बुधवार, 27 नवंबर 2013

'तुम हो मुझमें' का लोकार्पण

नॉर्थ हॉलैंड के शहर लांगाडाईक के सिटी हॉल में आयोजित एक भव्य समारोह में वहाँ के मेयर हाँस कोरनीलिसा ने पुष्पिता अवस्थी के हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह 'तुम हो मुझमें' का लोकार्पण किया । दिलचस्प संयोग यह है कि पुष्पिता अवस्थी ने नई दिल्ली के राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित अपना यह कविता संग्रह हाँस कोरनीलिसा को ही समर्पित किया है । इस आयोजन को लेकर तथा पुष्पिता जी की कविता को लेकर नीदरलैंड के कई अख़बारों में रिपोर्ट्स प्रकाशित हुईं हैं । ऐसी ही एक प्रकाशित रिपोर्ट की कतरन हमें मिली है, जो यहाँ प्रस्तुत है :  


सोमवार, 25 नवंबर 2013

।। स्मृति में … हिन्दुस्तानी माँ ।।


















मातृभूमि सरीखी माँ
सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच
टघरती हुई
चलाती है अपना समय
देश और परदेश के
अपने घर और परिवार में
ठियाँ के लिए
गठरी सकेले
उजारती रही
अपने जाये बच्चों और रिश्तेदारों के दुआरी दुआरी
और जान गई
कि पिता के देह तजते ही
दरक जाता है
उसके अपने देह से तजा
परिवार का घरौंदा भी

बुढ़ापे के उत्तरार्ध में भी
अपने जीवन के सारे प्रयोग करती हुई
मृत्यु के विरुद्ध
मृत्यु से लड़ती हुई
थकी-हारी माँ
ऋतुओं के बदलाव में
याद करती है
अपने जीवन का ऋतु चक्र
धुँधली दृष्टि
और झुर्राई देह में बरसात होने पर
महसूस करती है बरखा का सुख 
और भीग उठती है मातृभूमि की तरह
स्मृतियों में

थकी-हरी माँ बताती है
अपनी जरूरत
जैसे
यह उनकी ही नहीं
धरती की भी जरूरत है

माँ में बोलती है मातृभूमि
और मातृभूमि में बोलती है माँ

जब
उसकी ही जुती-जुताई धरती पर
खेती करने की जगह
लगता है कोई कारखाना
अपने पोपले मुँह से
चीखती है वह
मशीन से भी अधिक तेज आवाज़ में
जैसे उसकी छाती में भी हो
विष्फोटक बगावत

यूरोप में
रह कर भी
नहीं बदले
उसके धरती के संस्कार
इसीलिए
वह माँ होकर भी
मातृभूमि है
जिसमें समाई है सम्पूर्ण पृथ्वी ।

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

।। गर्भस्थ माँ ।।


















इकली गर्भस्थ स्त्री
सकेल लेना चाहती है अपनी साँसें
गर्भस्थ शिशु के प्राण के लिए

वियोग-संतप्ती अपनी माँ की साँसों से
खींच रहा है साँस
प्रणयी शिशु
देह भीतर
अपनी माँ की तरह

सैनिक पिता की अनुपस्थिति की अनुभूति ही
रक्त-पहचान गर्भस्थ शिशु की

आँखों का अँधेरा
आँसू में
घोल रहा है
इतिहास की काली स्याही
माँ के एकाकीपन का तिमिर
गर्भ-कोठरी में

आकाश-गंगा का नक्षत्र
प्रेम गंगा का सितारा
अवतरित हुआ
विरही माँ की देह में
प्रणय का शिशु
चाहत के गर्भ में

सामुद्रिक दूरियों के बीच
छटपटाती है हृदयाकुलता मछलियों सरीखी
मँडराती रहती हैं आकांक्षाएँ तितलियों सी
ह्रदय के रिक्त वक्ष-मध्य
अकेली माँ और शिशु के भीतर एक साथ

खुँटियाएँ शुष्क पौध
और अरुआये काँटे सा
धँसता है अकेलापन
माँ और गर्भस्थ शिशु भीतर

प्रिय की साँसों के साथ
साँस लेना चाहती है गर्भस्थ स्त्री
शिशु की साँस के लिए
अपनी ही तरह से

शिशु के पिता की आवाज को सुनकर
धड़कना चाहता है माँ का ह्रदय
शिशु के लिए
कि वह
युद्ध के चक्रव्यूह से अधिक
जीवन के षड्यंत्र व्यूह के विरुद्ध
अपनी वाणी में सान सके
अपने माँ-पिता के प्रणय सींजे शब्द

गर्भस्थ माँ
अपनी देह ऊपर
चाहती है सैनिक पिता की मातृभूमि प्रेरक
रक्षात्मक प्रिय हथेलियाँ
अजन्मे शिशु के लिए
कि देह-गर्भ की माटी में पड़े
प्रणय-बीज की काया में
उभर सके
सैनिक हथेलियों के छापे
दस्तावेजी मोहर की तरह अनोखी लिपि में

माँ को देखती हुई देखेंगी
पिता की प्रणयातुर आँखें
अजन्मे शिशु के
शांत गर्भाकाश में
शुभांकित नक्षत्र की तरह

पुलकित किलक की
प्रथम सुगंध को
सूँघ सकेगा पिता
माँ की देह-कुसुम से

जन्म से पूर्व विरही माँ
सिखा देना चाहती है अपने शिशु को
पिता की तरह ही मुस्कराना
उसे देखना
और रह रह कर
अपना सब काम छोड़ कर
चुम्बन देना
जिसमें उसका प्रिय
          शिशु का पिता
भूलता रहा है अपनी थकान

माँ चाहती है
शिशु के गर्भकाल में
उसका प्रिय उसके साथ रहे
अपने प्रथम चुम्बन की तरह

गर्भस्थ शिशु
मान पहचान ले उसे अपना पिता
माँ के बताने से पहले ही
पिता अपनी
आँखों का प्रणयी प्रकाश
शिशु की मुँदी पलकों पर रखे
गर्भ के भीतर ही
प्रणय-उर्मि की अक्षय बूँद

दुनिया देखने से पूर्व ही
गर्भ-गेह के भीतर ही
अनुभव करे
पिता की गोद
बाँहों और छाती के स्पर्श से जाने
पिता के साथ होने का आह्लाद-सुख

माँ
अपने प्रिय के साथ
सूर्योदय देखते हुए
जीना चाहती है
अपने भीतर का सूर्योदय
गर्भ में उसे अपने साथ लिए हुए
कि वह कहला सके
प्रणय का सूर्य-सुत
           प्रकृति-पुत्र

पिता के ओंठों से पहचाने वह
संबंधों की कोमलता
और जाने कि
पिता ने कितना प्यार किया है माँ को

प्रकृति की सर्वोत्तम सृष्टि की तरह
सम्मानित कर अंगीकार किया है उसकी माँ को
अपने जीवन का सर्वस्व सौंप
देह गर्भ भीतर गढ़ा उकेरा है शिशु के रूप में
                                    अपना नाम
खजुराहो के शिल्पी की तरह
जो खजुराहो के मंदिरों की भित्तियों
         और गर्भ गृह में रचने से रह गया
शिल्पी के द्धारा भी
शिशु देह रूप में

एक दूसरे के लिए
पृथ्वी के कोमलतम प्रेम से रचित शिशु
प्रणय का जीवित जीवंत ह्रदय है

दोनों ने मिलकर
बहुत चुपचाप
विध्वंसक दुनिया से
बच बचा कर
रचा है एक महान प्रणय
जैसे
सृष्टि रचने के साथ
ईश्वर ने रचा होगा प्रथम प्रेम

पुनः
पुनर्जन्म लेगा
शिशु के रूप में
प्रणय का विलक्षण प्रतिरूप
लघु मुस्कान की कल्पनां भर से
छलक पड़ते हैं नयन के भीतर
दुग्धामृत की धवलता
ममता से फड़क उठती है पयोधर की नसें
उसके दूध के दो दाँतों की स्मृति में
जो उगेंगे उसके भीतर
चारों दिशाओं में तीर की तरह
विध्वंसक युद्धों के विरुद्ध

इससे पहले शिशु की
दुग्ध दँतुलियाँ धसेंगी
अपने पिता की छाती में
जहाँ उसकी माँ ने बनाया था
अपने 'प्रेम का पहला घर'
गर्भस्थ शिशु से पूर्व
उसके घर के लिए

गर्भस्थ शिशु की
जीवन गति .. स्पन्दन, स्वप्न आहट
और हलचली ध्वनियाँ
रचती हैं सृष्टि के नव-शब्द
माँ के उर-प्रांतर में
पिता के संबोधन के लिए
गर्भस्थ माँ

प्रतीक्षा करती है शिशु के पिता का
चार आँखों से
अपने गर्भस्थ शिशु के ह्रदय और आँखों के
अपनी अधीर आकुल आँखों में साथ लिए हुए ।

(यह कविता विश्व भर के सैनिकों की उन गर्भस्थ पत्नियों को समर्पित है, जिनके पति अपने अपने राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर सीमाओं पर तैनात हैं ।)

बुधवार, 20 नवंबर 2013

।। मृत्यु से लड़ती है ।।

























माँ
जीवन भर
लड़ती है मृत्यु से

मृत्यु
सिर्फ देह की ही
नहीं होती है
बल्कि
जब भूख
      फसल
      घर
      जीवन
      अपने आदमी
      और बच्चों की
हर जरूरत के लिए
लड़ रही होती है माँ
तब भी
मृत्यु से लड़ रही होती है माँ

माँ
जीवन भर
लड़ती है मृत्यु से ।

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

।। सीशिल ।।


















सीशिल
धरती पर वृक्ष सरीखी अपनी जड़ें धँसाएँ हुए
कैरेबियाई हस्तशिल्पी स्त्री का नाम है

तराश से जन्म लेती है
वृक्ष के शुष्क तने से
न जाने कितनी काष्ठ सामग्री मनका और बाजूबन्द तक

तने की तरह तनी हुई
पर, रेशे-रेशे की मुलायम
काष्ठाग्नि प्रज्वलित है
उसकी जीवनोन्मुखी जिजीविषा की पर्तों में

जंगल बीच
वन की कला देवी सी अड़ी-खड़ी
बरखा को पीती
समुद्र के सौंदर्य की सरल हार्दिकता की
संपत्ति को जीती
वह जानती है
ग्रीन हार्ट और महोगनी जैसे
गठीले वृक्षों की जल विरोधी मजबूती की तरह
पत्थर या लौह स्तम्भ की तरह
जलधार बीच खड़ी
सीशिल जानती है
वृक्ष का वक्ष
वक्ष के स्वप्न

स्वप्न की आकांक्षा को
सूखी लकड़ी की देह में जीती हुई
सीशिल उकेरती है
संसार की कलाओं का सौभाग्य-सुख
ऋतुओं में
कालिदास का ऋतुसंहार
इंद्र का ऐंद्रिक जाल
फाल्गुन का उन्माद
जबकि
ग्रीन-हार्ट सम्पूर्ण वृक्ष
एक दिन में जीता है अपना पीताभी बसंत

मानव देह में प्रवेश की हुई
मृतात्मा की छाया को
अपनी आँखों से डसती हुई
साँसों से झाड़ फेंकती है पापात्मा की छाया
कि जैसे मानव-देह के वृक्ष तने में
लगा हुआ कीड़ा हो वह कोई
जिसे फलने से पूर्व ही नष्ट करती है कुत्सित आत्मा

वन के वृक्षों के हित में लगी
गाँवों में सँस्कृति के वृक्ष लगाती
कि 'काराबासी' नाम की आफरो सँस्कृति
बन सके जनप्रिय विश्व सँस्कृति
काष्ठ की देह में
कलाकृतियों के बहाने से

(ग्रीन हार्ट - ब्राजील और गयानी तटों के जंगल का जलजीवी वृक्ष है, जो गदराई देह वाली समृद्ध नदियों को पार करने के लिए पुल के लकड़ी के रूप में इस्तेमाल में लायी जाती है । इससे बने पुल पचासों वर्षों तक मजबूत बने रहते हैं । यह वृक्ष वर्ष में सिर्फ एक बार कुछ दिनों के लिए वासंती पुष्पों से लद जाता है । यह करीब सप्ताह भर तक विशाल ऊँचा पीत वृक्ष-सा प्रदर्शित होता है ।
काराबासी - कैरेबियाई देशों में प्रसिद्ध आफरो काष्ठ कला का नाम ।)

सोमवार, 18 नवंबर 2013

।। जंगल जग के मानव प्राणी ।।


















अमर इन्डियन के गाँव

सघन घन बीच
पथ और पगडंडियों से परे
विमान ही पहुँचने का एकमात्र माध्यम जहाँ
और दृष्टि ही पथिक

नदियाँ हैं
जंगल का रास्ता
और जंगल देते हैं
नदियों को रास्ता

वृक्षों की देह से बनी
लम्बूतरी डोंगी ही
गाँव से गाँव
जंगल से जंगल
तट से द्धीप की दूरी का वाहन
जलवाहन ही केवल साधन

सघन घन बीच
मछली-सी बिछलती तैरती
जंगली मानसूनी पानी पीकर
जीवन जीती नदियों में
अपने जीवन की कटिया डाले हुए जीती हैं वन जातियाँ
अमर इन्डियन परिवारों में
परिवार कबीलों में
और कबीलों के लोग
जंगलों में तीर-धनुष और भालों से करते हैं शिकार

वृक्षों के तनों के ऊपर से
शुरू करते हैं अपने काष्ठ-घर
और विह्वर मंकी (बुनकर वानर) की तरह
बुनते हैं अपना हैमक पालना
वृक्षों के वक्ष-बीच तना झूलता
उन्हीं के पाँव पर खड़े हैं अमर इन्डियन के बसेरे
लकड़ी के पटरों और लट्ठों से
बने हैं घरों के घोंसले
चार फुट की ऊँचाई से
शुरू होते हैं अमर इन्डियन के वन-जीवी घर
तासी पत्तियों की छत ओढ़े हुए

कपासी सूत के हथ बने
पालनों में पड़ी जिंदगी
कसाबा रोटी
और मछली शोरबे में
जीती है अपना रात-दिन
कसीरी शराब की
गुलाबी रंग-गंध में
देखती है उल्लासी स्वप्न
थमी हुई जिंदगी की
ठहरी हुई मौत में
जिंदगी जागने के सपने

झरनों में अटकी
वृहत मछलियों के फँसने पर
हिरणी की हड्डी की सी बाँसुरी पर
धरकर अनुरागी ओंठ
फेंकते हैं साँस
उमंगी उत्सव के लिए

कभी राग से भरकर
कछुए के खोल पर
शहद के मोम को यंत्र पर चढ़ा कर
देते हैं उँगलियों से राग भरी रगड़
और छेड़ते है
अनूठी जंगली टेर
कि वन देवी
प्रसन्न हों अलोप ही
देखें समर्पण नृत्य
और आशीषें कि वे बचाये हुए हैं वन
और वन-माँ को

डॉलरी और यूरो 'सभ्यता' के
दारू दम जत्थों की
भोग परस्ती के बावजूद
मिलने पर उनसे
हाथ तो मिलाते हैं अपना
लेकिन
ह्रदय और प्राण सहेजे रखते हैं प्राण प्रण से
वन देवी की पूजा के लिए ही
वन देवी के घर
जो हैं वन के भीतर
और उपासना करते हैं
सूर्य, चंद्र और पृथ्वी की वर्ष भर

अमर इन्डियन
जीते हैं अपनी भक्ति में
निज की शक्ति
आत्मीय सँस्कृति की आत्मीय भाषा में
मानवोचित और मानवीय

अमर इन्डियन
नहीं सीखना चाहते हैं
ड्यूरो और डॉलर कमाने वाली
धोखे और ठगी से भरी
छल-प्रपंच की कृत्रिम मीठी भाषा
ब्राजील के
अमर इन्डियन की
कसीरी देशी शराब-सी है
धीमी ध्वनि और गति गति की
मोहमयी मृदुल भाषा
अपनेपन के मधुरास के
बीज-शब्द से संपन्न
कि उन्हें मनोरंजन के लिए
कभी किसी टी वी या ब्ल्यू फ़िल्म
या पब या बार या क्लब की
जरूरत नहीं पड़ती

अमर इन्डियनों के
अध्-वस्त्र में भी
आच्छादित है नग्नता
जबकि जादुई सभ्यता की चकाचौंध में
पल रही
तथाकथित सुंदर से सुंदरतर सभ्यता भी
नग्न से नग्नतर लगती है कि
देह पर पड़ा हुआ वस्त्र
देह को ढकने से अधिक
             उघार कर रख देता है देह कि
             मनुष्य को
             हिंसक बनने में
             देर नहीं लगती है
             सारी सभ्यताओं के बावजूद ।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

।। इकली स्त्री ।।


















घर पर
छोड़ आती है अकेलापन
जिसे जीती है वह
और जो जीता है उसे
आमने सामने होने पर

अकेलापन
घर में रहता है उसके साथ
पहने हुए कपड़े की तरह
मन देह के अंतस का
एकांत ढाँपने के लिए

अवकाश के दिन
घर के भीतर देखता है
उसका अकेलापन
और सहलाता है उसे
सोयी हुई
अपनी मुलायम साँसों से

अकेलापन
घर-भीतर छिपा बैठा है
उसके हर सामान में
एक उदास ठंडक की तरह

आईना तक
ओढ़े रहता है अनुपस्थिति की स्याह चादर
समय का मौन समाया है घर के सन्नाटे में
अकेलेपन ने ऊब कर
घर के भीतर और बाहर उढ़ा दी है
उपेक्षा की श्वेत चादर

पूरे घर में
फैली रहती है
मौत की परछाईं
और अकेलेपन की कसक
जो
घर का ताला खुलते ही
उझक कर आ गिरती है
अकेली स्त्री की सूनी हथेली बीच
जिसे
सहेज कर रखती है अपनी मुट्ठी में
घर के अकेलेपन को कम करने के लिए
जो उस इकली स्त्री से भी ज्यादा झेलता है घुटन
उसके काम पर जाने के बाद

घर और स्त्री
दोनों पहचानते हैं एक दूसरे का अकेलापन
और दमतोड़ कोशिश करते हैं उसे कम करने की
एक दूसरे के आमने-सामने होने पर
स्त्री-पुरुष की तरह प्रायः   

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में

पुष्पिता अवस्थी जी को पिछले माह आयोजित फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था । यहाँ पुष्पिता जी ने आमंत्रितों के समक्ष अपनी कविताएँ तो सुनाई हीं, साथ ही बुक फेयर की अन्य गतिविधियों का भी जायेजा लिया । आयोजन से संबंधित कुछेक डिटेल्स और दो तस्वीरें यहाँ प्रस्तुत हैं :