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।। ऋचाओं के भीतर से ।।

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प्रेम
देह के भीतर नहीं होता है विश्वास की देह में पवित्र आत्मीयता की आत्मा में धड़कनों में ध्वनित आस्था में
जैसे पाषाण खंड में होता है ईश्वर के होने का विश्वास जैसे चित्र की रंग रेखाओं में होती है किसी के होने की आस्था
जैसे तस्वीर के रंगों में होती है किसी के होने की तासीर अपनेपन का स्पन्दन
प्रेम अदृश्य और अमूर्त है अलौकिक पर लौकिक जैसे डाला छठ में दिया हुआ निर्जला उपवासी अर्ध्य पहुँचता है सूर्य के चरणों तक
जैसे करवा चौथ में अर्पित श्रृंगारिक व्रत सुहागिन की पति-सुख-कामना पहुँचती है               चन्द्रमा के वक्ष तक जैसे अक्षत के दाने पहुँचते हैं देवताओं के मंगल-अभिषेक तक
जैसे हवन और पुष्पाहुति पहुँचती है वेद-ऋचाओं तक जैसे कुरान की आयतों की इबारत पहुँचती है खुदा तक
जैसे प्रेयर पहुँचती है गॉड तक जैसे शब्द से पहुँचता है अर्थ वैसे ही देह से पहुँचता है प्रेम
देह तक
ध्वनि और स्पर्श से परे अध्वनित ही ध्वनित भीतर से भीतर तक उर के अन्तस् तक पर्तों के पृष्ठों बीच कुछ लिखता कुछ रचता जिसे कभी आँखें समेट लेती हैं कभी अधर उठा लेते हैं भीनी गुनगुनाह…

।। जैसे बीज की पुलक सुनती है धूप ।।

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सुदूर से आत्मवत होती हुई उजास-सी महसूस होती है धड़कनों की थिरकती गूँज
अनुभूति की कोमल वीथियों से गुजरता है तुम्हारी साँसों का आत्मीय संस्पर्श संबंधों का ताप रक्त में प्रणय उत्ताप आत्मा की शक्ति बनकर
अगोरता है सिर्फ तुम्हारी न हारने वाली हेरती दृष्टि जिसे मैं देखती नहीं, सुनती हूँ
जैसे
झरनों का घोष सुनती है झील
जैसे किरणों का मौन सुनता है आकाश
जैसे सागर का उत्ताप सुनती हैं हवाएँ
जैसे दरार की वेदना सुनती है धरती
जैसे बीज की पुलक सुनती है धूप
जैसे ऋतु खिलने का सौंदर्य सुनती हैं हवाएँ
वैसे ही सुनती हूँ तुम्हारा मौन तुम्हारे स्पर्श की तरह
सुनती हूँ तुम्हें दिन की तरह महसूस करती हूँ रात की तरह ।

।। अभिमंत्रित साँसों ने ।।

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मेरे-तुम्हारे प्रणय की साक्षी है प्राणाग्नि अधरों ने पलाश पुष्प बन तिलक किया है प्रणय भाल पर मग-मृग की कस्तूरी जहाँ सुगन्धित है साँसों ने पढ़े हैं अभिमंत्रित सिद्ध आदिमंत्र
एक-दूसरे के देह-कलश के अमृत-जल ने पवित्र की है देह जो प्राणवन्त हुई है भीग-भीग कर
सृष्टि की सुकोमल पुष्प-पाँखुरी अधर ने अपने मौन स्पर्श से लिखे हैं वक्ष पट्टिका पर प्रणय के अघोषित शब्द जिन्हें स्पर्श की आँखें जानती हैं पढ़ना
देह के हवन-कुंड में पवित्र संकल्प के साथ दी है अपने-अपने प्राणों की चिरायु शक्ति
प्रणय शिशु के चिरंजीवी होने के लिए प्राण-प्रतिष्ठा की है साँसों की देह की माटी में रोपे हैं जौ प्रणय के प्रथम-बीज ।

।। हथेली ।।

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'अकेलापन' पतझर की तरह उड़ता फड़फड़ाता है
प्रिय की तस्वीर से उतरता है  स्मृतियों का स्पर्श देह मुलायम होने लगती है चाहत की तरह
हथेलियों से हथेलियों में छूटती है    भावी रेखाओं की छाया
प्रेम की भाषा प्रेम है सारे भाष्य से परे ।
प्रेम एकात्म अनुभूतियों की अविस्मरणीय दैहिक पहचान है
देहाकाश में इंद्रधनुषी इच्छाओं के बीच बर्फीले पहाड़ बादल की तरह उड़ने लगते हैं
तुमसे कहने की सारी बातें वियोग में घुल कर आँसू बन जाती हैं और पोंछती हैं    अकेलेपन के निशान ।

।। क्रिया-कर्म ।।

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आदमी आहिस्ता-आहिस्ता खत्म करता है एक स्त्री के भीतर का स्त्रीत्व
चूमता है देह सोख लेता है देह का देहपन कि धूमिल होने लगता है स्त्री का स्त्रीत्व
धीरे-धीरे काटता-छाँटता है दिमाग तराशता है दिल उसकी उम्र ढलने से पहले ही कुतरता है आत्मा कि आत्महीन होकर गिर जाती है अपनी ही देह-भीतर                        लाश की तरह
जैसे उसकी देह ही ताबूत हो उसका ।

।। विदेह-देह की गोदावरी ।।

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तुम मेरे भीतर अन्वेषित करते हो अन्तः सलिला और अमृत जल
मैं तुम्हारे भीतर से अनाम समुद्र जिसके आवेग में विलुप्त हो जाती है देह
तुम मेरे अन्तस् की अबोधित गुहा-गेह को करते हो सम्बोधित लिखा होता है स्पर्श में तुम्हारा नाम आत्मा के नम-ऊष्म तोष के लिए
तुम मेरे निष्प्राण पहाड़ों में उँगलियों की आँखों से खनते हो और रचते हो साँसों के अधरों से गन्धमयी सरस पुष्प-घाटी आत्मा जान जाती है जीवन की प्रकृति का अलौकिक सौंदर्य-सुख ।

।। आकांक्षा का अल्पना-लोक ।।

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एकनिष्ठ पूजा के लिए रचा है मूर्ति को कल्पना का एक अद्भुत अल्पना-लोक जहाँ सिर्फ अनुभूति सुख है आत्मीय बूँदों का
तुम्हारी साँसें तैरने लगती हैं मेरी मन साँसों में मछलियों की तरह और धोती हैं अपना रुपहला वर्ण और रंगीन चंचलता
मेघों के बीच से आती हुई धूप धरती पर रचती है  मेघ का छाया वृक्ष जैसे तुम्हारी आवाज मेरे भीतर तुम्हें ।