सोमवार, 30 मई 2016

।। नदी की स्मृतियों में ।।

नदी के पास
अपना दर्पण है
जिसमें नदी देखती है  ख़ुद को
आकाश के साथ

नदी के पास
अपनी भाषा है
प्रवाह ही उसका उच्चार

नदी
बहती और बोलती है
छूती और पकड़ती है
उझकती और छुप जाती है
कभी शिलाओं बीच
कभी अंतःसलिला बीच

नदी के पास
यादें हैं
ऋतुओं के गंधमयी नृत्य की

नदी के पास
स्मृतियाँ हैं
सूर्य के तपे हुए स्वर्णिम ताप की
हवाओं के किस्से हैं
परी लोक की कथाओं के

नदी के पास
तड़पती चपलता है
जिसे मछलियाँ जानती हैं

नदी के पास
सितारों के आँसू हैं
रात का गीला दुःख है
बच्चों की हँसी की सुगंध है
नाव-सी आकांक्षाएँ हैं
बच्चों सा उत्साह है

अकेले में
नदी तट पर बैठती है वह
उसकी पारदर्शी स्मृतियों में
उतरने-उतराने के लिए

(अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित नए कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

रविवार, 29 मई 2016

नया कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन'

'गर्भ की उतरन' शीर्षक से पुष्पिता अवस्थी की नई कविताओं का संग्रह 
आया है, जिसे अंतिका प्रकाशन ने प्रकाशित किया है । इसमें 
उनकी 72 कविताएँ संकलित हैं, जिन्हें विषयों की विविधता के संदर्भ में 
अलग-अलग खंड के रूप में प्रस्तुत किया गया है । 'मौन', 'पृथ्वी माँ', 
'जननी : सृजन', 'शिशु : बचपन', 'अस्मिता के रूप-अनुरूप', 'संघर्ष', 'अंततः' व 
'प्रेम' - वह 8 शीर्षक हैं, जिनके तहत इस संकलन की कविताओं को 
वर्गीकृत किया गया है । संग्रह की खास बात यह है कि इसमें वर्गीकृत 8 शीर्षकों के साथ 
रेखांकन भी दिए गए हैं, जिन्हें प्रख्यात चित्रकार अशोक भौमिक 
ने रचा है । संकलन के आवरण पर पुर्तगाल के 
दक्षिणी समुद्र तट अलगारसा का छायाचित्र है, 
जो कवयित्री की खुद की फोटोग्राफी रचना है । 
यह संकलन 'पृथ्वी, प्रकृति तथा प्रेम और भाषाओं के वास्तविक पहरुओं को 
समर्पित' है, जिनके बारे में कवयित्री को विश्वास है कि 
'जो यह बख़ूबी समझते हैं कि हम सब इन्हीं शक्तियों की गर्भ की उतरन हैं ।' 
संकलन की भूमिका डॉक्टर रेवती रमण ने लिखी है, तथा 
फ्लैप पर मदन कश्यप की पुष्पिता अवस्थी की कविताओं की पहचान को 
रेखांकित करती हुई सारगर्भित टिप्पणी है । 


।। आत्मनिवेदन ।।


















मेरे भीतर
छूट गया है
तुम्हारी आँखों का लिखा
चाहतों का पत्र
फड़फड़ाता बेचैन
तुम्हारी आँखों की तरह

कहीं बहुत भीतर
तुम्हारी पलकों की बरौनियाँ हैं
जो लिखती हैं
स्मृतियों के गहरे सुख
जो रचती हैं
अन-जी आकांक्षाओं की प्यास

मेरे भीतर
छूट गया है
तुम्हारे प्रणयालिंगन की
स्मरणीय छुअन
उस परिधि भीतर
समाकर
घुल जाती हूँ नेह में
एक नेह सरिता होकर

तुम्हारी परछाईं में
मिल जाती है मेरी परछाईं
ऐकालोक

शुक्रवार, 20 मई 2016

।। आदमीनामा ।।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
मेरी आँखों को जब 
चूमते हैं तुम्हारे शब्दों के अधर 
दुनिया बहुत मुलायम 
महसूस होने लगती है 

काले समय के विरुद्ध 
लड़ने के लिए 
तुम्हारे शब्दों से चुराती हूँ 
'गोल्ड मोहर' फूल का सुलगता लाल रंग 
स्याह समय के खिलाफ 
धुएँ की लकीरों को 
हवा के बीच से खतियाने के लिए 

दर्द के विरुद्ध 
रचा है प्रेम 
आँसू की जगह रखी है ओस बूँद 

हिंसा के विरुद्ध 
थामी है तुम्हारी हथेली 
तुम्हारी आँखों से पिया है 
तुम्हारे विश्वास का पय 

तुम्हारी साँसों के ताने से 
मेरे मन के बाने ने बुना है प्रेम 
गुम चेहरों वाली 
कसमसाती और ऊबी हुई भीड़ के बीच 
मेरी आँखें घूमती हैं तुम्हारी आँखें पहनकर 

मेरे ओंठ 
तुम्हारे ओंठों की ताकत से बोलते हैं शब्द 
मरी हुई खामोशी के विरोध में कुछ जेहादी शब्द 
मसीहाई आदमी के बगलगीर खड़े होकर 
बनाते हैं एक पक्ष 

रविवार, 8 मई 2016

।। अग्निगर्भी शक्ति ।।


















धूप में
बढ़ाती हूँ अपनी
आत्मा की अग्निगर्भी दीप्ति

तुम तक पहुँचती हूँ तुम्हारे लिए
अक्षय प्रणय-प्रकाश
जो मन की खिड़की से
पहुँचता होगा तुम्हारे निकट से निकटतर
कि नैकट्य की
नूतन परिभाषाएँ रचती होंगी
तुम्हारी अतृप्त आत्मा

वृक्ष को सौंपती हूँ
वक्ष के अंतस की परछाईं
अपनी धड़कती आकांक्षाएँ
मूँदे हुए स्वप्न
झुलसी हुई मन-देह
वृक्ष जिसे चुपचाप कहता है
अपने आवेग से
जो तुम तक
मेघ-दूत बन
पहुँचता है
गहरी आधी रात गए

गुरुवार, 5 मई 2016

।। काग़ज़ पर ही सही ।।


















तुम्हारी तस्वीर से
करती हूँ
इतनी बातें
कि वह बोलने लगती है

तुम्हारी नाक पर
धरती हूँ
अपनी नासिका
महसूस होने लगते हो तुम

तुम्हारी आँखों को
देखती हूँ एकटक
तस्वीर में ही
भीग उठती हैं   तुम्हारी आँखें
मेरे आँसुओं से

तुम्हारे
मुस्कुराते सकुचे होंठों पर
रखती हूँ अपने अधर
इस क़दर
कि वे भी मुस्कुरा पड़ते हैं

काग़ज़ पर ही सही
दूरियों को नापने की
साकार कोशिश

रविवार, 1 मई 2016

।। एकात्म ।।


















पत्थर को छूकर जाना
पाषाण का मतलब

पर्वत आरोहण कर
पहचाना पहाड़

नदी में उतर कर जाना
जल का प्रवाह

जलपान कर जाना
तृषा-तृप्ति का सुख

समुद्र में होकर जाना
सागर-सुख

चाँदनी को रात भर
अपने भीतर उतारा जैसे  साधना

तुम्हारे प्रणय की सुगंध को छूकर जानी
प्रेम की तासीर

तुममें होकर ही पहचाना
प्रकृति का पुरुष से आत्मीय एकात्म
जो विश्वास माटी से बनता है
मन देह भीतर