गुरुवार, 26 जून 2014

।। चाँद : आकाशी हीरा ।।




















चाँद ने
अपना कोई
घर नहीं बनाया
दीवारों से बाहर
रहने के लिए 

सूरज
मकानों से
बाहर रहता है
दीवारों को
तपाने और पिघलाने के लिए

चाँद
वृक्षों की पात हथेली की मुठ्ठी में
अपनी रोशनी को
बनाकर रखता है सितारा

चाँद
घरों के बाहर
अपनी रोशनी से
आवाज़ देता है कि
अँधेरे में
मेरी उजली चमक
लगता है
प्रकृति ने
ब्लैक-बोर्ड पर
चॉक से लिखी हो

ईश्वर की उजली सृष्टि
सूर्य के अस्त होने पर
अँधेरों के खिलाफ
चाँद है आकाशी हीरा ।

गुरुवार, 19 जून 2014

।। घर की याद में ।।












स्वदेश के घर के
अपने कमरे में
छूटा हुआ आदमकद आईना
कि जैसे समय
अपने सामने तुम्हें पाकर
पूछता होगा तुमसे
मेरे बारे में

मेरी अनुपस्थिति को
पूरता होगा समय
साक्षात मेरी तरह

और तुम
गहरी उदासी से थकी
ठंडी आह-भरी साँस से
गीला कर देते होगे
आईने का दमकता वक्ष

तुम्हारी साँसों के
गीले धुएँ से ओसाकर
धुँधला जाती होगी उसकी चमक
ओदेपन में जिसके
छिप जाता है आँसुओं का रिसाव

सात सागर पार
सूरीनाम की धुपीली धरती से
देखती हैं तुम्हें
मेरी आँखें
खुशी की लहक से सराबोर होने के लिए
अब प्रिय की तलाश में
सिर्फ भटकती है
किसी नक्षत्र की तरह

शब्दों में खोजती हूँ उनके लिए रास्ता
कभी वह मुझमें खोजती है रास्ता
परदेश में
बगलगीर बन खड़े हुए शब्द
आत्मशक्ति के प्रतीक बन
आँखों की देह-धरा पर
धान की तरह बोते हैं
जीवन समर्थक
सपनों के शब्द

गुरुवार, 12 जून 2014

।। समय की आँखों में ।।

























समय
खा रहा है मुझे
मैं लील रही हूँ समय

समय
समाधि ले रहा है मुझमें रोज
मैं समाधिस्त हो रही हूँ नित्य
समय में

समय की माटी में
मिल रही है मेरी साँस
समय की माटी को
सान रहा है मेरा रक्त
समय-घट में
मन को शब्द बनाकर
रख रही हूँ अकेले में
मर रहे समय को
जिलाने में लगी हूँ
सावित्री की तरह
समय मेरा सत्यवान है

सर्वस्व समर्पित कर
मानस-देह में
रच रही हूँ समय
अपने ही रक्त-मांस से
काढ़ कर बना रही हूँ समय
सबके लिए समय
विषम परिस्थितियों के विरुद्ध
साहचर्य के निमित्त

समय का अपहरण
कर रहे हैं लोग
नशे के लिए, लोग
पी लेना चाहते हैं समय
स्वार्थ के लिए लोग
भोग लेना चाहते हैं समय
देश-ध्वजा को लोग
पहन डालना चाहते हैं
परिधान की तरह
देश-प्रेम के नारे के साथ
शहीदों के खून से बनी
देश की आजादी को
भोग लेना चाहते हैं लोग

समय के भीतर से
निकाल लेना चाहते हैं
लोग, देश की आँखें
ऐसे कठिन समय में
परदेश में, सात समुन्दर पार
चलकर अपने साथ आए
समय को साध रही हूँ मैं
और समय साध रहा है मुझे
समय की आँखों में देखती हूँ मैं
समय देखता है मेरी आँखों में ।

शुक्रवार, 6 जून 2014

।। प्रवासी शब्द ।।




















सूरीनाम की धरती से
चाँद के वक्ष पर
आँखों ने लिखी है चिट्ठी
प्रतीक्षा में

चाँद के ओठों पर
रखा है अपने अधरों का
स्नेह-अमृत
तुम्हारे लिए

चाँद की आँखों को
सौपें हैं वासंती स्वप्न
तुम्हारी सूनी आँखों को
भरने-पूरने के लिए

ह्रदय से निचुड़कर
आते हैं शब्द शहद की तरह
शब्द शहद रचते हैं
प्रणय का सुगन्धित संवाद
प्रणय
प्रिय का मधु पुष्प है
राग अनुरंजित पराग

तुम्हारे शब्दों में
ह्रदय की अनुभूतियों की चमक है
और प्रणय की अन्तःसलिला का
शीतल अमृत-स्पर्श

नक्षत्रों की तरह
निहारती हूँ तुम्हारे शब्द
मेरे लिए
वे ही हैं सप्तर्षि
वे ही हैं ध्रुवतारा

शब्दों के मौन में
होती है आत्मा की जिजीविषा
अव्यक्त पर व्यक्त
तुम्हारे शब्द इसीलिए
सीते हैं धागे की तरह
मेरा फटा हुआ समय ।