शुक्रवार, 3 जून 2016

।। मधुबन के लिए ।।

















बच्चे
अपने खिलौनों में
छोड़ जाते हैं  अपना खेलना
निश्छल शैशव
कि खिलौने
जीवंत और जानदार
लगते हैं  बच्चों की तरह ।

बच्चों के
अर्थहीन बोलों में होता है
जीवन का अर्थ
ध्वनि-शोर में रचते हैं
जीवन का भाष्य
जिसे रचती है  आत्मा ।

बच्चों की
गतिहीन गति में होती है
सब कुछ छू लेने की आतुरता
उनके तलवों से
धरती पर छूट जाते हैं
उनके आवेग की गति
कि उनके सामने न होने पर भी
ये चलते हुए लिपट जाते हैं
यहाँ वहाँ से

बच्चों के पास
होती है अपनी एक विशेष ऋतु
जिसमें वह खिलते हैं  खेलते हैं
और फलते हैं
हम सब के मधुबन के लिए । 

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

गुरुवार, 2 जून 2016

मदन कश्यप के अनुसार, पुष्पिता अवस्थी एक कवि के रूप में 'बखान से ज्यादा दृश्यों को स्मृति में बसाने की चिंता करती हैं'

पुष्पिता अवस्थी के हाल ही में अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित 'गर्भ की उतरन' शीर्षक कविता-संग्रह की एक उल्लेखनीय खासियत यह भी है कि इस संग्रह का फ्लैप हिंदी के वरिष्ठ कवि एवं समालोचक मदन कश्यप ने लिखा है । उन्होंने जो लिखा है, वह पुष्पिता अवस्थी के रचना-संसार की मूल पहचान से तो परिचित कराता ही है - साथ ही पुष्पिता अवस्थी की कविताओं को पढ़ने/गुनने की एक नई दृष्टि भी देता है । फ्लैप पर मदन कश्यप ने लिखा है :
'सुपरिचित कवयित्री पुष्पिता अवस्थी के इस नए संग्रह में हिंदी कविता को एक अलग पहचान देने का उपक्रम साफ दिखाई देता है । अपनी पहचान तो उन्होंने बनारस में रहते ही बना ली थी । फिर जब सूरीनाम से उनका रिश्ता जुड़ा तो वहाँ के प्रवासी जीवन की जद्दोजहद के बीच उन्होंने भारतीय स्त्री की करुणा के उस पक्ष को भी देखा, जिसे शायद भारत में रहते हुए नहीं देखा जा सकता था । अपनी इस विशेषता के कारण ही, उनकी कविताएँ अन्य प्रवासी कवियों की तरह अपना अलग द्वीप नहीं रचती, बल्कि समय की धारा में शामिल होकर सार्थक हस्तक्षेप करती नज़र आती हैं ।
समझ और संवेदना के विस्तार को उनके पिछले संकलनों की कविताओं में भी लक्षित किया जा सकता है । इस संग्रह की रचनाएँ उससे आगे बढ़ कर कविता की भूमि का विस्तार करती प्रतीत होती हैं । ज्ञान, संवेदना और अनुभव का एक ऐसा संतुलन है, जिसे भाषा में साधना आसान नहीं होता । इससे कवि-कर्म के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता का पता चलता है । प्रेम को अध्यात्म की ऊँचाई तक ले जाने की उनकी पुरानी कुशलता को भी यहाँ एक नए रूप में देखा जा सकता है । वे न तो अतीत मोह में फँसती हैं, न ही नई-नई सूचनाओं का वृत्तांत रचती हैं । वे हर सूचना को अपने जीवन-अनुभव में शामिल करती हैं, इसीलिए उनकी कविता हमारी (पाठक की) अनुभूति में सहज प्रवाहित होती हैं ।
स्त्री के मातृत्व से ले कर पृथ्वी के मातृत्व तक फैली ये कविताएँ मनुष्य और पर्यावरण की समान रूप से चिंता करती हैं और भारत, सूरीनाम और नीदरलैंड के जीवन को सामने रखकर हमारे समय के संकट को समझने की कोशिश करती हैं । इस क्रम में, हिंदी कविता के फैले संसार में कुछ ऐसा नया जुड़ जाता है, जो हमें चकित करता है और भविष्य के प्रति आश्वस्त भी ।
पुष्पिता अवस्थी अपनी कविता को कला के कर्मकांड से बचाते हुए जिस तरह स्मृति के संरक्षण और विखंडन, सामाजिक अतीत और वैचारिक अतीत और सामूहिक अस्तित्व और निजी अस्तित्व जैसे विभाजकों का अतिक्रमण करती हैं, उसे समझने के लिए विश्लेषण की नई प्रविधि की आवश्यकता है । उनकी कविता से गुज़रते हुए इस ख़ास प्रक्रिया पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि वे बखान से ज्यादा दृश्यों को स्मृति में बसाने की चिंता करती हैं । बस यही एक बात ...'