बुधवार, 31 दिसंबर 2014

'शब्दों में रहती है वह' का उल्लेख

वरिष्ठ समीक्षक ओम निश्चल ने इस वर्ष प्रकाशित पुस्तकों के परिदृश्य का जायेजा लेते हुए 
'बची हुई है अभी शब्द की महिमा' शीर्षक से एक विस्तृत आलेख लिखा है, 
जिसे 'समालोचन' ब्लॉग पर पढ़ा जा सकता है । 
इस आलेख में पुष्पिता अवस्थी के इस वर्ष प्रकाशित कविता संग्रह 
'शब्दों में रहती है वह' का भी उल्लेख हुआ है । 
उस उल्लेख को इस स्नेप शॉट चित्र में देखा/पढ़ा जा सकता है :


मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

।। प्रणय-पृथ्वी ।।




















प्यार
देह-भीतर
रचता है प्रणय-पृथ्वी

खुलती है देह
जैसे    डार

प्रेम की आँखें
खेलती हैं देह के पर्वतों से
हथेलियाँ बनाती हैं अक्षय प्रणय घरौंदे
देह की रेत से

प्रणय-उँगलियाँ
सिद्ध करती हैं प्रेम-हठयोग
साधना से सधता है ब्रह्मानंद-नाद

अपने अंतरंग के कैलाश-शिखर पर
साधनारत शिव की तरह समाधिस्त है
प्रणय
प्रिय की अन्तश्चेतना में प्रिय के लिए ।

गुरुवार, 25 दिसंबर 2014

।। मन-माटी ।।

















प्रेम
धरती के अनोखे
पुष्प-वृक्ष की तरह
खिला है तुम्हारे भीतर

अधर
चुनना चाहते हैं
वक्ष धरा पर खिले
पुष्प को
जिसमें
तुम्हारी मन-माटी की सुगंध है
अद्भुत ।

तुम्हारे
ओंठों के तट से
पीना चाहती हूँ
प्रेम-अमृत-जल
शताब्दियों से उठी हुई
प्यार की प्यास
बुझाने के लिए ।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

।। प्रकाश-सूर्य ।।


















मौन प्रणय
लिखता है शब्द
एकात्म मन-अर्थ

मुँदी पलकों के
एकांत में
होते हैं स्मरणीय स्वप्न

प्रेम
उर-अन्तस में
पिरोता है स्मृतियाँ
          स्मृतियों में राग;
          राग में अनुराग;
          अनुराग में शब्द;
          शब्द में अर्थ;
          अर्थ में जीवन;
          जीवन में प्रेम;
          प्रेम में स्वप्न;

प्रणय-रचाव-शब्दों में
होता है सिर्फ प्रेम
जैसे सूर्य में सिर्फ प्रकाश और ताप ।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

।। कुछ खामोश शब्द ।।

























लिफाफे की तरह
खोलती है शब्द
और शब्दों को
खोलती है मन की तरह

तुम्हारे ही शब्दों में
रखती है
मन-बसी तुम्हारी ही छवि
और उस रूप के अधरों पर
रखती है तुम्हारे शब्द-रूप
और सुनती है
शब्दों की छुपी
साँसों की आहटें
लहरों की तरह
एक-पर-एक
लगातार आती हैं जो

तुम्हारे ही शब्दों को
तुम्हारी ही आँखों में रखकर
पढ़ती है मौन मेरी आँखें
नम-मन-गंगा में नहाकर
भीग उठते हैं तुम्हारे ही शब्द
तुम्हारी अनुपस्थिति में
मेरी आँखों के सामने
आँखों के बीच
होते हैं कुछ खामोश शब्द
संबंधों की नई व्याख्या के लिए
शब्द-नक्षत्र-कोष

तुम्हारे शब्दों को
अपनी साँसों में सहेजकर
रखती हूँ मन-घर में
तुम्हारे अपने नाम-घर में
चुपचाप
मेरी साँसों की
हवाओं के अलावा
कोई मन-वसन्त नहीं सूँघता
साँसों के सपनों का वसन्त हैं 
तुम्हारे शब्द

नीली स्याही में है
तुम्हारे मन की गंगा
(नीलकंठी विष को
अपने शब्दों में घोलकर
गंगा-अमृत बनाया है)
तुम्हारे मन का आकाश ।

नीले शब्दों की नीली लहर में
डूबती हुई
स्पर्श कर आती हूँ
तुम्हारे प्रणय-उद्गम-प्राण
नीले शब्दों की
प्रशांत नीलिमा में से
बीन लाती हूँ कुछ
अपने लिए अर्थ-नक्षत्र
देह की दूरी को पाटते
देह से परे देह के लिए
तुम्हारे शब्द गढ़ते हैं
आत्मीयता का नया अर्थ-घर

तुम्हारे शब्दों में से
गढ़ती हूँ
प्रणयास्था की
अक्षय रूप छवि
तुम्हारे शब्द
मन-तंत्र के
अन्वेषी शब्द हैं
आत्मा का वेद रचते हैं ।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

।। अभिलाषा ।।


















अभिलाषाएँ
… चुप …
तिरती और तैरती हैं

कभी
संवेदनाओं की झील में
कभी
विचारों की नदी में

प्रकृति से
ग्रहण करती हैं इच्छाएँ
कभी सजलता
       तरलता
       सजगता

अभिलाषाएँ
… चुप …
रहती हैं
अपने को शब्द में रूपान्तरण से पहले
प्रेम में
प्रेम की तरह ।

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

।। प्रणय-वक्ष ।।





















आँखें
साधती हैं एकनिष्ठ
प्रणय-गर्भ में संवेदनाएँ

प्रणय-ऋषि-कानन
रचती हैं अनुभूतियाँ
दुष्यंत और शकुन्तला सरीखे
प्रणय-नव-उत्सर्ग
गंदर्भ-विवाह का आत्मिक संसर्ग

प्रेम के लिए
अपना प्राण सौंपता
तुम्हारा प्रणय-वक्ष
स्वर्ग का एक कोना
जहाँ प्यार के लिए
सर्वस्व - समर्पण ।

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

।। छूट गई है खिली हुई ऋतु ।।






















तुम्हारी आँखें
छूट गई हैं मेरी आँखों में
शब्द
मेरे मौन में

तुम्हारी हुई
साँसों के घर में
बसेरा कर रही हैं मेरी साँसें
होंठ
बने हैं मेरी चाहतों के संकल्प

तुम्हारे स्पर्श में
छूट गई है खिली हुई ऋतु
पनपा है जिससे
तुम्हारी अंतरभूमि में उपजा
प्रणय-वृक्ष का अद्भुत बीज
मन-पड़ाव का आधार
एकांत का सखा-सहचर

स्मृतियों में बसी-रची
छूती हुई तुम्हारी परछाईं
हर क्षण छूती-पकड़ती है
पूर्णिमा की चाँदनी की तरह
फूलों की सुगंध की तरह
अलाव के ताप की तरह
तुम्हारा मन-स्वाद
छूट गया है मेरे आह्लाद कक्ष में
महुए की तरह
बची हुई पीताभा-सुगंध

सेमल की तरह
मुलायम होकर
मन ने रचा है
एक रेशमी-कोना
जिसमें लिखा है
सिर्फ तुम्हारा ही नाम
मेरे अपने
भविष्य के लिए
जो तुम्हारी हथेलियों में
बसी रेखाओं की तरह है

तुम्हारी हथेली की
रेखाओं की पगडंडी में
चलती हैं मेरी हथेली की रेखाएँ
वे एक हो जाती हैं
मन की तरह
खुशी के मौकों पर
मेरी हथेली खोजती है तुम्हारी हथेली
सुख की ताली के लिए
तर हथेली से
तरल होती है मेरी कातर, पसीजी हथेली
तुम्हारी अन्तःनीरा का
सतत प्रवाह पीता है मेरी प्यास

तुम्हारी तस्वीर में
बसी हँसी को
आँखों से बिनकर
और होंठों से चूमकर
सहेजती हूँ आँचल के कोर में
सुख के पारिजात
जो मेरे मन कुंड में
          भीग कर रचते हैं
          वसन्त का गीला-रंग
          तुम्हारे
          फाल्गुनी स्नान के लिए ।

रविवार, 14 दिसंबर 2014

।। कभी मेघबूँद ।।




















नदी के
द्धीप वक्ष पर
लहरें लिख जाती हैं
नदी की हृदयाकांक्षा
जैसे - मैं

सागर के
रेतीले तट पर
भँवरें लिख जाती हैं
सागर के स्वप्न भँवर
जैसे - तुम

पृथ्वी के
सूने वक्ष पर
कभी ओस
कभी मेघबूँद
लिख जाती है
तृषा-तृप्ति की
अनुपम गाथा
जैसे - मैं ।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

।। मन का ऋतुराज ।।



















आकाश के
नील पत्र पर
धूप-स्याही से
हवाओं ने
'वसन्त' शब्द लिखा
मेरे मन का 'ऋतुराज'
तुम्हारी घड़ी में
अपना
समय देखता है

तुम्हारे
शब्दों में
अपने लिए संकल्प
तुम्हारी नींद में
अपने लिए स्वप्न
तुम्हारे लिखे में से
अपने लिए शब्द
आत्मीय शब्द

तुम
मेरी कलाई में
घड़ी की तरह
बँधे हो
तुम्हारी घड़ी में है
मेरा चंचल दिन
ठहरी-ठिठकी रात

तुम्हारी
घड़ी-सुइयों में
प्रतीक्षारत है मेरा समय ।

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

।। उन्मुक्त व्यथा ।।

























तिथियों के
गुँजलक में
होता है तुम्हारा प्रवास
मेरा वियोग
पर उन्मुक्त है व्यथा
सूरज
नहीं जला पाता ताप
चाँद
नहीं पी पाता व्यथा-विष
सारी रात
सौरमंडल निरखता है आँसू
फिर भी
सितारे नहीं बाँट पाते हैं
व्यथा-सन्ताप

तिथियों के अंकों में
खुली होती है स्नेह-सींजी गोद
तुम्हारे आगमन-तिथि में
होती है तुम्हारी आँखें
         तुम्हारे अधर
मेरा सन्ताप लेने के लिए
अपना सन्ताप देने के लिए
फिर अगली प्रतीक्षा के लिए
तुम्हारे आगमन की
तिथि-सीप भीतर
होता है तुम्हारा
नेह-तप-मोती
जिसे
तपकर
लाते हो तुम
स्नेह-हार के लिए ।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

।। मन के अन्तःपुर का पाहुन है प्रेम ।।



















प्रेम
मात्र शब्द है जिनके लिए
वे कथा की तरह पढ़ते हैं
देखते और जीते हैं
नाट्य-नौटंकी की तरह
और खाली समय में खेलते हैं
बचपन के सारे खेल छूटने के बाद ।

प्रेम जिनके लिए स्पर्श है
वे छूते हैं आँखों से
प्रणय का तन और मन
वे सुनते हैं कानों से
प्रणय की झंकृति
वे सूँघते हैं साँसों से
प्रणय की साँस और जान
वे स्पर्श करते हैं प्रणय-गात
जैसे अभिषेक के लिए ललाट
आशीषाकांक्षा से चरण
और पाते हैं प्रणय की चरितार्थता ।

प्रेम शब्दों से परे है
शब्दकोशों से बहिष्कृत
मन के अन्तःपुर का पाहुन है वह
केवल ह्रदय से
हार्दिकता से काम्य ।

रविवार, 7 दिसंबर 2014

।। विश्रांति ।।



















सरसोईं सींजी साँझ में
देख रही थी
तुम्हारे हाथों में
जैसे कि हृदय की हथेली में
विश्राम से बैठी अपनी हथेली के चैन को
और रेखाओं की आँखों में उड़ते
रेशमी रंगीन भविष्यत् स्वप्न को

सन्नाटे की निःशब्द गूँज में
भविष्य के लिए मचलते आतुर शब्द
रचते हैं पूरा वाक्-संसार संबंधों की संवेदनाओं का

सारे भेद अस्तित्वहीन होकर
तिरोहित हो जाते हैं
अनपहचाने अजनबी शब्द
सहमते और सिसकते हैं ।
तुम्हारे स्पर्श के
आत्मीय मौन में
कि जैसे रंग-डूबी तूलिका ने
रेखाओं की लिपि में उकेरा हो  अबूझ कुछ

देहांश के एक कोने में उस क्षण
कोपल-सी कोमल हो आई थी अनुभूति
जल-सी तरल रिस आई थी संवेदना
काँच-सा पारदर्शी था स्पंदन
जिसमें प्रतिबिम्बित थी
तुम्हारी आत्मा …आत्मा का प्रेम
प्रेम का सर्वस्व समर्पण
जैसे भीतर के मरुस्थल में दबा पड़ा
कोई बीज
अपनी पहचान बनाता
अंकुरित हो आया हो
स्नेह-स्पर्श से

सार्थक हो आई काया ने
एक नाम दिया था उस क्षण
हथेलियों में
उपला आई गहरी आत्मीय अनाम आस्था को
जैसे गाँव की अबोध स्त्री
देववृक्ष तले
रख सुचिक्कण पथराया खंड
अभिषेक कर
घोषित करती है
यह है शिव
          यह है मेरा भगवान ।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

।। अघोषित घोषणा-पत्र ।।




















गहरा अकेलापन जीने के बाद
पोछ आई हूँ काजल
तुम्हारी तौलिया में
वियोग सन्ताप के
करुण चिन्ह
भीगे आँसुओं की आर्द्रता
प्यार की नमी

करवटों की सघन चुप्पी-बाद
रोप आई हूँ कुछ सिलवटें
तुम्हारी चादर में
बेचैनी के रेखाचित्र
स्पर्श की आकुल-व्याकुल भाषा-लिपि
प्यार की ऊष्मा

मौन एकटक निहार बाद
लीप आई हूँ अपनी अदृश्य कसमसाती कसक
तुम्हारे आदमकद आईने में
आत्मीयता की ऊष्मा में पगी नरम अमिट साँसें
देह-चन्दन-रज
प्यार के क्रिस्टल

तुम्हारे कमरे की
हवाओं में
घोल आई हूँ एकाकीपन से तपी
अपनी उतप्त साँसें
जो लिखती ही रहती हैं
पल-प्रतिपल
प्राण-पट्ट पर
प्रणय का अघोषित घोषणा-पत्र ।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

।। कुँवारा आनंद-सुख ।।




















तुम्हारे शब्द
छूते हैं पूरा दिवस
आकार लेने लगता है समय
सार्थक होने के लिए

आत्मा
प्रणय के वसन्त में
लेती है पुनर्जन्म
प्रस्फुटित होता है सौंदर्य
भीतर से बाहर तक
सर्वांग में ।

स्नेह लहरों के
स्पर्श भर से
अनुभव होती है पूर्ण नदी
वर्षों तलक
कि आत्मा जी लेती है अक्षय
कुँवारा आनंद सुख ।

बुधवार, 19 नवंबर 2014

।। आत्मा के समुद्र की व्याकुल आहटें ।।


















मन मछली को
देह नदी से निकालकर
डुबा देना चाहती है वह
आत्मा के समुद्र में
क्योंकि
रेत नदी है   देह
सूखी और प्यासी

मन के उजाले को
देह के अन्ध-अँधेरे कोटर से निकाल
सूर्य-रश्मि बन
लौट जाना चाहती है वह
सूर्य-उर में
अंतहीन अँधेरी सुरंग है देह
पथहीन

मन की धड़कनों की
ध्वनियों में
रचना चाहती है
तुम्हारे नाम के पर्यायवाची शब्द
उन शब्दों में रमाकर
अपनी धड़कनों को
भूल जाना चाहती है 'स्व' को
और महसूस करना चाहती है
ऋचा की पवित्र अनुगूँज की तरह तुम्हें
मिथ्या-शब्दों के छल से दग्ध आत्मा को
निकाल लेना चाहती है
तुम्हारे नाम से
तुम्हारी साँसों से
अपनी संतप्त धड़कनों के बाहर

मन की साँसों से
ऋतुओं के प्राण को
खिला देना चाहती है
देह-पृथ्वी के अनन्य कोनों में
तुम्हारी कोमलता की हथेली में
लिख देना चाहती है वह
अपने अधरों से
कुछ प्रणय-सूक्त

तुम्हारे नाम की
पवन-धारा में
नहा आई साँसों को
लगा देना चाहती है
प्रणय-देह-शंख में
जीवन-जय-घोष के लिए
मन-देह को
प्रणय-शब्द-देह में
घिस-घुला देना चाहती है
चंदन की तरह
वह
चुपचाप
स्वर्ण शहद में तब्दील हो जाना चाहती है
सुख के शहद को जानने के लिए ।

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

।। चिट्ठी की आँखों में ।।

















चिट्ठियों में
आते हैं शब्द
चुपचाप   तुम्हारी तरह
दबे पाँव … बेआहट
तुम्हारी आँखों की तरह
मौन निहारते और निरखते हैं
चेहरे की चुप्पी
हँसते मुखौटे आँसू

मेरी आँखें
चिट्ठी के शब्दों से
पीती हैं तुम्हारे आँसू
और तुम्हारे शब्दों की आँखें
सोखती हैं मेरी विकलता
तुम्हारे शब्दों में होती है
तुम्हारी साँसों की आकुल-बेचैनी
और अकेलेपन की अकाट्य-कथा
संतप्त चित्त की रागिनियाँ
बजती हैं अहर्निश

चिट्ठी की
पत्र-पृष्ठ हथेली में
होती है
प्राणों की प्रणय-मुट्ठी
तुम्हारा विकल्प
तुम्हारे ही लिखे शब्द हैं
अभिन्न और चुप ।

सोमवार, 17 नवंबर 2014

।। सच के भीतर से ।।





















तुम
मेरे पास
सुख की तरह हो
जैसे - जड़ों के पास जमीन

तुम्हारा स्पर्श
मुझे छूता है
जैसे - सूरज छूता है पृथ्वी

तुम पढ़ते हो
मेरा सर्वस्व
जैसे - आँखें पढ़ती हैं सब कुछ
शब्द और साँसों से परे जाकर

तुम
मेरे पास
स्वप्न के सच की तरह हो
जैसे - आँखों के पास दृष्टि

तुम्हारे
सामने होने भर से
आँखों में जिए गए स्वप्न
घुल जाते हैं प्रणय-देह में
देह में उजागर होती हैं
स्वप्न की रेखाएँ और रंगत
पके अनाज-सी उठती है सोंधी-गंध

स्वप्न-भूख
तृप्त होती है
सिर्फ तुम्हारे
पास होने भर से
जैसे - हिम शिखर के निकट मेघ-देह हो
अपने में सिमटी
शिखरों से लिपटी
ग्लेशियर पर पिघलती हुई बरसने को आतुर ।

शनिवार, 15 नवंबर 2014

।। अर्क ।।



















संवेदनाओं की पोरों से
तुम्हें छूकर
सहेज लेती हूँ अन्तर्तम में
संबंधों की अनुभूतियों का अमृत-अर्क

पिघलता और घुलता हुआ
जो ओले की तरह गल जाता है पोर-पोर में

अमृत-अर्क
ऊर्जा से ऊष्मा में बदलता रहता है धीरे-धीरे
साँसों से साँसों में
जैसे आँव में पकती है
कच्ची मिट्टी

तुम्हारे होंठों के शब्द
तुम्हारी बेकल आँखों की तरह
उतर जाते हैं मन-सरोवर में
झील में
झिलमिलाते क्षितिज तट की तरह
उतरते हैं मुझमें
मुझसे मिलने के लिए
एकांत के आत्मीय क्षणों में

स्पर्श ने अपनी छुअन से
रचे हैं तुम्हारे अपरूप-प्रणय रूप ।

मंगलवार, 11 नवंबर 2014

।। पूर्वाहट के बगैर ।।




















प्रेम
अपनी पूर्वाहट के बगैर
गुपचुप … चुपचाप
पहुँचता है आपके भीतर
भीतर से -
कुछ और मुलायम करता हुआ
कुछ और कमसिन
कुछ और नाजुक
कुछ और पतला
कुछ और तरल
कुछ और सरल
कुछ और सूक्ष्म
कुछ और अधिक सूक्ष्मता से
भीतर-ही-भीतर थामता और समेटता है सब कुछ

प्रेम
अपनी पूर्वाहट के बगैर
आगमन के संकेत
साँसों की हवाओं में घोले बगैर
आँखों की कोरों से
दबे पाँव रिसकर पहुँचता है
नयनों की अनयन पारदर्शी झील में
ठहरता और प्रतीक्षारत रहता है
जीने के लिए अतृप्त सुख

प्रेम
चुपचाप
आपको चुराते हुए
आपके भीतर रहता है
जैसे
आकाश की शून्यता में ब्रह्माण्ड ।

सोमवार, 10 नवंबर 2014

।। वसन्त के रंग ।।





















प्रेम
देह गुहा के भीतर
चमत्कार की तरह
घटित होता है
चकाचौंध करता हुआ
विस्मित करता है

प्रेम
देह-गुहा के भीतर
उजाले की तरह
घुसता है
प्रगाढ़ता के तन्तुओं को
रोशनी के आगोश में समेटता है
देह-भित्ति में
चित्रकार की तरह
रचता है
उर-उजली रेखाओं से
युगल की एकल अनुभूति

देह-भीत पर
स्पर्श की
कोमल कमनीय तूलिका से
देहावरण पर नहीं
देहाभ्यन्तर में
उभरते हैं प्रणय-चित्र
अमिट आत्मीय अभिन्न
कि पोर-पोर को
छू लेती है वह आत्मा
कि जिसके होने भर से देह
दो भित्तियाँ
एकात्म हो
देह-उर-भीतर
बनाती हैं -
खुद-ब-खुद 'घर'
प्रणय का
विश्वास का
समर्पण का

जैसे
शिशु अपना प्रथम घर बनाता है
माँ की कोख में
और अपनी धड़कनों से
लिखता है प्रथम इबारत
स्त्री के वक्ष पर

प्रणय का परिणाम फल
जो स्त्री के देह-वृक्ष पर फलता है
और देह-वक्ष पर वसन्त की तरह खिलता है ।

शनिवार, 8 नवंबर 2014

।। अनुपस्थिति में ।।



















तुम्हारी अनुपस्थिति में
होता है
सिर्फ तुम्हारा प्रेम
देह नहीं
देह के इतर

आँखों की स्मृति में
शेष रहता है
तुम्हें देखकर छूने का
तरल तोष

देह के स्मृति-कोश में
संचित होता है
स्पर्श का आत्मीय विश्वास
आत्मा में
शेष रहता है
सघन तृप्ति का
अमिटबोध

तुम्हारी अनुपस्थिति में
नहीं होती अपेक्षाओं की परिधि
कुछ खो जाने का भय
समय के रिसकर
फिसल जाने की चिंता

सिर्फ होती है
तुम्हारी न हारने वाली
            हेरती दृष्टि

नहीं होती हैं
तुम्हारी आसक्ति की सिलवटें
न ही तुम्हारा देह-मोह
न ही तुम्हारी बेचैनी
और न ही क्षण-भर में
सब कुछ
अपनी अंजलि में समेट लेने की
उद्दाम जिजीविषा

तुम्हारी अनुपस्थिति में
होता है
सिर्फ तुम्हारा प्रेम
देह नहीं
देह से इतर ।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

।। महुआ-सा प्रेम ।।





















प्रणय
तुमसे कुछ नहीं
सिर्फ …
अभय की नाव
दोना-भर विश्वास
महुआ-सा प्रेम चाहिए
… महकता और महकाता

बाँझ होती संवेदना के संबंधों को
जीने और जिलाने के लिए

मन पर जम आई
माटी की मटियाली पर्त को
धोने-बहाने के लिए

चूसे गए रक्त से
सूखी पड़ी पथराई देह के लिए

देह की भूख के लिए नहीं
मन की तृषा के लिए

आत्मा की पवित्र तृप्ति के लिए

आदम दृष्टि के
विद्युतीय दाह से
स्याह धब्बों को मेटने के लिए

धुँआई साँसों के
घुटन-भरे छल्लों से मुक्ति के लिए

मन पर पड़ती
धूसर-मार की कहानी को कहने के लिए

तनाव के उत्ताप-संसार के दबाव
संताप के रेशे-रेशे को खोलकर
तुम्हारी झोली में डाल सकें

प्रणय
तुमसे कुछ नहीं
सिर्फ …
अभय की नाव
दोना-भर विश्वास
महुआ-सा प्रेम
… महकता और महकाता

प्रणय-वृक्ष से झरे
पात की पर्णकुटी हो तुम
तन की ही नहीं
मौन मन की भी
रजत रज का सैकत तट
ब्रह्मानंद का ब्रह्मनद
ब्रह्मनद का प्रणय-तट

तरंग हथेलियों में
लहरों की अंजुलियों में
श्वेत-प्रणय-शंख
पवित्र प्रेमोन्माद से अनुगूँजित
मेरी हथेलियों में
तुम्हारा प्रणय शंखवत
साँसों से लगा
साँसों को सुनता
स्वप्न-साँस को
सच साकार करता
शंखनाद प्रणय निनाद

तुमने …मैंने साथ-साथ सुना …फिर सबने सुना
जिसकी प्रतिध्वनि उड़ान भरते पक्षियों की चहचहाहट में
शाश्वत गूँजती है हवाओं-सी बजती, बादल-सी चमकती,
बरसती है

तुम और मैं सुने या न सुनें
पर सुनाई देती है दिशाओं की धड़कनों में ।

मंगलवार, 4 नवंबर 2014

।। प्रेम की हथेली ।।


















घड़ी में
जागता है समय
स्मृतियों का

प्रिय की साँसों में
            उसकी साँसें

अपनी आँखों में
जोड़ लिए हैं उसने
प्रिय के नयन
जी-जीवन जुड़ाने के लिए

प्रिय की सुगंध को
         सहेज लाई है
         सामानों में …
कि वे जीवित स्वप्न बन गए
और प्रिय के पहचान की सुगंध
प्रणय-अस्मिता के लिए

कि अब
उसके सामान और वह
प्रिय की पहचान दे रहे हैं
प्रेम की हथेली की तरह ।

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

।। ऋचाओं के भीतर से ।।


















प्रेम
देह के भीतर नहीं
होता है विश्वास की देह में
पवित्र आत्मीयता की आत्मा में
धड़कनों में ध्वनित आस्था में

जैसे
पाषाण खंड में होता है
ईश्वर के होने का विश्वास
जैसे
चित्र की रंग रेखाओं में
होती है किसी के होने की आस्था

जैसे
तस्वीर के रंगों में
होती है किसी के होने की तासीर
अपनेपन का स्पन्दन

प्रेम
अदृश्य और अमूर्त है
अलौकिक पर लौकिक
जैसे
डाला छठ में दिया हुआ निर्जला उपवासी अर्ध्य
पहुँचता है सूर्य के चरणों तक

जैसे
करवा चौथ में अर्पित श्रृंगारिक व्रत
सुहागिन की पति-सुख-कामना पहुँचती है
              चन्द्रमा के वक्ष तक
जैसे
अक्षत के दाने
पहुँचते हैं देवताओं के मंगल-अभिषेक तक

जैसे
हवन और पुष्पाहुति
पहुँचती है वेद-ऋचाओं तक
जैसे
कुरान की आयतों की इबारत
पहुँचती है खुदा तक

जैसे
प्रेयर पहुँचती है गॉड तक
जैसे
शब्द से पहुँचता है अर्थ
वैसे ही
देह से पहुँचता है प्रेम
देह तक

ध्वनि और स्पर्श से परे
अध्वनित ही ध्वनित
भीतर से भीतर तक
उर के अन्तस् तक
पर्तों के पृष्ठों बीच
कुछ लिखता
कुछ रचता
जिसे कभी आँखें समेट लेती हैं
कभी अधर उठा लेते हैं
भीनी गुनगुनाहट के लिए ।

रविवार, 19 अक्तूबर 2014

।। जैसे बीज की पुलक सुनती है धूप ।।


















सुदूर से
आत्मवत होती हुई उजास-सी
महसूस होती है धड़कनों की थिरकती गूँज

अनुभूति की कोमल वीथियों से
गुजरता है
तुम्हारी साँसों का आत्मीय संस्पर्श
संबंधों का ताप
रक्त में प्रणय उत्ताप
आत्मा की शक्ति बनकर

अगोरता है सिर्फ तुम्हारी
न हारने वाली हेरती दृष्टि
जिसे मैं देखती नहीं, सुनती हूँ

जैसे
झरनों का घोष
सुनती है झील

जैसे
किरणों का मौन
सुनता है आकाश

जैसे
सागर का उत्ताप
सुनती हैं हवाएँ

जैसे
दरार की वेदना
सुनती है धरती

जैसे
बीज की पुलक
सुनती है धूप

जैसे
ऋतु खिलने का सौंदर्य
सुनती हैं हवाएँ

वैसे ही
सुनती हूँ तुम्हारा मौन
तुम्हारे स्पर्श की तरह

सुनती हूँ तुम्हें दिन की तरह
महसूस करती हूँ रात की तरह ।

गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

।। अभिमंत्रित साँसों ने ।।


















मेरे-तुम्हारे
प्रणय की साक्षी है प्राणाग्नि
अधरों ने पलाश पुष्प बन
तिलक किया है प्रणय भाल पर
मग-मृग की कस्तूरी जहाँ सुगन्धित है
साँसों ने पढ़े हैं अभिमंत्रित
सिद्ध आदिमंत्र

एक-दूसरे के देह-कलश के
अमृत-जल ने
पवित्र की है देह
जो प्राणवन्त हुई है
भीग-भीग कर

सृष्टि की सुकोमल
पुष्प-पाँखुरी अधर ने
अपने मौन स्पर्श से
लिखे हैं
वक्ष पट्टिका पर
प्रणय के अघोषित शब्द
जिन्हें स्पर्श की आँखें
जानती हैं पढ़ना

देह के हवन-कुंड में
पवित्र संकल्प के साथ दी है
अपने-अपने प्राणों की
चिरायु शक्ति

प्रणय शिशु के
चिरंजीवी होने के लिए
प्राण-प्रतिष्ठा की है साँसों की
देह की माटी में
रोपे हैं जौ
प्रणय के प्रथम-बीज ।

बुधवार, 15 अक्तूबर 2014

।। हथेली ।।

























'अकेलापन' पतझर की तरह
उड़ता फड़फड़ाता है

प्रिय की तस्वीर से
उतरता है  स्मृतियों का स्पर्श
देह मुलायम होने लगती है
चाहत की तरह

हथेलियों से
हथेलियों में
छूटती है    भावी रेखाओं की छाया

प्रेम की भाषा प्रेम है
सारे भाष्य से परे ।

प्रेम एकात्म अनुभूतियों की
अविस्मरणीय दैहिक पहचान है

देहाकाश में
इंद्रधनुषी इच्छाओं के बीच
बर्फीले पहाड़
बादल की तरह उड़ने लगते हैं

तुमसे कहने की सारी बातें
वियोग में घुल कर
आँसू बन जाती हैं
और पोंछती हैं    अकेलेपन के निशान ।

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

।। क्रिया-कर्म ।।


आदमी
आहिस्ता-आहिस्ता
खत्म करता है
एक स्त्री के भीतर का
स्त्रीत्व

चूमता है देह
सोख लेता है
देह का देहपन
कि धूमिल होने लगता है
स्त्री का स्त्रीत्व

धीरे-धीरे
काटता-छाँटता है दिमाग
तराशता है दिल
उसकी उम्र ढलने से पहले ही
कुतरता है आत्मा
कि आत्महीन होकर
गिर जाती है अपनी ही देह-भीतर
                       लाश की तरह

जैसे उसकी देह ही
ताबूत हो उसका ।

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

।। विदेह-देह की गोदावरी ।।

























तुम
मेरे भीतर
अन्वेषित करते हो
अन्तः सलिला
और अमृत जल

मैं
तुम्हारे भीतर से
अनाम समुद्र
जिसके आवेग में
विलुप्त हो जाती है देह

तुम
मेरे अन्तस् की
अबोधित गुहा-गेह को
करते हो सम्बोधित
लिखा होता है
स्पर्श में तुम्हारा नाम
आत्मा के नम-ऊष्म तोष के लिए

तुम
मेरे निष्प्राण पहाड़ों में
उँगलियों की आँखों से खनते हो
और रचते हो साँसों के अधरों से
गन्धमयी सरस पुष्प-घाटी
आत्मा जान जाती है
जीवन की प्रकृति का
अलौकिक सौंदर्य-सुख ।

बुधवार, 1 अक्तूबर 2014

।। आकांक्षा का अल्पना-लोक ।।

























एकनिष्ठ पूजा के लिए
रचा है मूर्ति को
कल्पना का एक
अद्भुत अल्पना-लोक
जहाँ सिर्फ अनुभूति सुख है
आत्मीय बूँदों का

तुम्हारी साँसें
तैरने लगती हैं
मेरी मन साँसों में
मछलियों की तरह
और धोती हैं
अपना रुपहला वर्ण
और रंगीन चंचलता

मेघों के बीच से
आती हुई धूप
धरती पर
रचती है  मेघ का छाया वृक्ष
जैसे तुम्हारी आवाज
मेरे भीतर तुम्हें ।

मंगलवार, 30 सितंबर 2014

।। राग में शब्द ।।

























प्रेम में
साँस की लय में रचे हुए शब्द
घुल जाते हैं    अपनी लय में
जैसे    राग में शब्द
         शब्द में राग ।

प्रेम की
सार्वभौमिक गूँज-अनुगूँज में
विस्मृत हो जाता है   स्व और सर्वस्व
शेष रहता है    प्रेम
         और… सिर्फ प्रेम प्रेम प्रेम

जैसे
      समुद्र में समुद्र
      धरती में धरती
      सूरज में सूरज
      चाँद में चाँद
      और तृषा में तृप्ति
                  प्यास में जल

जीवन में    जीवन की तरह ।

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

।। शब्दों के पूर्वजों से ।।

























मन-वक्ष से
बिछुड़े हुए मन की
पसीजी हुई कशिश
तुम्हारी हथेलियों की
छूट गई है मेरी मुट्ठी में

फड़फड़ाती चिड़ियों की
स्तब्ध फड़फड़ाहट
ठहर गई है
मेरी साँसों में

तुम्हारी अनुपस्थिति की
तुमसे
कुछ कहने की कोशिश में
अपने शब्दों में
शब्दों के पूर्वज को
याद करते हैं

उन पूर्वजों में
खोजते हैं अपनी आत्मा के पूर्वज
शिकस्त पड़ी हुई आत्मा को
कुछ होश में ला सके
शब्दों में
पूर्वजों की स्मृति
स्मृति में शब्दों के पूर्वज ।

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

।। अधूरे चाँद के निकट ।।


















सूर्य रश्मियों से
सोख ली है प्रणय उर्मियाँ
अधूरे चाँद के निकट
रख दी हैं स्मृतियाँ
ह्रदय प्रसूत तुम्हारे शब्द
पूर्णिमा की ज्योत्स्ना से समृद्ध

स्वाति नक्षत्र की बूँद से
पी है निर्मल नमी
वसन्त के गन्ध-बीज को
उगाया है मन वसुधा में
साँसों में
जो रहता है मेरी खिड़की को थामे

अंतरिक्ष के तारे को
और आँखों के भीतर
स्वप्न-पुरुष बनकर
नाम दिया है उसे तुम्हारी
नक्षत्र-लोक में
अपना प्राण-पुरुष भेजा है
चुपचाप ।

शनिवार, 20 सितंबर 2014

।। आत्मा के समुद्र की व्याकुल आहटें ।।


















मन मछली को
देह नदी से निकालकर
डुबा देना चाहती है वह
आत्मा के समुद्र में
क्योंकि
रेत नदी है   देह
सूखी और प्यासी

मन के उजाले को
देह के अन्ध-अँधेरे कोटर से निकाल
सूर्य-रश्मि बन
लौट जाना चाहती है वह
सूर्य-उर में
अन्तहीन अँधेरी सुरंग है देह
पथहीन

मन की धड़कनों की
ध्वनियों में
रचना चाहती है
तुम्हारे नाम के पर्यायवाची शब्द
उन शब्दों में रमाकर
अपनी धड़कनों को
भूल जाना चाहती है 'स्व' को
और महसूस करना चाहती है
ऋचा की पवित्र अनुगूँज की तरह तुम्हें

मिथ्या-शब्दों के छल से दग्ध आत्मा को
निकाल लेना चाहती है
तुम्हारे नाम से
तुम्हारी साँसों से
अपनी संतप्त धड़कनों के बाहर

मन की साँसों से
ऋतुओं के प्राण को
खिला देना चाहती है
देह-पृथ्वी के अनन्य कोनों में
तुम्हारी कोमलता की हथेली में
लिख देना चाहती है वह
अपने अधरों से
कुछ प्रणय-सूक्त

तुम्हारे नाम की
पवन-धारा में
नहा आई साँसों को
लगा देना चाहती है
प्रणय-देह-शंख में
जीवन-जय-घोष के लिए
मन-देह को
प्रणय-शब्द-देह में
घिस-घुला देना चाहती है

चन्दन की तरह
वह
चुपचाप
स्वर्ण शहद में तब्दील हो जाना चाहती है
सुख के शहद को जानने के लिए ।

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

।। तुममें समय ।।

























तुममें समय
और समय में तुम्हें देख पाती हूँ
 
तुममें कालिदास
और कालिदास में तुम्हें पढ़ आती हूँ
 
तुममें सागर
और सागर में तुम्हें जी लेती हूँ
 
तुममें ऋतु
और ऋतुओं में तुम्हें खोज लेती हूँ
 
तुममें प्रणय
और प्रणय में तुम्हें महसूस करती हूँ
 
तुममें शब्दार्थ
और शब्दार्थ में तुम्हें निहारती हूँ
 
तुममें अस्तित्व
और अस्तित्व में तुम्हें धारण करती हूँ
 
तुममें सुख
और सुख में सिर्फ तुम्हें बुलाती हूँ ।

सोमवार, 15 सितंबर 2014

।। मेरी आँखें तुम्हारा एलबम ।।


















आँखों में
तुम्हारी तस्वीरें रखी हैं
मेरी आँखें
तुम्हारा ही एलबम हैं

तुम्हारी आवाज
संगीत की तरह
गूँजती-बजती है भीतर-ही-भीतर
नए राग की तरह
रागालाप में लगी रहती है निरन्तर
साधक की तरह

धड़कनों में
धड़कती हैं तुम्हारी ही धड़कनें
साँसों में
प्रणय साधना अविचल
तुम्हारी ही हथेलियों के स्पर्श से
जाना कि खजुराहो के शिल्पी
तुम्हारे ही पूर्वज रहे हैं

मन-देह भीतर
गढ़ी है एक प्रणय-प्रतिमा-जीवन्त
जिसे अपनी आँखों से
अनावृत किया है मेरी आँखों में ।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

।। कसक-कथा ।।

























प्रेम
मन का शब्द
देह का मौन

प्रेम
मन का चैन
देह का सुख

प्रेम
मन की निश्चलता
देह की चंचलता

प्रेम
मन का ग्लेशियर
देह का लावा

प्रेम
मन की गुप्त गोदावरी
देह का प्रपात

प्रेम
मन की तरल सुगंध
देह का भीना लावण्य

प्रेम
मन की मंजूषा
देह की मंजरी

प्रेम
मन का स्पंदन
देह का विकल क्रन्दन

प्रेम
मन की निर्मल अकुलाहट
देह की पवित्र अभिव्यक्ति

प्रेम
मन की शीतलता
देह का धवल ताप ।

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

।। चुपचाप अँधेरा पीने के लिए ।।


















तुम्हारी
आवाज के वक्ष से
लगकर रोई है
मेरी सिसकियों की आवाज

अक्सर
विदा लेते समय
अपनी सुबकियाँ
छोड़ आते हैं होंठ
तुम्हारे भीतर

तुम्हारी
हथेली के स्पर्श में
महसूस होता है
दिलासा और विश्वास का
मीठा और गहरा
नया अर्थ

मन गढ़ता है
मौन के लिए
नए शब्द
जिसे
समय-समय पर
सुनती है
मेरे सूने मन की
मुलायम गुहार

अपने थके कन्धों पर
महसूस करती हूँ
तुम्हारे कन्धे
जिस पर
चिड़िया की तरह
अपने सपनों के तिनके
और आँसू की नदी
छोड़ आती हूँ चलते समय
हर बार

(कैसे बहने से बचाओगे
मेरे सपने
मेरे ही आँसुओं की नदी से)

तुम्हारी दोनों
आँखों में
एक साथ है
सुबह का तारा
और सान्ध्य तारा
जिसे
मेरी आँखों की स्तब्ध अंजुलि में
सौंपकर
मुझे विदा करते हो तुम

अकेले
चुपचाप अँधेरा पीने के लिए ।

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

।। एक ऋतुराज के लिए ।।

























तुम्हारी आँखें
लिखती हैं चिट्ठी
आँखों के कागज पर
पढ़वाती हूँ जिसे हवाओं से
और तुम्हारी साँस-सुख खींच लेती हूँ वृक्षों से
और तुम्हारे अस्तित्व में विलीन हो लेती हूँ सूर्य से
और तुम्हारा प्रणय-ताप रक्त में जी लेती हूँ मेघों से
और तुम्हारे विश्वासालिंगन में सिमट जाती हूँ

तुम्हारी छवि-परछाईं के
रन्ध्र-रन्ध्र के दर्पण में
उतर जाती हैं पुतलियाँ
सारी रात
बिनती और सहेजती हैं
चुए महुए-सा जिसे

तुम्हारी आँखें
लिखती हैं पाती
मन के दोनों पृष्ठों पर
जैसे हवाएँ
एक साथ लिखती हैं
वसुधा और गनन के मन भीतर
नम पाती
जिसे ऋतुएँ बाँचती हैं हर बार
एक ऋतुराज के लिए

हवाओं में
घोलती हूँ साँसें
और साँसें लिखती हैं
तुम्हारे नाम चिट्ठी हवाओं में
और तुम्हें खोजती हैं दसों दिशाओं में

धूप में
बढ़ाती हूँ अपनी
आत्मा की अग्निगर्भी दीप्ति
तुम तक पहुँचाती हूँ तुम्हारे लिए
अक्षय प्रणय प्रकाश
तुम्हारे मन की खिड़की से जो
पहुँचता होगा तुम्हारे निकट से निकटतर
कि नैकट्य की
नूतन परिभाषाएँ रचती होगी
तुम्हारी अतृप्त आत्मा

वृक्ष को सौंपती हूँ
वक्ष की अन्तस् की परछाईं
अपनी धड़कती आकाँक्षाएँ
मुँदे हुए स्वप्न
झुलसी हुई मन-देह
वृक्ष जिसे चुपचाप
कहता है अपने झूम-घोष से
जो तुम तक
हवाओं का शोर
बनकर पहुँचता है
मेरे मन का रोर ।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

।। धूप की धारदार आँच में ।।

























सादे कागज को
धूप की धारदार आँच में
सेंककर
और अधिक उजला किया

रात की स्याह हथेलियों के
अंधे छापे से बचाकर
कोरे कागज पर 
चाँद की तरल चाँदनी से भिगोकर
एकसार शब्द लिखे

बिना अक्षरों के
अनुभूत करनेवाली
अनुभूतियों की भाषा लिखी

सादे कागज को
चंचल हवाओं का
नरम सुख पिलाया

ऋतुओं की
बारीक गंध धागों से
मन के कोर बाँधे
सादे कागज पर
और कुछ पाँखुरी रखी
(फूल के अधूरे-अधर हस्ताक्षर)
कोरे कागज पर

जिंदगी के सूने पन्नों पर
ऐसे ही रचा जा सकता है
आत्मीय शब्दों का मोहक जंगल
बिना किसी अपेक्षा के

सादे कागज के
कोरेपन पर
झरने का शोर
झरता है शब्द बनकर

अनायास एक समुद्र-सा
उमड़ता है
मन की सीमाओं को तोड़कर
मन के भीतर ही
एक नया भाषा-समुद्र रचता हुआ

बिना ध्वनियों के
बारीक इबारत
आँखों के बिना
जिसे मन पढ़ता है
कोरा मन …

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

।। तुम्हारे अंतरंग के अथाह तल पर ।।


















अगर सिर्फ
प्रेम कहना चाहती
तो बहुत सरल
कुछ शब्द लिख देती
कोरे कागज पर
सूखी रेत पर
और रच देती
प्रेम का पूरा संसार
तुम्हारे अंतरंग के अथाह तल पर

उजली महक की अनुभूतियों का
महाप्रस्थान
तुम्हारी भावना की वेदी में
समाहित होकर
चिर समाधि में विलीन होना चाहता है

मेरी बेबस बेचैन आत्मा की
उतप्त अकुलाहट
देह से परे जाकर
दूसरी आत्मा की देह को सुनना चाहती है

आत्मा-मुक्ति के लिए
भावना के नवाचार में बँधी
प्राण-देह
तितली की तरह
विकल होकर
उड़ने से अधिक
बोलना चाहती है
प्रेम के नए-नए शब्द
नए-नए रंग में

कहना मुश्किल कि
तितली के पंखों के रंगों में
कहाँ से आती है शहद-सी मिठास

वैसे ही, बिल्कुल वैसे ही
जानना मुश्किल
मन की प्रकृति में
कहाँ से शामिल होता है
प्रेम का सौभाग्य-सुख
बगैर किसी पूर्व-संकेत के ।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

।। आत्मा की अंजुलि में ।।


















आत्मा की
अंजुलि में
तुम्हारी स्मृतियों की
परछाईं है
जो घुलती है
आत्मा की आँखों में
और आँसू बनकर
ठहर जाती है
कभी आँखों के बाहर
कभी आँखों के भीतर

तुम्हारी आत्मा के
अधरों में धरा है प्रणयामृत

शब्द बनकर
कभी होंठों के बाहर
कभी होंठों के भीतर

तुम्हें लखते हुए
आँखें खींचती हैं तुम्हें
सघनतम प्राण-ऊर्जा से
आँखों के भीतर
कि तुम्हारी अनुपस्थिति के क्षण को
जी सके एकाकी आत्मा
जैसे चाँद सारी रात
उजलता हुआ भटकता है
बस भटकता है सारी रात

दिन के उजाले में
खोकर भी खोजता है
तुम्हें और तुम्हारा बजूद

चाँद के साथ
तारों-सितारों की
घनी बस्ती है 

सप्तर्षि से लेकर
ध्रुव तारा तक
आकाश-गंगा
और मंगल-ग्रह तक
पर चाँद के लिए
कोई प्रणय गंगा नहीं
कोई सहचर-सरिता नहीं

चाँद ऐसे में
जनता है अपने ही अस्तित्व में
अपनी ज्योत्स्ना
अपने लिए अपनी चाँदनी
चाँद उसमें खोता है
और चाँदनी उसमें

कहीं ऐसे ही
तुम मुझमें
और
मैं तुममें तो नहीं ।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

।। अनुपस्थिति के घर में ।।

























तुम्हारी अनुपस्थिति के दुःख से जाना
तुम्हारी उपस्थिति का सुख
तुम्हारी अनुपस्थिति में
बनता है मेरे भीतर
सूनेपन का
एकांत अकेलापन

अपने प्रवास के कारण
अतिथि नहीं रहता है
डर

दिशाओं का अँधेरा
समेटकर
गठरी बनाकर
सिरहाने रखकर
सुस्ताता है

लोकव्यथा के शब्द बुदबुदाता
सन्नाटे का
भयानक शोर
हदस की धुंध
बनकर घुस आता है

आँखों में
अनुपस्थिति का
सिर्फ कसैला कोहरा होता है
जिसमें डर का
घर नहीं दिखता है
पर डर का घर होता है
जिसमें घुटन बसती है

तुम्हारी अनुपस्थिति में
मन की पृथ्वी पर
कोई सृष्टि नहीं होती है

दृष्टि में सिर्फ
पक्षियों की फड़फड़ाहट
नदी का दुःख
पेड़ का मौन
सागर की बेचैनी
तूफान की आग
ऋतुएँ के मन की
बंजर होने की खबर
सिर्फ फैली-उड़ती दिखती हैं

तुम्हारे जाने के बाद
सुख में तब्दील
हवा की हथेलियों के
झोंके की अंजुलि में
भरकर
पहुँच जाना चाहती हूँ
तुम्हारी साँसों में

एक ऋतु के रूप में
आकार लेकर
एक ऋतु की तरह फैल जाना चाहती हूँ
तुम्हारे भीतर
अपना पुनर्जन्म पाकर
फिर से
जीना चाहती हूँ तुममें
जैसे पृथ्वी पर ऋतु
पुनः पुनः
प्रतिवर्ष ।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

।। छाई है परछाईं ।।


















ईश्वर के प्रेम की
छाया है तुम्हारी आत्मा में

ईश्वर अंश है
तुम्हारा चित्त

तुम्हारे प्रेम में
मैं 'प्रेम' का ईश्वर देखती हूँ

तुम्हें
छू कर मैं प्रेम का ईश्वर छूती हूँ

तुम्हारे कारण
पत्थर के भीतर का
विश्वास-ईश्वर देख पाती हूँ

तुम्हारे कारण
पाषाण में बचा है ईश्वर

शब्दों में
तुमने रचा है ईश्वर
कि वह दिखाई देता है आँखों में
और गूँजता है प्राण-साँसों में

तुमने
धर्म में बचाया है ईश्वर
क्योंकि
तुमने हाँ … तुम्हारे अस्तित्व में
है ईश्वर …

इसीलिए तुममें है
ईश्वर का प्रेम
ईश्वरीय प्रेम
पवित्र पारदर्शी

वह अक्षय स्रोत ।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

।। अधरों पर झरी हुई हँसी की स्मृति में ।।


















तुम्हारी आँखों के सामने
मेरा उदास अँधेरा होगा
काई ढके मौत के काले तालाब से
निकला हुआ

ठिठकी हुई
ओस में
मेरे आँसू की
सिसकियों को घुलते हुए
देखती होंगी तुम्हारी आँखें

हरी दूब पर
झर रही
सुबह की धूप में
तुम्हारे होने की खुशी में
झरी हुई मेरी हँसी की स्मृति में
चुनते होंगे सूर्य-रश्मि
झरे हुए हरश्रृंगार के फूल की तरह
जैसे मैं अकेले में

तने पीपल के पेड़ की
एक शाख पर लटके
मधुमक्खी के मौन शहदीले छत्ते को
देख तुम्हारी स्मृतियों में से
कुछ बूँद शहद की 
गिर-टपकी होंगी
तुम्हारे सूखे अधरों पर
जो याद में
प्रायः हलक तक को
सुखा देती हैं

तुम्हारी हथेलियों की चाह की
कोमल विकलता में
कितना भरोसा देता है चाँद
गहरी आधी रात में
अकेलेपन की ठिठुरन में
जब सारी उम्मीदें
बनावटी कागज का घर लगती हैं ।

रविवार, 24 अगस्त 2014

।। मन का ऋतुराज ।।

























आकाश के
नील पत्र पर
धूप-स्याही से
हवाओं ने
'वसंत' शब्द लिखा
मेरे मन का ऋतुराज
तुम्हारी घड़ी में
अपना
समय देखता है

तुम्हारे
शब्दों में
अपने लिए संकल्प
तुम्हारी नींद में
अपने लिए स्वप्न
तुम्हारे लिखे में से
अपने लिए शब्द
आत्मीय शब्द

तुम
मेरी कलाई में
घड़ी की तरह
बँधे हो
तुम्हारी घड़ी में है
मेरा चंचल दिन
ठहरी-ठिठकी रात
तुम्हारी
घड़ी-सुइयों में
प्रतीक्षारत है मेरा समय ।