रविवार, 31 जुलाई 2016

।। अंतरंग-आवाज ।।

नदी को
नदी की तरह सुनो
सुनाई देगी   नदी
अपनी अंतरंग आवाज़ की तरह

चाँद को
चाँद की तरह देखो
दिखाई देगी चाँदनी
अपनी आँख की तरह

धरती को
धरती की तरह अनुभव करो
महसूस होगी   पृथ्वी
अपनी तृप्ति की तरह

प्रकृति को
प्रकृति की तरह स्पर्श करो
तुममें अवतरित होगी   वह
आह्लाद की तरह ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

।। माँ का काजल ।।























गर्भ की आँख में
लगाया था   काजल
जिसे, तुम्हारे ही लोगों ने
पुँछवा दिया

सघन संबंधों को कभी
जिया था   गहरे अर्थ से भरकर
कि जैसे इससे पूर्व
         प्रेम शब्द
अर्थ के बिना था

स्पंदन में
फूटने लगी थी
दुग्ध कलिकाएँ
हृदय की कोख में
धड़कने लगी थी   ममता
साँसों में
महसूस होने लगी थी
बच्ची की दुधीली साँस
और वात्सल्य की सुगंध
नवजात हथेली की स्मृति भर से
मुलायम और गदोली होने लगती थी
'माँ' की हथेली

अपनी पुलक में
महसूस करने लगी थी
माँ की किलक
सपने में
शामिल होने लगा था
बच्ची का भविष्य
धीरे-धीरे देह टोहने लगी थी
स्त्री होने का जादू
पिता का प्रणय धड़कने लगा था
माँ-देह की गुप्त गोदावरी में

केशों में
महसूस करने लगी थी
बच्ची की भिंची मुट्ठियाँ
और उनका खिंचाव

कंधों पर
शैशव का सोंधापन
स्तनों में
उसकी भूख का भारीपन
अपनी छाती में
दुधारू गाय सरीखा भार
'माँ' की काल्पनिक स्मृतियों की लार से
भींजने लगी थी   उसकी अपनी ही देह

नानी की लोरी
तरंग बन जाग उठी थी
भूले हुए कंठ में

हथेलियाँ सीखने लगी थीं
थपकियों की कत्थक
अपने सपनों की छाती से
बच्ची को लगाकर सुलाने की जिजीविषा
जाग उठी थी   उसके भीतर

बच्ची के आगमन में
देखने लगी थी    अपना सूर्योदय
दैवी शक्ति का आविर्भाव
होने लगा था   उसके भीतर

माँ के भीतर
आकार लेने लगा था
उसकी देह-माटी का पराग
बच्ची के खेलने के लिए   सपनों से
लीपने लगी थी    मन की चौखट
कि अचानक
व्यवस्था की मार ने
उसके गर्भ से झाड़ दिया
देह का केशर

पाँखुरी
खुलने से पहले ही
उसकी हत्या करवा दी गई थी

'माँ' बनने की अभिलाषा में
जी रही स्त्री
एक झटके में हत्यारी हो गई
अपनी ही कन्या-भ्रूण की
जिसमें दोष नहीं था
न माँ का, न बेटी का
स्त्री-देह का
वसंत-गृह से मृत्यु-गृह में
बदल जाने का दुःख
गौतम बुद्ध के दुःख-दर्शन से परे है
नवांकुरित देह झर गिरना
कि जैसे   कोट का बटन
लगाने से पहले
छूट गया हो हाथ से

और गर्भ में लिखी
नई इबारत को
कर दिया जाए   अचानक
देह से बहिष्कृत
कि जैसे   वह हो कोई कलंक

देह ब्रह्मांड से
नक्षत्र टूटकर
गिर गया हो ब्रह्मांड से बाहर
कि जैसे   कलाई से
धड़कती घड़ी
उतार ली हो   समय ने

जबकि हर पल
गर्भपात से पहले ही
डरती रहती थी कि
कोमल और मुलायम
ईश्वर घर की तरह पवित्र
पाँखुरी से मुलायम
पराग से सुगंधित
देह के गर्भ-गृह से बाहर आने पर
ऐसी भीषण दुनिया में कैसे रहेगी
उसकी बेटी
जैसी दुनिया में
सूरज के होने पर भी
काँप कर रखती है वह अपने पाँव
हर दिन
घर से बाहर

ठीक से चलती है उसकी साँस
घर पहुँचने पर ही

रात में
दिन के हादसे से
कई बार
भर आती थीं    आँखें

सपनों के पाँव में मोजे का
पहला फंदा डालते ही
देह की सलाई से
व्यवस्था ने
ढुलका दिया
नव देह का सुकोमल फंदा
हा ...

[दक्षिण एशिया के इंडोनेशिया, थाईलैंड जैसे कई देशों और विश्व की अनेक आदिवासी तथा अमर इंडियन प्रजातियों में थाली बजाकर .... उत्सव मनाकर कन्या-जन्म का स्वागत करते हैं - और भारत जैसे मानवता प्रवर्तक देश में कन्या-भ्रूण हत्या हताश करती है ।]

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

।। सजल ।।

उसने
अपनी माँ का
बचपन नहीं देखा
पर
बचपन से देखा है उसने
अपनी माँ को

जब से
समझने लगी है
अपने भीतर का सब कुछ
और
बाहर का थोड़ा-थोड़ा

लगता है
उसकी माँ की तरह की औरत
आकार लेने लगी है   उसके भीतर
वैसे ही
गीली रहती हैं   आँखें
वैसे ही
छुपाकर रोती है    वह ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

रविवार, 24 जुलाई 2016

।। कैनवास ।।























बच्चे
अपने सपनों की दीवार पर
पाँव के तलवे बनाते हैं
लावा के रंग में
और उसी में उगाते हैं   सूरज

आकाश उसका
नीला नहीं पीला है
सूरज उसके लिए
पीला नहीं लाल है

पेड़ का रंग उसने
हरा ही चुना है
उसी में उसका मन भरा है

बच्चे ने
सपनों के रंग बदल दिए हैं
अपने काल के कैनवास के लिए ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शनिवार, 23 जुलाई 2016

।। वसुधा : स्त्री ।।

पृथ्वी
अकेली औरत की तरह
सह रही है
जीने का दुःख

भीतर से खंखोर रहे हैं लोग
ऊपर से रौंद रहे हैं लोग ।
कुछ लोग
अपने उन्मादक आनंद के लिए
सजा और सँजो रहे हैं   पृथ्वी
जैसा   अकेली स्त्री के साथ
करते हैं सलूक

सब देख रहे हैं   तहस-नहस
पृथ्वी भी देख रही है
क्रमशः
अपना विध्वंस
फिर भी
अनवरत
अपनी ही शक्ति से
कभी अग्नि
कभी वर्षा
कभी तूफ़ान
कभी बाढ़
कभी अकाल से
रचाती रहती है   संतुलन
विध्वंसकारी शक्तियों के विरुद्ध

बचाए रखती है   अपनी हरियाली
अपनी वर्षा
अपनी शीतलता
अपनी उर्वरता
अपनी पवित्रता
अपनी अस्मिता
एक अकेली पृथ्वी
एक अकेली स्त्री की तरह ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

।। अनुभव ।।























परिचित ही सही
वह फिर
मित्र हो या रिश्तेदार
स्त्री हो या पुरुष
घर में रह कर
जब
चले जाते हैं
तब
पराया हो जाता है  घर

उस समय भी
और
बाद तलक भी 

जब तलक
नहीं हो जाती है सफ़ाई   घर की
अपने हाथों
कोने अँतरे तक की

मन में
ऐसे ही
छोड़ जाते हैं   विषाद
हर लेते हैं   एकांत का अपनापन
सौंप जाते हैं   अपनी इच्छाओं का अम्बार
और मन का कुचैलापन

और तब
महसूस होता है
वेश्याओं की देह-घर से
गुज़र जाते होंगे जब लोग
कैसे लेती होगी साँस  वह 
अपनी ही देह में
रहने के लिए

कैसे
ज़िंदा रहती होगी   वह
उस देह में
जो रोज़ ही होती है   परायी
दिन में कई बार
वासना के कीड़े बन चुके
आदमियों के कारण

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

।। रचने के मोह में ।।

पृथ्वी के लोगों ने ही
रचा है
समय का गुंजलक
पृथ्वी पर
और उसी में
फँसे हैं   वे

इतिहास रचने के मोह में
कर रहे हैं युद्ध
जता रहे हैं अपनी अपनी शक्ति
आतंक के शिकंजे से

धर्म में उलझाए हैं  राजनीति
राजनीति में घुसाए हैं  धर्म

समय के साँचे-भीतर
बनता है सभी का चेहरा
समयानुसार
कुछ समय के लिए

अतीत को
शनैः शनैः छाँटता है  समय
शब्दों के गर्भ में
बचती है  सिर्फ संस्कृति

बच्चों के सुख में
जन्म लेते हैं  उनके अपने सपने
बसे-बसाए हैं  जिसमें
संपूर्ण विश्व-स्वप्न

बच्चे
अपने खिलौनों की तरह ही
जीना चाहते हैं
भरी-पूरी रंगीन और गतिशील  जादुई दुनिया

फुटबॉल खेलने के आनंद-सा
जीना चाहते हैं  दुनिया का आनंद

वह ख़ुश रहते हैं
और ख़ुश रहना चाहते हैं

दुनिया से होती है शिकायत
जब लोग नाराज करते हैं  उन्हें
और खींच लाना चाहते हैं
उनकी दुनिया से उन्हें   बग़ैर इच्छा के
जिस दुनिया से अभी हैं वे
बेख़बर ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

सोमवार, 18 जुलाई 2016

।। बच्चों के खेल ।।















 बच्चे
देखे गए सपनों से
निकालते हैं   नए सपने
जैसे
उसी कपड़े से निकालते हैं   धागा
फटे के रफू के लिए ।

बच्चे
मोर पंख में
देखते हैं   मोर
और पिता में परमपिता ।

पिता ही परमेश्वर
और माँ सर्वस्व ।

काग़ज़ की
हवाई जहाज की फूँक उड़ान में
उड़ते देखते हैं   अपने स्वप्नों का जहाज ।
रेत के घरौंदे में
देखते हैं   अपना पूरा घर ।

वे
खेल खेल में
खेलते हैं  जीवन
और
हम सब
जीवन में खेलते हैं   खेल ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शनिवार, 16 जुलाई 2016

।। बच्चों के भीतर खिलौने ।।

बच्चों के
सो जाने पर भी
उनके खिलौने
खेलते हैं
उनकी नींद के भीतर भी

सपनों में भी
सोचते हैं  वे
कौन सी कमी है
हमारी खिलौनों की दुनिया में
कैसे बढ़ा सकेंगे   उनका संसार
कैसे करनी होगी गुजारिश
अपने चाहने वालों से

बच्चों के
सो जाने पर भी
उनके बेजान खिलौने
जागते रहते हैं   सपनों में
उनके आनंद और खुशी के लिए
जैसे कि
खिलौने भी जानते हैं   बख़ूबी
दिन भर में पड़ने वाली उनकी डाँट-फटकार को
रोते हुए बच्चों के साथ
बिसूरते हैं उनके निर्जीव खिलौने भी
बच्चे पोंछते हैं   आँसू
अपने टेडी वीयर और गुड़िया-गुड्डा
कभी कभी   स्पाइडर और रोबोट मैन तक के ।

बच्चों के सो जाने पर
ढेर के रूप में समेटकर
सुला दिए जाते हैं खिलौने   अक्सर
टोकरियों में
तर-ऊपर-गर कर

जबकि
बच्चों के जागते रहने पर
उनके खिलौने
कभी नहीं होते
इस कदर दर-ब-दर

गुड़िया होती है सदा सजी-धजी डॉक्टरनी
और गुड्डा अंतरिक्ष यान के भीतर
चाँद और अन्य ग्रहों की खोज में
कारें, बसें, रेलगाड़ियाँ उल्टी-पल्टी नहीं होती हैं कभी
बल्कि उनकी बनाई सड़क पर होती हैं सदा
लाल सिग्नल पर रुकी हुई गाड़ियाँ

बच्चे
अपने बचपन में
खेल खेल में भी
नहीं करते हैं  बेरुखी और बनावटी का सलूक
अपने बेजान खिलौनों के साथ

जबकि
हम बड़े   अक्सर
अपनी वास्तविक दुनिया में भी
करते हैं  रोज़ खिलवाड़
जाने-अनजाने
कि सदियों की बनाई दुनिया
हो गई है अब इतनी सहज
कि आज उजड़ जाएगी तो क्या
कल फिर उग आएगी
दूब-घास की तरह
जबकि
दूब भी
सहज नहीं उगा करती
सब जगह
कम-से-कम
उसे भी अपने उगने के लिए चाहिए
अपनी जैसी माटी

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

।। नदीन का चाँद ।।

सूर्यास्ती सुनहरी साँझ की गोद में
खेलती ढाई साल की
रुपहले बालों और नीली आँखों वाली
गुलाबी बच्ची
किलककर
अपने पिता की छाती से हिलगकर
उनकी आँखों में आँखें डाल पूछती है
चाँद कहाँ है ? (वारीस द मान)
जैसे  ढूँढ आई हो
अपने पूरे घर-भीतर
घर से बाहर की झाड़ी-बीच
झाँक आई हो कई बार
घर के स्वीमिंग पूल में भी
डूबे चाँद को निकालने की
की होगी जैसे पुरजोर कोशिश ।

ढाई बरस की डच-भाषी बच्ची की
यादों की रगो में बसा है चाँद
जैसे  पूर्वजन्म में चंद्रलोक की परी थी कोई
चाँद उसका घर हो आज भी
सारे रिश्तों के बावजूद
चाँद से रिश्ता है अटूट
चाँद उसका दोस्त
उसे खिलाता है  अपने आकाश की गोद में
और स्वयं खिलखिलाता है  उसको अपनी आँखों में समेट
चाँदनी की तरह

दुनिया भर के बच्चों की आँखें
लगी हैं  टीवी या कंप्यूटर स्क्रीन के
छलावी खेलों की चकाचौंधी दौड़ में
अपनी स्मृतियों के सिंहासन में
बैठाया है  चाँद को अपने मनकुमार की तरह ।
याद आती है
अपने बचपन की लोरी
नानी अपनी थपकियों से गाकर
सुलाती थी
कि उनके कंठ में
चाँद सो जाता था
पर थपकियों की
गूँज में होती थी
चाँद के लिए भी लोरी
'माँ' के चंद्र-बिंदु के आकार में
नॉर्थ-सी के तट से नहीं दिखता चाँद
और न ही हँसिया के आकार का
संस्कृत के भाषाविद् तब कैसे देते नाम
चंद्राकार बिंदु का
अगर होते निवासी नॉर्थ-सी के ऊपरी कोने से किसी तट पर

याद आती है
'चाँद का मुँह टेढ़ा है'
मुक्तिबोध की कविता
यह सोचकर कि
जब जानेंगी नदीन होपा
चाँद के टेढ़े मुँह का मर्म
उसकी नीली आँखों की
ख़ुशनुमा यादों की झील में
कैसे झिलमिलाएगा 'चाँद'
आतंक और बम की आग को
जब जानेगी आँखें
तो कैसे याद करेंगी 'चाँद' को ।

चाँद को खोजती-पुकारती बच्ची के
शब्दों के आकाश में
मैं देखती हूँ चाँद
उसकी आँखों के आकाश में
उगता है चाँद   आकाश में उमगने से पहले
उसकी मुट्ठी में
खेलता है चाँद
उसकी हँसी में
घुल जाता है चाँद
उसके मन के आनंद के लिए
जिसमें सारे रहस्यमय खिलौने भी
छोटे पड़ जाते हैं
उसके अपने चाँद के सामने

नन्हीं बच्ची का चाँद
हम सबके चाँद से अलग है
अपना चाँद देखकर भी
नहीं देख पाते हैं  हम ख़ुद को
उसके पापा  ... माँ देखते हैं
उसमें अपना चाँद
वह अपने परिवार के आकाश का चाँद है
लेकिन
नदीन का 'चाँद'
आज भी आकाश में है
जिसे वह कभी नहीं भूलती है ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

।। दुनिया का सच ।।

आँखों में बैठी-बैठी
दृष्टि की उँगलियाँ
स्पर्श करती हैं
यूरोप की जादुई दुनिया
जिसमें शामिल है  आदमी
औरत
और उनका प्रेम भी ।

दृष्टि उँगलियाँ
रहती हैं अपनी आँखों की मुट्ठी-भीतर
बहुत चुपचाप
वह कुछ नहीं पकड़ना-समेटना चाहती हैं

मन
संगमरमर की तरह 
पत्थरा गया है   चिकनाकर
जिस पर
कोई मन नहीं ठहर पाता है
खेल खेलने के नाम पर भी ।

मुस्कुराना
ओठों का व्यायाम भर
हो सकता है
हृदय की मुस्कुराहट नहीं

आँसू बहने के बाद नहीं सूखते
सूखे आँसू ही बहते हैं
और गीला दुःख
भीतर ही भीतर चुपचाप
सब कुछ गलाता रहता है ।

चेहरे की मुस्कुराहट
आधुनिक सभ्यता की
प्लास्टिक सर्जरी की तरह
भीतर का कुछ
बाहर नहीं आने देती है

देह भर बची है
मानव के पहचान की
भीतर से ख़ुद को
नहीं पहचान पा रहा है कोई

लोग सिर्फ़
डॉलर और यूरो पहचानते हैं
और उसके आसपास की दुनिया
किसी भी संबंध से पहले
और
किसी भी संबंध के बाद । 

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)