाँतों में नकली हँसी लेकर नहीं जीना चाहती हैं लेकिन जैसे वह हर रात ममा के नकली दाँतों को सुबह की मुस्कराहट के लिए चमका देती है, यदि वैसे ही मुस्कराहट भी चमका सकती तो माँ के अकेलेपन का दुःख भी दूर हो जाता और इससे शीला तथा शेखर के मन में माँ के हार्दिक विषाद को लेकर जो पीड़ा है वह भी कुछ कट जाती ।
शेखर ने रोज की तरह माँ को बिस्तर पर लिटाया । उनके गाल चूमे और अच्छे से सोने को कहा । शीला ने अपने मन को सँभालते हुए और माँ के मन को हल्का करने के लिहाज से कहा, 'ममा, हमें डर है कि बप्पा का सपना देखने में कहीं तुम हम सबको छोड़ कर चली न जाओ । इसलिए आज सपने में हमें देखना …. ।' शीला का कहना अभी ठीक से पूरा भी न हुआ था कि 'बप्पा जब सपना में न आवे हैं तो मुनिया गाय का सपना देखीला । बड़ी भली रहल… । एक पुकार में धौरत आवत रहा । तोकै तो पूरा दिन जोह्वे के पड़ेला … ।' ममा ने पूरी ताक़त से ज़ोर लगाकर अपनी बात ही नहीं बल्कि अपने मन की पीड़ा भी कह डाली ।
शीला ने माँ के कपोलों को चूमा । उनकी ममता पगी और प्रेमरसी आँखों में अपनी भीगी आँखें डाल दीं । आँसू के दो बूँद माँ के होठों में गिरे ।
'रोओ न … अब्बे तो हम बाटी … । राम-राम बोल ।' माँ ने सधी आवाज में कहकर बिदा ली । शेखर और शीला का मन आज माँ की उदासी से अतिरिक्त बोझिल था और उनके लिए इस बोझ से मुक्त होना मुश्किल हो रहा था ।

रविवार, 11 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (3)

























शीला ने शेखर को याद दिलाया कि 'आज मेयर की वेलकम रिसेप्शन पार्टी में जाना है । शाम छह से आठ बजे के बीच का समय निर्धारित है । अभी घर चलकर फ्रेश-अप भी होना है ।' सुनते ही शेखर तेज क़दमों से अपनी कार की ओर बढ़ा । सौ से एक सौ बीस के आस-पास की एलाउड स्पीड से चलती हुई कार भी भीतर की हड़बड़ी के कारण रेंगती हुई महसूस हो रही थी ।
विन्टरकोनिंग के अपने घर से जल्दी से फ्रेश होकर … ड्रेस बदल कर शीला और शेखर सिटी सेंटर के रिसेप्शन हॉल पहुँचे । न कोई चेकिंग … न कहीं कोई किसी तरह की पुलिस … न कहीं मेटल डिटेक्टर … न कहीं पास । अख़बार में ख़बर थी कि जो भी मेयर से मिलना चाहता है उसका स्वागत है । हाउस इस ओपेन फॉर ऑल । खास लोगों के बीच आम लोगों की भीड़ शीला को मोहक लगी । वे दोनों ओवरकोट रखने के यार्ड की ओर बढ़े । अपने ओवरकोट दिए । शेखर ने 'नंबर-कार्ड' अपने कोट की जेब में डाल लिए । वाइन … शैम्प्येन, जूस ट्रे में लिए हुए टीन एज़र वेटर लड़की आयी । शेखर और शीला ने शैम्प्येन ली । चियर्स कहा और मेयर से हाथ मिलाने वाले लोगों की लाइन में खड़े हो गए ।
सिटी मेयर अपनी पत्नी के साथ नीदरलैंड देश के झंडे के बगल में खड़े थे । हाथ में ली हुई वाइन और शैम्प्येन की लोग चुस्कियाँ लेते जा रहे थे, आपस में हाथ मिलाते हुए मुस्कराहट और बातों की चुस्कियाँ भी अजनबी चेहरों से रह-रह कर सोख रहे थे । इस तरह से वह धीरे-धीरे सरककर आगे बढ़ रहे थे और मेयर के करीब पहुँच रहे थे । कुछ के हाथों में मेयर के स्वागत के लिए फूलों के गुलदस्ते और प्रेजेंट थे । किसी को हड़बड़ी नहीं थी । सब कुछ सहज गति से बढ़ रहा था ।
शीला ने देखा कि मेयर के सचिव जो शेखर के अच्छे दोस्त भी हैं और क़िले में संपन्न हुई शेखर की भव्य शादी में अपनी पत्नी के साथ आये थे, फेमिली डिनर में भी शामिल होकर आधी रात के बाद तक रुके रहे थे । विवाह की फ़ोटो भी दूसरे दिन ई-मेल द्धारा भेजी थी । उस रात जाते-जाते कान में कहा था, 'हनीमून का खुमार उतर जाये तो सुबह ई-मेल चेक कर लेना, वैसे तो तुम जैसे लोगों की शादी की हनीमून का खुमार कई साल रहेगा ।' यह उन्होंने डच में कहा था जिसे शेखर ने रात में शीला को बताया ।
शीला को सामने पाकर डच पुरुष सचिव बॉसमान ने आगे बढ़कर तीन बार शीला से अपने गाल मिलाये । शेखर से हाथ मिलाया । हालचाल पूछा । शीला को शुरू में शेखर के दोस्तों से गाल मिलाते और चूमते हुए बहुत अजीब लगता था । घर की कॉलबेल बजने पर वह दरवाजा खोलने के लिए नहीं बढ़ती थी … और सीटिंग रूम में थोड़ा देर से ही दाखिल होती थी । सामने वाला गालों तक न पहुँचे इसलिए वह हाथ मिलाने के लिए पहले ही आगे बढ़ जाती थी । फिर भी वह 'किस' करके अभिवादन करने की परंपरा से छूट नहीं पाती थी । साथ में जिनके पत्नियाँ होती थीं वह शेखर का गाल चूमती थीं और शेखर उनका … और उनके पति शीला की ओर बढ़ लेते थे । स्वागत का यह प्रेम पूर्ण सलीका … शीला को हमेशा आश्चर्य में डाले रखता था । जब भी वह दूसरे आदमी के गाल का स्पर्श अपने कपोल पर अनुभव करती थी … उसकी दाढ़ी चुभती हुई महसूस होती थी … जबकि शेखर की दाढ़ी रात में भी नहीं चुभते हुए महसूस होती थी । अपने विवाह के रिसेप्शन में सबसे इस तरह से शुभकामनाएँ लेते हुए शीला के कपोल लला ही नहीं भभा भी आये थे ।
सचिव से मिलने के बाद शीला ने मेयर से हाथ मिलाया । अपना परिचय दिया । शेखर ने उनकी पत्नी को बधाई दी और शुभकामनाएँ सौंपी । बिजनेस टर्म्स की कुछ बातें हुईं । मेयर ने शेखर से कंपनी का कार्ड माँगा । देखते ही सचिव लपककर मेयर की ओर झुका और बोला, 'अरे सर, इनका पूरा कच्चा चिटठा मेरे पास है ।' हम सब मिलकर हँसे ।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

।। स्पन्दन ।।


















तुम !
मुझसे ज्यादा अकेले हो
जबकि
तुमसे अधिक मैं
इंतजार करती हूँ तुम्हारा ।

हम खोज रहे हैं
अपना-अपना समय
एक-दूसरे की धड़कनों की घड़ी में ।
अपने समय को
तुम्हारी गोद में
शिशु की तरह
किलकते हुए देखना चाहती हूँ ।
तुम्हारे ही अंश को
तुम्हारी ही आँखों के सामने
बढ़ते हुए
देखना चाहती हूँ ।

प्यार से अधिक
कोमल और रेशमी
कुछ नहीं बचा है
पृथ्वी पर
जीने के लिए ।

तुम्हारी हथेली की अनुपस्थिति में
छोटी लगती है धरती
जिन हथेलियों में
सकेल लिया करती थी
भरा-पूरा दिन
आत्मीय रातें
बची हैं उनमें
करुण बेचैनी
सपनों की सिहरनें
समुद्री मन की सरहदों का शोर ।

तुम्हारी आँखों में सोकर
आँखें देखती थीं
भविष्य के उन्मादक स्वप्न ।

तुम्हारे प्रणय-वक्ष में जीकर
अपने लिए सुनी हैं
समय की धड़कनें
जो हैं
सपनों की मृत्यु के विरुद्ध … ।

बुधवार, 7 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक और अंश (2)



















"शीला बियर सिप करते हुए सोचने लगी । अभी कल ही तो वह गई थी एम्सटर्डम … । लाल स्टॉप लाइट पर उसने अपनी कार रोकी थी कि सड़क पार करने के पैदल चलने वाले रास्ते पर सामने ही यूरोपीय सज्जा में सजे दूल्हा और दुल्हन पैदल चल कर सड़क पार कर रहे थे । दुल्हन अपने दोनों हाथों से परियों जैसे सफ़ेद रेशमी परिधान को अपनी दोनों हथेलियों के चुटकी से उठाये हुए थी और दूल्हा पीछे से लम्बे फैले हुए सफ़ेद सर के ऊपर से उतरती हुई ओढ़नी और लहँगे के लरजते हुए घेरे को उठाये हुए था । उनके साथ दो जोड़ी दोस्त थे । संझाये सूर्य के प्रकाश में वह गौरी नवयौवना बाला का हल्का-सा मेकअप किया हुआ चेहरा और अधिक सुंदर लग रहा था । अपने प्रेम के राजकुमार का हाथ थामे हुए सड़क के जेब्रा लाइन पर चलते हुए दुल्हन के पाँव सड़क पर नहीं बल्कि गुलाब की सफ़ेद पंखुड़ियों पर पड़ रहे थे । धीरे से शीला की निगाह परियों वाले उस सफ़ेद ड्रेस से होती हुई उसके उदर पर पड़ी जो संभवतः आठ माह से अधिक के शिशु को गर्भ में लिए हुए अपने यार के विवाह के श्वेत रेशमी चमकदार परिधान में लुकाये हुए विश्वविजयी साम्राज्ञी की मुस्कान में सड़क पर चल रही थी । और यह दृश्य एम्सटर्डम जैसे रास्ते पर चल रहे व्यक्तियों के लिए कोई आश्चर्य नहीं रच रहा था । भीड़ के लिए दोनों का यह विशिष्ट रूप भी भीड़ का ही हिस्सा था । लेकिन जितने सुख से उसका प्रेमी अपनी विवाहिता बनने वाली गर्लफ्रेंड के सौंदर्य को निहार रहा था, बिल्कुल वैसे ही शीला भी उन दोनों को कार के शीशे के भीतर से देख रही थी । और उसे लगा कि बिल्कुल ऐसा ही दृश्य उस दिन होगा जब शीला का गोल्फ शिक्षक रोप अपनी गर्लफ्रेंड एना के साथ विवाह रचायेगा ।
शेखर अपने मित्र के साथ आदतन बातों में मशगूल थे । शीला ने चिकेन क्रोकेड को मस्टर्ड सॉस में डिप करते हुए मुँह में रखा । बीयर सिप करते हुए शेखर को हल्की निगाह से देखा वे अपने डिस्कशन में गंभीर थे । लगता है बिजनेस से संबंधित कोई बातचीत पक रही थी ।
फिर से शीला अपनी यादों में खो गयी । पिछले साल ही हेम्स्केरक इलाके के एक मशहूर किले में अपने विवाह और भव्य रिसेप्शन के बाद वह हनीमून के लिए शेखर के साथ वेनिश गयी थी । चर्च के सामने प्रसिद्ध सन्त मार्को स्क्वैयर पर ही चर्च की ओर से नवविवाहित सजा-धजा जोड़ा निकलते देखा । पच्चीस वर्ष के आस-पास का दूल्हा अपने काले सूट में परियों-सी सफ़ेद परिधान में बीस वर्ष के आस-पास की दुल्हन के साथ सिटी हॉल से 'रिंग-सिरेमनी' करके वेनिस के विश्व प्रसिद्ध मार्को स्क्वैयर पर आये, जहाँ प्रेम पाती पहुँचाने वाले और प्रेम युगल कपोतों के जोड़े के जोड़े जत्थों में मँडरा रहे थे । कभी लोग उनके पीछे भागते थे और कभी वे लोगों के पीछे उड़ते थे । खूबसूरत सनी-डे था । उजाला बरस रहा था । विश्व भर के पर्यटकों से वह परकोटा भरा हुआ था । किसी को अपनी परछाईं देखने की जगह नहीं थी । उस आयताकार खुले मैदान के चारों तरफ महँगी विश्व प्रसिद्ध यूरोपीय सामानों की ब्रैंड नेम दुकानें और टेरस, रेस्तराँ थे । वे शीला के बैठने वाले रेस्तराँ की ओर बढ़कर आये । संयोग से प्यानो म्यूजिक और सिंगर अपनी-अपनी रौ में थे । सौभाग्य से वे दोनों भी वहीं बैठे । वेटर के आने पर चाय का ऑर्डर दिया । वह नवविवाहित जोड़ा अपने विवाह का जश्न अकेले ही आनंद से मना रहा था । शीला की आँखों के सामने पहला ऐसा अनोखा विवाह और उसका उत्सव था । दो पीस कुकीज के साथ उन दोनों के लिए एक पॉट चाय आई । अपनी-अपनी कुकीज उन दोनों ने एक-दूसरे को बहुत प्यार की मुस्कराहट के साथ खिलाई । चाय पी । फिर अपनी खुशी के लिए एक-दूसरे को अपनी-अपनी बाँहों में लेकर और फैली हुई बाँहों में अपनी आँखों से प्रेम-पसार कर बजते हुए म्यूजिक पर थिरकते हुए नृत्य किया । पाँव थिरक रहे थे । बाँहें बाँहों में भिंची थीं । मुस्कराहट एक-दूसरे की मुस्कराहट में बँधी-सजी थी और आँखें एक-दूसरे के प्रेम में डूबी हुईं थीं । उनके लिए पृथ्वी उस क्षण स्वर्ग का कोना थी । देखने वालों की भीड़ लग गयी और जैम गयी । लोगों ने परमीशन ले-लेकर उन दोनों की तस्वीरें बनाईं । वे अकेले विवाह करके निकले । अकेले ही अपनी खुशियाँ मना रहे थे पर उनकी खुशियाँ सबके कैमरे में नेगेटिव से पॉजिटिव होकर बस गयी थीं । उन दोनों ने उस दिन वहाँ प्रेम के सुख का संसार रच दिया था । जिन भी आँखों में झाँक कर शीला देखती थी उसे लगता था जैसे वे सब आँखें अपनी-अपनी मैरिज सेरेमनी की स्मृतियों के सपनों में खोई हैं । उन दोनों की आँखें भी एक-दूसरे के प्रेम-सरोवर में नहा रहीं थीं । आधा घंटा से अधिक एक-दूसरे की बाँह में झूमते हुए … नाचते हुए और रह-रह कर होठों को चूमते हुए जीने के बाद फिर अपनी जगह पर आ बैठे । चेहरे की श्वेताभा प्रेम के अंतरंग सुख से लालाभा में बदल चुकी थी । नृत्य करते हुए प्रेम के जिस उपवन से होकर वे दोनों लौटे थे … उसकी कोमलता और सुगंध दोनों ही उनके चेहरे से झाँक रही थीं । शीला ने भी उन दोनों की अनुमति से तस्वीरें लीं । वेटर आया । उसने बिल रखा । दूल्हे ने अपने पर्स से बीस यूरो निकाले । प्लेट पर रखे । अपनी विवाहिता प्रिया का हाथ थाम कर विजयी सिकंदर की तरह निकल पड़ा । प्रेम पर विजय किसी भी युद्ध-विजय से अधिक फलदायी अनुभव होती है । निर्धन होते हुए भी सब कुछ जीत लेने की अनुभूति होती है । सारी धरती अपनी लगती है । प्रेम … विवाह और जीवन के इस दृश्य को सब देख रहे थे और जब तक वे दिखते रहे, लोग उन दोनों को देखते ही रहे ।"  

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

।। भोजपत्र पर ।।


















देह के भोजपत्र पर
सांसें और स्पर्श लिखते हैं
प्रणय का अमिट महाकाव्य

ओठ छूट गये हैं मेरे अधरों में
अपने निर्मल और उष्म स्पर्श के साथ

तुम्हारे जाने के बाद
एक आदमक़द आईने में
बदल चुकी हूँ मैं ।

पृथ्वी का संपूर्ण प्रेम
उमड़ आता है
मेरे भीतर
तुम्हारे होने पर
कि पृथ्वी के सारे रत्न
अंजलि में होते हैं झिलमिलाते

आँखों में
रहते हो रात-दिन
अक्षय स्वप्नों के लिए

सपनों तक
पहुँचने का रास्ता
ओठों ने खींचा है
मन की धरती पर

देह-भीतर रचते हो
प्रेम की पृथ्वी
खोलते हो देह
जैसे गेह द्धार

प्रणयातुर नयन
खेलते हैं पर्वत श्रृंखला से
हथेलियाँ भर उठती हैं देह-रेत से
और रचती हैं घरौंदे सपनों के

हथेलियाँ
सिद्ध करना चाहती हैं
साधना का सहज रसावेग

अंतरंग के कैलाश पर्वत पर
देह जानती है
विदेह होने का
सरस-आत्मीय सुख

गुप्त गोदावरी के
अंतस्थल में
रखते हो अपनी अमृत बूँद
प्रणय की पुनर्सृष्टि … ।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

।। शब्दाशीष ।।

























मैं
तुम्हारे ओठों का वाक्य हूँ
ह्रदय की भाषा का सर्वांग
तुम्हारे स्पर्श ने रची है
प्यार की देह
जो बोलती है मेरे भीतर
तुम्हारे ही शब्द बनकर

आँसू
पोंछते हैं अकेलेपन के निशान
कि कल को कहीं
तुम्हारे साथ होने पर भी
लौट न पड़े अकेलापन ।

आँसू की स्याही से
शब्दों में रचती हूँ ईश्वर
और अपने ईश्वर में
गढ़ती हूँ आस्था का ईश्वर
जिसकी धड़कनों के भीतर
सुना है ईश्वर का संदेश
प्रेम के शब्दों में … ।


रविवार, 4 अगस्त 2013

।। प्रणय-वक्ष ।।


















आँखें
एकनिष्ठ साधती हैं
अपने प्रणय-गर्भ में
तुम्हारी संवेदनाएँ

तुम्हारा प्रेम
प्रणय का ऋषि-कानन
अनुभूतियाँ रचती हैं
दुष्यंत और शकुंतला की तरह
प्रणय का नव-उत्सर्ग
गंदर्भ विवाह का आत्मिक संसर्ग

सच्चाई की धड़कनों से गूँजता
मनुष्यता की साँस से साँस खींचता
प्रेम के लिए अपने प्राण सौंपता
तुम्हारा प्रणय-वक्ष
स्वर्ग का एक कोना
जहाँ प्यार के लिए
सर्वस्व समर्पण
जहाँ बरसता है रंग
बरखा की तरह ।

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

'विन्टरकोनिंग' कहानी का एक अंश (1)


















पुष्पिता अवस्थी जी ने कविता के साथ-साथ कहानी लेखन में भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है । उनकी इसी पहचान की एक झलक को मेधा बुक्स प्रकाशक द्धारा प्रकाशित उनके कहानी संग्रह 'जन्म' की एक कहानी 'विन्टरकोनिंग' के इस एक अंश में यहाँ देखा/ पहचाना जा सकता है :

'मेयर की बगल में इनके सहयोग के लिए दो ऑफिस की उच्च पदस्थ महिलाएँ भी खड़ी थीं । उनके हाथों में बियर के गिलास थे …और होठों में मुस्कराहट । उनके चेहरे पर तनाव की कोई झलक नहीं थी और मेयर की बगल में खड़े होने का न कोई अतिरिक्त गर्व था । उनमें से एक शेखर को गहराई से पहचानती थी जबकि शेखर को ठीक से याद नहीं था । उसने गाल मिलाकर चूमते हुए शेखर को याद दिलाया और अपनी शर्ट पर लगे नाम की प्लेट उचककर शेखर की आँख के सामने कर दी । शेखर को अपनी इस भूल पर बहुत शर्मिन्दगी हुई । उससे शीला का परिचय कराया और अपने घर आने को आमंत्रित किया । सरकारी ….गैर-सरकारी और प्रेस फोटोग्राफर अपनी-अपनी तरह से तस्वीरें ले रहे थे । लेकिन इसको लेकर कहीं कोई कॉन्शसनेस नहीं थी और न ही अतिरिक्त मीडिया का दबाव था ।
शीला का हाथ थामे शेखर जैसे ही दो कदम खिसके कि बॉस मान ने शीला और शेखर के बीच सिर घुसाते हुए कहा, 'टेक मोर ड्रिंक्स आफ्टर देन मूव ।' इसके बाद शेखर के कुछ और दोस्त मिले । बातें हुईं । परिचय हुआ । दो बार और वाइन ली । शीला कलाई में बँधी हुई घड़ी के चलते हुए समय को बगैर देखे हुए भी देख रही थी । जबकि शेखर हमेशा उसका हाथ पकड़े रहते हैं । यूरोप में अपनी गर्लफ्रेंड जो पत्नी ही होती है का हाथ पकड़ कर चलने का आम रिवाज़ है । भारत में शेखर के साथ होने पर शीला को लगता रहता था कि अब जब वह हाथ पकड़ कर चलेंगे तो लोगों के लिये तमाशा बन जायेगा । जो यहाँ सहज है वह वहाँ असहज हो जाता है और बेमतलब लोगों की भीड़ इकठ्ठा हो जाती है । इस डर से शेखर जिस बगल होते थे शीला अपने उसी हाथ में हैंड बैग ले लेती थी तो वह दूसरी बगल हो जाते थे तब वह फिर अपने हैंड बैग का हाथ बदल लेती थी । आखिर शेखर ने पिछली बार तंग आकर हँसते हुए शीला से कहा था, 'यार, तुम्हारे देश में इतनी भीड़ है कि यहाँ तो हाथ पकड़े बिना चला ही नहीं जा सकता है । इसलिए कम से कम इतना तो मेरा ख्याल रखो ….कहीं खो गया तो बस । अपने देश में मैं हमेशा तुम्हारे हाथ पकड़े रहता हूँ ।' सुनते ही शीला ने मुस्कराकर कहा था, 'मैं भी तो ।'
शेखर ने शीला को याद दिलाते हुए कहा, 'हमें माँ के पास भी चलना है …वह इंतज़ार कर रही होगी । अभी वह हफ्ते भर पहले घर से ही 'फ्लैखलस-ओल्ड हाउसेस' में गयी हैं । जिंदगी भर परिवार में रही हैं इसलिए अकेले कमरे में डर लगता होगा …. अभी वह वहाँ घुली-मिली नहीं हैं …. न डायनिंग हॉल में लंच लेती हैं …. न ही किसी फंक्शन में जाती हैं और न ही उसी बिल्डिंग के बॉडी फिटनेस सेक्शन में दाखिल होती हैं ।' सुनकर शीला को लगा कि बयासी वर्ष की अकेली माँ में अब भला कौन-सी अभिलाषा बची होगी । कौन-सा खाना … ? किसके लिए खाना …. ? काहे का खेल …. ? किसके साथ खेलना …. ? जब खेलने की उम्र थी तब पंद्रह वर्ष की उम्र में ब्याह कर दिया गया था । पढ़ने को सोचा तो गौना मढ़ दिया गया था । पति से प्यार करने और वैवाहिक जीवन का सुख जीना चाहा तो पैंतालिस वर्ष की उम्र तक के बीच दस बच्चे पैदा करने में बीत गए । सब बन गए जब, तब अपना-अपना सबने घर बसा लिया और कुछ ऐसे बसा लिया कि माँ-बाप के लिए किसी के पास न जगह बची और न ही समय बचा । पिता बच्चों के प्यार के अभाव की अनुभूति में टूट गए । अपने बड़े लड़के की बातें न सुनीं । धीरे-धीरे परिवार में दरारें पड़ती गयीं और परिवार बिखर गया । इस टूटन से पिता टूट गये । आस्थावान पिता अपनी प्रार्थना में ईश्वर से हाथ जोड़कर …. हाथ उठा कर यही माँगते …. हे प्रभु, अबकी बार मनुष्य जन्म मत देना । मानव बनने में बड़ा दुःख है । जीना कठिन है । ऐसे ही कठिन समय से थककर एक शाम माँ को छोड़कर चले गए । अंतिम समय माँ से यही कहा था कि अपनी पंद्रह बरस की उम्र से तुम हमारी साथी रही हो …. । तुमने मेरा सबसे ज्यादा साथ दिया है …. । तुमसे मुझे कोई दुःख नहीं पहुँचा है …। लेकिन …. अब हम जाते हैं । जीना कठिन है …. । और …. और …. वह बैठक में लरजकर गिर पड़े । लड़खड़ाते हुए उनके गिरने से पैंट की जेब से एक छोटी-सी शीशी गिरी ।
माँ अनपढ़ थी। न पढ़ सकी । पढ़ लेती भी तो क्या कर लेती ? जो होना था वह हो चुका था । पिता घर को इस तरह सँभालते और देखते थे कि सूर्यास्त के बाद आठ दरवाजों में ताले जड़ते थे । वह सब चाभियाँ एक साथ थीं । चाभी से ज्यादा जिनके ताले पिताजी ही पहचानते थे । जिस रात पिताजी देह छोड़ कर गये थे, आठों किवाड़ों में पिता के हाथों ताले लगाये जा चुके थे । माँ अकेले ही पिता की मृत्यु को छटपटाकर देखती रह गयी थीं । पिता की आँखों के सामने अँधेरा होने से पहले उस रात माँ की जीवन की आँखों के सामने अँधेरा छा गया था ।'