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March, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

।। अनगिन पड़ाव ।।

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तुम्हारी चिट्ठी के शब्दों की आँखों के तलवों से छूट गए हैं मन के घर में तुम्हारे स्वप्न-चिन्ह शब्दों में ऊँगलियाँ उकेरती हैं भविष्य-फल स्वप्नसुख
प्रतीक्षा की दूरियों के बीच होते हैं शब्दों के अनगिन पड़ाव अर्थ की अनभिव्यक्त छाँव साँसें पीती हैं तुम्हारा नाम उच्चरित करते हैं जिन्हें नयन ओंठ बनकर
आँखें मूँद कर महसूस करती हैं तुम्हें तुम्हारा शब्दरूप बनकर चिट्ठी के गहरे आत्मीय इत्मीनान में डूबकर जी लेती हूँ तुममें होने का आह्लाद-सुख मन की ऋतुओं का तरंगित स्पर्श-सुख
चिट्ठी जैसे हवाओं ने साँसों में लिखी है - नम पाती जैसे सूर्यरश्मि ने जलसतह पर उतरकर आँकी है प्रणय पाती
डूबते सूरज के हाथों में सौपें हैं प्रणय के शब्द यह डाक सुबह जरूर पहुँचेगी खिड़की खोलते ही तुम्हारे सिरहाने जैसे मैं होती हूँ सूरज की रोशनी की तरह संताप से तप्त चिट्ठी पहुँचेगी तुम्हारे सिरहाने स्मृतियों में पगी कथा की तरह ।

।। गुहारती गुहार ।।

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शब्दों से पुकारती हूँ तुम्हें तुम्हारे शब्द सुनते हैं मेरी गुहार
तुम्हारी हथेलियों से शब्द बनकर उतरी हुई हार्दिक संवेदनाएँ अवतरित होती हैं आहत वक्ष-भीतर अकेलेपन के विरुद्ध
बचपन में साध-साध कर सुलेख लिखे कॉपियों के कागज से कभी नाव कभी हवाई जहाज बनाने वाली ऊँगलियाँ लिखती हैं चिट्ठियाँ
हवाई यात्रा करते हुए शब्द विश्व के कई देशों की धरती और ध्वजा को छूते हुए लिखते हैं संबंधों का इतिहास संयोग-सुख और वियोग-संताप
तुम्हारे संकलित शब्द अंतरिक्ष की हवाओं-भीतर गोताखोरी करते हुए डूब जाते हैं मेरे भीतर अकेलेपन के विरुद्ध सलोने संयोग की प्रतीक्षा में ।

।। ज़ाकिर हुसैन की तबला वादकी ।।

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ज़ाकिर हुसैन जगाते हैं नाद की अद्भुत कला तबले पर ऊँगलियों से ।
ज़ाकिर जानते हैं अमूर्त भाव को ध्वनि में मूर्त करना ।
तबले पर
नृत्य करती हैं ऊँगलियाँ सिद्धहस्त नृत्यांगनाओं की तरह ।
हथेली-कलश शीश पर लिए ज़ाकिर की ऊँगलियाँ तबला-मंच की नर्तकी हैं प्रस्तुत करती हैं मुद्राएँ भाव मुद्राएँ ।
ध्वनियों में एक अद्भुत निनाद ।
राग में बजती है लय लय में लरजती है धुन धुन में धुनी रमाते हैं और जगाते हैं संगीत सिद्ध राग ।
ज़ाकिर अपने तबला वादन में गढ़ते हैं तरंगों की नई कला कला का नूतन आधुनिकतावाद नवीन मिठास आत्म निनाद ।
दो गोलार्द्धों की पृथ्वी ने नाप लिया है ज़ाकिर की हथेली तले तीनों लोकों का रहस्य-सुख
मुट्ठी में है उनकी आत्मीयता का सजल अनुराग ।
तबले के दोनों फलक बनते हैं निनाद-कुंड पिघलता है ध्वनि का हिमालय ज़ाकिर की साधना के ताप से ।
तांडवी शंकर के आशीष से रचते हैं वादन-कला थाप और मुद्राओं को जीती और जगाती हुई गूँजती है निनाद-कला अवतरित होता है जीवनदायी संगीत ।
ज़ाकिर होते हैं एकात्म अपनी ही अंतर्धुन की लय में उतारते हैं हथेलियों से जन-मन में जैसे पूर्णिम…

।। कीस मौरिक ।।

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धरती से जोड़े रखता है अपने पाँव जैसे धरती से ही उगे हों वह वे भी वनस्पति की एक प्रजाति हों जैसे                 जंगलजीवी ।
आकाश की नीलिमा से अपनी आँखों को करता है सुनील सागर की सजलता से लेता है अपने उर में निस्सीम सजलता सबके लिए सजल उर मित्र ।
डच निवासी विश्व प्रवासी काम से थककर मिटाता है थकान विश्व के जंगल में जो सुसंस्कृत दुनिया से हैं अधिक कुलीन ।
जानवरों का शिकारी लेकिन, पशु-पक्षी प्रेमी जंगल और पशुओं को बचाए रखने के लिए शिकार करते हैं जानवर ।
दिमागदार बातें होने पर अपनी कनपटी के माथे पर तर्जनी धरकर घुमाते हैं गोल-गोल जैसे कसते रहते हों हर पल                अपने दिमाग को ।
धन के लिए घुमाते हैं अपनी ऊँगलियाँ गोल-गोल तर्जनी पर रगड़ते हैं अँगूठा और मुँह से उच्चारते हैं मनी 'मनी और माइंड' का पर्याय हैं कीस मौरिक मनी के लिए चाहिए माइंड लेकिन माइंड के लिए कुछ और जिसका रहस्य जानते हैं कीस मौरिक और सिर्फ कीस मौरिक ।
घुमंतू पहिये की तरह नहीं थमते हैं पाँव खाली समय मिलते ही जंगल से भरते हैं अपनी आँखें अपना समय ।
समुद्रवर्ती नदी तट पर बसे घर और…

।। स्वदेश बिछोह ।।

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स्वदेश बिछोह में शून्य-सा सन्नाटा छूट जाता है साँसों के तलवों से प्रलय-घोष के समानार्थक धड़कती हैं धड़कनें ।
आँखों के सूरज में है एक धब्बा अँधेरा पूर्ण सूर्यग्रहण-सा ।
आँखों के आँसू नहीं भर पाते शून्य की शुष्कता प्रणय वसुधा की प्राण-वायु से जी हुई साँसों को नहीं जिला पाती हैं विदेशी फ्रेगरेंट हवाएँ ।
अनुपस्थिति का शून्य आँखों की पृथ्वी में अंधेपन की तरह है होंठों पर गूँगेपन की भाषा है ।
कानों में नहीं गूँजती है कोई अनुगूँज ।

।। प्रणय मोक्ष ।।

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प्रेम रंग नहीं, पानी नहीं, उजाला नहीं, अँधेरा नहीं, शीतलता नहीं, सुगंध है सिर्फ अनुभूति भर के लिए ।
प्रेम
प्रकृति नहीं, सृष्टि नहीं, समुद्र नहीं, सूर्य नहीं, चंद्र नहीं, पवन नहीं, सौंदर्य है सिर्फ सुख के लिए ।
प्रेम साँस नहीं, धड़कन नहीं, चेतना नहीं, स्पर्श नहीं, स्पंदन नहीं, अभिव्यक्ति नहीं, देह नहीं, सिर्फ आत्मा है परम तृप्ति और मोक्ष के लिए ।