रविवार, 29 मार्च 2015

।। मौन ।।

























प्रेम में
अपनी आँखों में
देखती है वह प्रिय के नयन
और अनुभव करती है सुख
- गिरा अनयन, नयन बिनु बानी -

अपने ही अधरों में
अनुभव करती है प्रिय-प्रणय-स्वाद

अपने शब्दों की
व्यंजना में महसूस करती है
प्रिय-प्रणय-अभिव्यंजना …

अपनी स्पर्शाकांक्षा में
सुनती है प्रिय के शब्द
और चुप जाती है
सम्प्रेषण के लिए - प्रिय को
प्रिय की तरह
मौन ही ।

गुरुवार, 26 मार्च 2015

।। तस्वीर ।।

























तुम्हारी तस्वीर ने
दीवार के एक हिस्से पर टँगकर
दीवार को देह बना दिया होगा
प्राणों की तरह लगकर

तुम्हारी तस्वीर ने
कील पर टँगकर
खूँटी को सलीब टाँगने की
सजा से मुक्त कर दिया होगा
वत्सल हथेली बनकर

तुम्हारी तस्वीर ने
दीवार के एक हिस्से को
आला बना दिया होगा अपनी उपस्थिति से
अबुझ हिय दीया-सा उजलकर

तुम्हारी तस्वीर से
दीवार के उस हिस्से पर
दो हथेलियाँ उग आई होंगी
तस्वीर को थामने
स्नेहातुर हथेलियों की तरह

तुम्हारी तस्वीर ने
दीवार के उस हिस्से को
हाशिये से मुक्त कर
विस्तृत चित्रफलक बनाया होगा
प्रकृति सहेजी वासन्ती दृष्टि से सँवरकर

तुम्हारी तस्वीर से
दीवार के उस हिस्से को
बादल-सा उमड़कर
आकाश बना दिया होगा
अपनी निश्छल निर्मलता सौंपकर

तुम्हारी तस्वीर ने
दीवार के एक हिस्से पर
वक्ष भर जगह घेरकर
जड़-जगह को चेतन बना दिया होगा
अपनी छवि की परछाईं से सजीव कर

तुम्हारी तस्वीर ने
दीवार पर टँगकर
एक जोड़ी दृष्टि जुटा ली होगी
राह अगोरती प्रिया की विकलता की तरह
जो दीवारों के बाहर का आकाश
तुम्हारी तरल आँखों की तरह लीपती है
अल्पना के स्वप्निल मेघों के लिए ।

बुधवार, 25 मार्च 2015

।। छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें ।।


























तुम्हें देखने के बाद
छूट जाता है तुम्हारा देखना, मुझमें
तुम्हें जी भर-भर के देखने के बाद
आँखों को रह जाती है
शिकायत … फिर भी … हर बार

तुम्हें सुनने के बाद भी
शेष रह जाता है सुनना
कुछ शब्द तुम्हारे पास छूट जाते हैं
विकल
मेरी गोद में आने के लिए
बहुत कुछ सुनने पर भी
सब कुछ सुनना बचा रहता है
अन्तस् की मौन प्रशान्ति में

तुम्हारे लिखने के बाद
कुछ भोले-सहमे शब्द
चिपके रह जाते हैं तुम्हारी उँगलियों में
छूटे हुए स्पर्श-बोध की तरह
जैसे धूप का ताप
मुट्ठियों में ठिठका रह जाता है
जैसे पसीजी हथेलियों में
शेष रह जाती है स्मृति की आर्द्रता

तुम्हारे साथ
चलने पर भी
परछाईं भर साथ बच जाता है
हमेशा
हर बार बोलने पर भी
कुछ शब्द बाहर आने से रह जाते हैं
कुछ शब्द सकुच कर
छिप जाते हैं तुम्हारे ही भीतर
मन घर बनने से रह जाता है
कुछ साँसें बच जाती हैं
कि प्राण-प्रतिष्ठा छूट जाती है

पूर्णिमा के दिन भी
चाँद के भीतर छिपी रह जाती है ज्योत्स्ना
सूर्य अपनी गोद में
हर दिन छुपा रखता है अपनी कुछ रश्मियाँ
हर चित्र में
छूट जाती हैं कुछ रेखाएँ कुछ रंग
हर बार रचने पर भी
छूट जाता है कुछ रचना

तट छूट जाता है जल में
जल में छूट जाता है तट-बंध
ऐसे ही हर बार
प्रणय में छूट जाता है प्रणय
प्रतीक्षा की कसक में
छूट जाती है प्रतीक्षा की कसक
अगली प्रतीक्षा तक के लिए ।

मंगलवार, 24 मार्च 2015

।। आँखें ।।


















आँखें
बोती हैं पाखी की तरह
देह-भीतर
प्रेम बीज
पाषाण-देह की दरार उर में
उग आता है देव वृक्ष

आँखें
देह भूमि में
खड़ा करती हैं
प्रणय का कल्पवृक्ष

आँखें
देहाकाश में
सँजोती हैं
शीतल चन्द्रकिरणें
ऊष्ण सूर्यरश्मियाँ

देह के
पंचतत्वों में
अलग-अलग ढंग से
घटित होता है प्रेम
अलग-अलग रूपों में
फलित होता है प्रेम ।

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

।। एक लड़की के भीतर ।।


















एक लड़की के भीतर जब
उगता और उमगता है प्रेम
नवांकुर बीज की तरह
वह
कविता की देह छूती है
अधरों पर गीतों के बोल रखती है

एक लड़की के अन्तस् को
हरी, मुलायम, शोख, दूब की तरह
स्पर्श करता है प्रेम
वह पालती है सफेद खरगोश
गुलाबी आँखों वाला
और भरती है विद्युतीय चपल छलाँगें
बचाए रखना चाहती है वह
प्रेम से चंचल हुए
अपने पाँव के अचंचल निशान
मन-वसुधा पर
उकेरे प्रणय-कीर्ति के लोक-कथा चित्र

एक लड़की के भीतर जब
अँगड़ाई लेता है प्रेम
वह नहीं तैरना चाहती
किसी नव परिचित देह के भीतर
सूर्योदय के साथ
उतर जाना चाहती है नदी में
सुनहरी किरणें समेटने
चंद्रोदय के साथ डूब जाना चाहती है
रुपहली नदी में
धवल, अमर स्वप्न-यथार्थ के लिए

एक लड़की के भीतर जब
उठती है प्रणय की मादक गंध
वह उसे 'महुए' की तरह
चूने देती है अपने उर-आँगन में
दुधियाने देती है अपनी आँखों में

एक लड़की के भीतर जब
देह के खलिहान में
फसल की तरह तैयार होता है प्रेम
वह छींट देती है उसे
दोनों मुट्ठी में भर-भर कर जमीन पर
चिड़ियों … गिलहरियों और ऐसे ही बच्चों के बीच

एक लड़की के भीतर जब
अकुलाता है प्रेम
नदी की मछलियों को खिलाती है
अपनी ललाई हथेली से आटे की गोलियाँ
साथ में लाई-दाना
मचलती मछलियों के साथ
खेलती है अपने पाँवों के बीच
अपनी आँखों से पकड़ती है
उनकी चपल … चमक कि जैसे प्रथम प्रेम की दमक

एक लड़की के भीतर जब
आँखें खोलता है प्रेम
पारदर्शी झील से पड़े आईने में
झाँकती है और देखती है
खुद के चेहरे पर पड़ी आड़ी-तिरछी रेखाओं का सच
बेसुध मन
संतप्त सिहरता तन

एक लड़की के भीतर जब
ऋतुचक्र को लाँघता
आता है वसन्त
गमले में लगाती है कैक्टस
और सिरहाने के तकिया गिलाफ पर
काढ़ती है अनाम फूल

एक लड़की के भीतर जब
होती है प्रेम के लिए अमिट गुहार
प्रणय-तट के वृक्ष-वक्ष से पीठ टिका
एकटक ताकती है बहती नदी
कि जैसे प्रणय-धार बीच
आँखों से नहाती-जीती
भीगती रहती है भीतर-ही-भीतर
वृक्ष के वक्ष से सटी
एक आत्मीय वक्ष की प्रतीक्षा में
एक लड़की की धड़कनें
अनपढ़ी इबारत लिखने के लिए
कुछ कोरा भरने-पूरने के लिए ।

बुधवार, 18 मार्च 2015

।। मेघ-मल्हार ।।



















प्रिय
बादल की तरह
भरता है अपने वक्ष में
मेघ की तरह झरता-बरसता है

प्रेम
प्रिय के भीतर ही
फलता है
फूलता है

इसके पूर्व तक
रिक्त और रिक्त
कभी रेगिस्तान की तरह
कभी आकाश की तरह ।

मंगलवार, 17 मार्च 2015

।। पंचतत्वों से … पंचतत्वों में ।।


















अपनी आत्मा की माटी से
गढ़ी है प्रणय की सुकोमल देह

अपनी रक्ताग्नि के ताप में
ढाली है प्रणय की अक्षय काया

अपनी साँसों की वसन्ती बयार से
फूँके हैं प्राण प्रणय की अलौकिक देह में

अपने अश्रुजल के अमृत से
किया है देह का विदेह अभिषेक

मेरे ही पंचतत्वों से
पंचतत्वों में अवतरित है मेरा प्रणय

तुम्हारे ही पंचतत्वों से बना है तुम्हारा प्रणय
पंचतत्वों से बना पंचामृत है प्रणय
नयनाधर के लिए ।

सोमवार, 16 मार्च 2015

दो छोटी कविताएँ

























।। प्रेम का ईश्वर ।।

ओंठ
देह-भीतर
गढ़ते हैं एक देह

जिसे
हम-सब
प्रेम का ईश्वर
कहते हैं ।

।। एकल अनुभूति ।।

प्रणय
परकाया प्रवेश-साधन
देहान्तरण में रूपान्तरण की
अन्तरंग साधना

प्रणयानुभूति में
द्धिजत्व की एकल अनुभूति ।