मंगलवार, 25 मार्च 2014

।। अनगिन पड़ाव ।।

















तुम्हारी चिट्ठी के
शब्दों की आँखों के तलवों से
छूट गए हैं मन के घर में
तुम्हारे स्वप्न-चिन्ह
शब्दों में ऊँगलियाँ उकेरती हैं
भविष्य-फल
स्वप्नसुख

प्रतीक्षा की दूरियों के बीच
होते हैं शब्दों के अनगिन पड़ाव
अर्थ की अनभिव्यक्त छाँव
साँसें पीती हैं तुम्हारा नाम
उच्चरित करते हैं जिन्हें नयन ओंठ बनकर

आँखें मूँद कर महसूस करती हैं तुम्हें
तुम्हारा शब्दरूप बनकर
चिट्ठी के गहरे आत्मीय इत्मीनान में डूबकर
जी लेती हूँ तुममें होने का आह्लाद-सुख
मन की ऋतुओं का तरंगित स्पर्श-सुख

चिट्ठी जैसे
हवाओं ने साँसों में लिखी है - नम पाती
जैसे सूर्यरश्मि ने जलसतह पर
उतरकर आँकी है प्रणय पाती

डूबते सूरज के हाथों में
सौपें हैं प्रणय के शब्द
यह डाक सुबह जरूर पहुँचेगी
खिड़की खोलते ही तुम्हारे सिरहाने
जैसे मैं होती हूँ
सूरज की रोशनी की तरह
संताप से तप्त चिट्ठी पहुँचेगी तुम्हारे सिरहाने
स्मृतियों में पगी कथा की तरह ।

सोमवार, 24 मार्च 2014

।। गुहारती गुहार ।।

















शब्दों से
पुकारती हूँ तुम्हें
तुम्हारे शब्द
सुनते हैं मेरी गुहार

तुम्हारी हथेलियों से
शब्द बनकर उतरी हुई
हार्दिक संवेदनाएँ
अवतरित होती हैं
आहत वक्ष-भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध

बचपन में साध-साध कर
सुलेख लिखे कॉपियों के कागज से
कभी नाव
कभी हवाई जहाज
बनाने वाली ऊँगलियाँ
लिखती हैं चिट्ठियाँ

हवाई यात्रा करते हुए शब्द
विश्व के कई देशों की धरती और ध्वजा को
छूते हुए लिखते हैं
संबंधों का इतिहास
संयोग-सुख और वियोग-संताप

तुम्हारे संकलित शब्द
अंतरिक्ष की हवाओं-भीतर
गोताखोरी करते हुए
डूब जाते हैं मेरे भीतर
अकेलेपन के विरुद्ध
सलोने संयोग की प्रतीक्षा में ।

शनिवार, 22 मार्च 2014

।। ज़ाकिर हुसैन की तबला वादकी ।।



















ज़ाकिर हुसैन
जगाते हैं नाद की अद्भुत कला
तबले पर
ऊँगलियों से ।

ज़ाकिर जानते हैं
अमूर्त भाव को
ध्वनि में मूर्त करना ।

तबले पर
नृत्य करती हैं ऊँगलियाँ
सिद्धहस्त नृत्यांगनाओं की तरह ।

हथेली-कलश
शीश पर लिए
ज़ाकिर की ऊँगलियाँ
तबला-मंच की नर्तकी हैं
प्रस्तुत करती हैं मुद्राएँ
भाव मुद्राएँ ।

ध्वनियों में
एक अद्भुत निनाद ।

राग में बजती है लय
लय में लरजती है धुन
धुन में धुनी रमाते हैं
और जगाते हैं संगीत सिद्ध राग ।

ज़ाकिर
अपने तबला वादन में
गढ़ते हैं तरंगों की नई कला
कला का नूतन आधुनिकतावाद
नवीन मिठास
आत्म निनाद ।

दो गोलार्द्धों की पृथ्वी ने
नाप लिया है
ज़ाकिर की हथेली तले
तीनों लोकों का
रहस्य-सुख
मुट्ठी में है उनकी
आत्मीयता का सजल अनुराग ।

तबले के दोनों फलक
बनते हैं निनाद-कुंड
पिघलता है ध्वनि का हिमालय
ज़ाकिर की साधना के ताप से ।

तांडवी शंकर के आशीष से
रचते हैं वादन-कला
थाप और मुद्राओं को
जीती और जगाती हुई
गूँजती है निनाद-कला
अवतरित होता है जीवनदायी संगीत ।

ज़ाकिर
होते हैं एकात्म
अपनी ही अंतर्धुन की लय में
उतारते हैं हथेलियों से
जन-मन में
जैसे पूर्णिमा की रात में
झरती है चाँदनी
बिना झरे ही
वादन की आभा से
आलोकित होता हुआ ।

वादन की टनक
ध्वनियों की दमक
हर्ष का विजयघोष
चमकता है साधक की देह में
साधना का मूर्त प्रतिफल बनकर ।

तबले के घट में
उतरता रहता है
नाद-अमृत ऊँगलियों से निचुड़कर
श्रोता के स्मृति घर में
अविस्मरणीय झंकार बनकर ।

तबले के कैनवास पर
ध्वनियों के विलक्षण चित्रकार सरीखे
उपस्थित श्रोता के ह्रदय-पटल को भी
बनाते हैं कैनवास
और रचते हैं ध्वनिचित्र और चित्रों का आनंद ।

थाप का अमृत-घोष
ह्रदय में आनंद की स्थायी स्मृति
ज़ाकिर अपनी साधना से
आविष्कृत करते हैं अनहद नाद
अपने साधना-कुंड में
और उलीच निकालते हैं
अपनी हथेलियों से
आनंद का प्रसाद ।

तबला-वादन
अनोखी कला के रूप में
उतरती और अवतरित होती है
पोर-पोर में गूँजता हुआ छलकता है
वादन का हर्ष
कपोलों में वाद्य की लाली
अधरों में सिद्धि का अनुराग
कि सुर भी उतरते हैं सुरा की तरह ।

राग फड़कती हुई उतरती है भुजाओं में
भुजपाश में समेट
अपने वक्ष में सकेल
पुनर्वापसी करते हैं दर्शक श्रोता तक
राग का होता है पुनर्जन्म
रागों के ख़ुदा 'ज़ाकिर'
तबले की पृथ्वी पर
एक विलक्षण अवतार ।

घुड़दौड़ की टापों को
अपनी हथेली की थापों से
ध्वनित करते और रचते हैं
'अश्व राग'
ओ पी नय्यर की संगीत-झलक झंकृत
ज़ाकिर की हथेली में होती है
अश्वराग की लगाम
और वह होते हैं घुड़सवार
घुड़सवारी के मद में उन्मत्त
दिखाई देते हैं मंच पर आसीन
कि याद आती है
अपने नए अर्थ में
धूमिल की कविता - लोहे का स्वाद
                         लुहार से नहीं
                         उस घोड़े से पूछो
                         जिसके मुँह में लगाम लगी है ।

रेल की ध्वनि-गति को
तबले पर चला कर
रचते हैं
रेल-राग
रेलगाड़ी … रेलगाड़ियों को बाईपास
करती हुई गुजरती है कई पुलों से
लंबी रेल-यात्रा का संस्मरण
रचते हैं ज़ाकिर
कि वातानुकूलित और हवाई-यात्री हुए
नवधनिक और कला-अनुरागी
कहीं भूल न जाएँ रेल का रेला-राग
और मोटरों साइकिलों का शोर
सड़क की भीड़
भीड़ का संघर्षमय कोलाहल ।

तबला-वादन की
ऐतिहासिक परंपरा में
जोड़ते हैं वाहनों की ध्वनियों का राग-विराग
गोंदई महाराज, किशन महाराज की काशी परंपरा में
हथेली रचाती है राग की आधुनिक न्यास-शिला ।

थाप की आत्मीयता
वाद्य का अद्भुत सुरीलापन
कि उनकी हथेली तले
तबले में होता है
ज़ाकिर का अस्तित्व
जो रचता है तबले का व्यक्तित्व ।

निष्प्राण तबले की देह में
अपने ओजस्वी कला सिद्ध प्राण
प्राणों की अलौकिक शक्ति
कि अवतरित होता है विलक्षण निनाद ।
देह से देह में
प्राण से प्राण में
कि भारत की राजधानी
दिल्ली के हेयात रीजेंसी सभागार के
एलीट क्लास की आत्ममुग्ध अहंकारी
सजी-सँवरी देह भी
होती है विदेह ।

सोमवार, 17 मार्च 2014

।। कीस मौरिक ।।

















धरती से
जोड़े रखता है अपने पाँव
जैसे धरती से ही उगे हों वह
वे भी वनस्पति की
एक प्रजाति हों जैसे
                जंगलजीवी ।

आकाश की नीलिमा से
अपनी आँखों को करता है सुनील
सागर की सजलता से
लेता है अपने उर में निस्सीम सजलता
सबके लिए सजल उर मित्र ।

डच निवासी
विश्व प्रवासी
काम से थककर मिटाता है थकान
विश्व के जंगल में
जो सुसंस्कृत दुनिया से हैं अधिक कुलीन ।

जानवरों का शिकारी
लेकिन, पशु-पक्षी प्रेमी
जंगल और पशुओं को
बचाए रखने के लिए
शिकार करते हैं जानवर ।

दिमागदार बातें होने पर
अपनी कनपटी के माथे पर
तर्जनी धरकर घुमाते हैं गोल-गोल
जैसे कसते रहते हों हर पल
               अपने दिमाग को ।

धन के लिए
घुमाते हैं अपनी ऊँगलियाँ गोल-गोल
तर्जनी पर रगड़ते हैं अँगूठा
और मुँह से उच्चारते हैं मनी
'मनी और माइंड' का पर्याय हैं कीस मौरिक
मनी के लिए चाहिए माइंड
लेकिन माइंड के लिए कुछ और
जिसका रहस्य जानते हैं
कीस मौरिक
और सिर्फ कीस मौरिक ।

घुमंतू पहिये की तरह
नहीं थमते हैं पाँव
खाली समय मिलते ही
जंगल से भरते हैं अपनी आँखें
अपना समय ।

समुद्रवर्ती नदी तट पर
बसे घर और कार्यालय की
दीवारों पर लगा रखे हैं
मासूम आँखों से हेरते हिरण और बारहसिंहा
घर की मेजों पर बैठा रखे हैं पक्षी
जैसे लकड़ी की मेज
किसी वृक्ष की शाखा हो ।

दिनभर अपनी कंपनी के कार्यकर्ताओं के साथ
जुतते-जूझते
सही साँझ बैठते हैं अपने जानवरों के खोलों के बीच
सहलाते हैं उनका निर्जीव माथा
                   उनकी देह
                   उनके केश
जैसे बेजान होने पर भी
उनकी ही देह में बचा है
स्पर्श का आनंद ।

बच्चों के लिए फरिश्तों की हथेली
दोस्तों के लिए दोस्त के हाथ ।

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

।। स्वदेश बिछोह ।।


















स्वदेश बिछोह में
शून्य-सा सन्नाटा
छूट जाता है साँसों के तलवों से
प्रलय-घोष के समानार्थक
धड़कती हैं धड़कनें ।

आँखों के सूरज में है
एक धब्बा अँधेरा
पूर्ण सूर्यग्रहण-सा ।

आँखों के आँसू
नहीं भर पाते
शून्य की शुष्कता
प्रणय वसुधा की प्राण-वायु से
जी हुई साँसों को
नहीं जिला पाती हैं
विदेशी फ्रेगरेंट हवाएँ ।

अनुपस्थिति का शून्य
आँखों की पृथ्वी में
अंधेपन की तरह है
होंठों पर
गूँगेपन की भाषा है ।

कानों में नहीं गूँजती है
कोई अनुगूँज ।

बुधवार, 12 मार्च 2014

।। प्रणय मोक्ष ।।


















प्रेम
रंग नहीं,
पानी नहीं,
उजाला नहीं,
अँधेरा नहीं,
शीतलता नहीं,
सुगंध है
सिर्फ अनुभूति भर के लिए ।

प्रेम
प्रकृति नहीं,
सृष्टि नहीं,
समुद्र नहीं,
सूर्य नहीं,
चंद्र नहीं,
पवन नहीं,
सौंदर्य है
सिर्फ सुख के लिए ।

प्रेम
साँस नहीं,
धड़कन नहीं,
चेतना नहीं,
स्पर्श नहीं,
स्पंदन नहीं,
अभिव्यक्ति नहीं,
देह नहीं,
सिर्फ आत्मा है
परम तृप्ति और मोक्ष के लिए ।