बुधवार, 31 अगस्त 2016

।। सचेतन हूक ।।

प्रेम
देह की भूख से अधिक
चित्त की सचेतन हूक है

संवेदना के गर्भ से
जन्म लेता है    प्रणय
अनुभूतियों के स्पर्श से
पलता है    प्रणय

कि     मन देह
तैरने लगती है
अपने ही जाये प्रणय-सरोवर में
खिलने लगते हैं    तृप्ति-कमल
देह की ज्ञानेन्द्रियों में

राग से पूर्ण हो उठती है
प्राणों की जिजीविषा
एक अलौकिक तृप्ति से भरकर
लौकिक जीवन जीते हुए

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

सोमवार, 29 अगस्त 2016

।। तुम देखना ।।

तुम देखना
सूर्योदय में
किरणों से तुम तक    पहुँचूँगी मैं
अँधेरे की रस्सी की गाँठे खोलते हुए
जिसमें अकेलेपन का कसैला दर्द है
तपाऊँगी तुम्हारी देह     अपने प्रेम से
जैसे    आँखों के निकट हूँ तुम्हारे

तुम देखना
सूर्यास्त की संपूर्णता में
मैं उगूँगी     तुम्हारे भीतर

तुम पढ़ना
रात की स्याह स्लेट पर
मेरी साँसों की हवाओं की भीनी इबारत

तुम देखना
तुमसे ही    तुम पर उतरूँगी
विश्राम-सुख की तरह

तुम बैठना
मेरी अनुपस्थिति में भी
नदी के तट पर
वह किनारा भी
मेरी तरह ही
साथ होगा    तुम्हारे
चुप    तुम्हीं को निहारता हुआ

तुम देखना ...

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

रविवार, 28 अगस्त 2016

।। बच्चों के सपनों के लिए ।।
















बच्चों के बड़े होते ही
खिलौने छोटे हो जाते हैं
माँ खिलौनों को
सहेज सहेज रखती है
बच्चों के विदेश जाने पर
उनके छूटे हुए बचपन को
फिर फिर छूने की अभिलाषा में

बच्चे जान जाते हैं जैसे ही
खिलौनों के खेल में
छुपे जीवन के झूठ को
घर-बाहर हो जाते हैं
जीवन के सच की तलाश में

माँ ढूँढ़ती रहती है
खिलौनों में छिपी उनकी उँगलियों को
अपने बच्चों के मुँह में लगाए गए
खिलौनों को चूमती है
विदेश पढ़ने गए बच्चों के
बिछोह को भूलने के लिए

खिलौनों में बची हुई
बच्चों की स्मृतियों को
छू छू कर वह कम करती है
स्मृतियों की पीड़ा
अपनी यादों में रखती है वह
उनके खिलौने
यह सोचकर कि
आख़िर उसकी ही तरह
खिलौने भी याद करते हैं उसके बच्चों को

पुराने तिपहिया साइकिल को भी
कभी खड़ा कर देती है सूने बग़ीचे में
और याद करती है बच्चों के पाँव
जो अब मिलिट्री की परेड में हैं
या वायुयान की उड़ान में
या अपने देश की सुरक्षा में
या देशवासियों की सेवा में

अब भी बचपन में गायी गई
तुलसी की चौपाई को
ई-मेल में लिख पठाती है
रामचरितमानस ही नहीं
जीवन का सार भी
'पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं' और
'जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू
सो तोहि मिलहिं न कछु संदेहू'

बच्चे
खिलौनों के जानवर को छोड़
निकल पड़ते हैं
आदमी के भीतर छुपे
हिंसक जानवरों के विरुद्ध
जंग जीतने के लिए

बच्चे
खिलौनों के कार और जहाज को छोड़
निकल जाते हैं
हवाई जहाज में
एक नई ज़िंदगी की तलाश में
जो उनके माँ-बाप की दुनिया से बेहतर हो
जिसे कभी
बचपन में पिता की छाती से लग कर
धड़कनों में सुना था
कभी माँ की आँखों के झूले में
सपनों की तरह देखा था

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

।। प्रकाश पर्व ।।

अँधेरे आकाश के
स्तब्ध कैनवास पर
बनाया जाता है
प्रकाश पर्व का अविस्मरणीय उत्सव
बच्चों की नन्हीं हथेलियों से तैयार
पटाख़ों के जख़ीरे से

सितारों सज्जित अंतरिक्षी छाती पर
धरती से छूटते हैं ... बेधते हैं
चकाचौंधी पटाख़े
नभ में बनाते हैं   रोशनी की अल्पना

रंगीन रोशनी छिटकती है
पाँखुरी की तरह
पर पटाख़े गूँजते हैं    चीख बन कर

आकाशी आँखों में
पटाख़ी रंगी रोशनी
रचती है
प्रकाश का आनंद-सुख

पटाख़ों का
उठता हुआ उजला शोर
धरती पर खींच लाना चाहता है
स्वर्ग का सुख ...
धरती का हर्ष ...
दीपावली पर्व पर

लेकिन
कब से और क्यों
सभ्यता ने रच दी
अभिव्यक्ति के लिए
पटाख़ों की भाषा ?
ख़ुशी की ध्वनि के लिए
रंगीन बमों के शब्द
जो युद्ध और विध्वंस की भाषा है

शत्रुता की कहानी के लिए
तोप और बंदूक़ों की शब्दावली
मिसाइल का आक्रमण
चोरी छुपे गोलाबारी
विश्व और खाड़ी-युद्धी
इराक़ी, ईरानी, लिबीयाई, सीरियाई और पाकिस्तानी
धरती के विध्वंसक शोर का हदस जगाऊ
ऐतिहासिक इतिहास जिसमें बंद

क्या शब्द-यात्री मनीषियों की
हज़ारों वर्षों की
पीढ़ी-दर-पीढ़ी की
कई भाषाओं का शब्द-पोषण
अधूरा है

प्रेमानुभूति के लिए शराब 
सुखानंद के लिए झिलमिलाती रोशनी
नफ़रत और आनंद के लिए
विध्वंसघोषी बम समानार्थक
युद्धवंशक ध्वनियाँ
बन गईं हैं   हर्ष भाषा
सभ्यता का
यह कैसा फ़लसफ़ा है ?

दीपावली और नए वर्ष के
हर्ष-प्रदर्शन में
ख़ून की कमाई को
तब्दील करते हैं
बारूदी रोशनी में
और धमाके के शोर से
सुनाई देती है    विध्वंस की गूँज
कई जीवन की साँसें
और कई सपनों की बुझी हुई
स्याह राख हो जैसे वह

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

रविवार, 21 अगस्त 2016

।। अपने ही अंदर ।।

आदमी के भीतर
होती है    एक औरत
और
औरत के भीतर
होता है    एक आदमी ।

आदमी अपनी ज़िंदगी में
जीता है    कई औरतें
और
औरत ज़िंदगी भर
जीती है    अपने भीतर का आदमी ।

औरत
अपने पाँव में चलती है
अपने भीतरी आदमी की चाल
बहुत चुपचाप ।

आदमी अपने भीतर की औरत को
जीता है    दूसरी औरतों में
और
औरत जीती है
अपने भीतर के आदमी को
अपने ही अंदर ।

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

।। गर्भ की उतरन ।।

स्त्री
जीवन में उठाती है   इतने दुःख
कि 'माँ' होकर भी
नहीं महसूस कर पाती है
माँ 'होने' और 'बनने' तक का सुख

स्त्री
होती है   सिर्फ कैनवास
जिस पर
धीरे-धीरे मनुष्य रच रहा है
घिनौनी दुनिया
जैसे   स्त्री भी हो कोई
पृथ्वी का हिस्सा
मनुष्य से इतर

स्त्री
झेलती है    जीवन में
इतने अपमान
कि भूल जाती है    आत्म-सम्मान

स्त्री
अपने को धोती रहती है    सदैव
अपने ही आँसुओं से
जैसे   वह हो कोई
एक मैला-कुचैला कपड़ा
किसी स्त्री-देह के गर्भ की उतरन

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

बुधवार, 17 अगस्त 2016

।। झील का अनहद-नाद ।।

















कोमो झील की
तटवर्ती उपत्यकाओं में बसे गाँवों में
तेरहवीं शताब्दी से बसी हैं   इतिहास की बस्तियाँ
शताब्दी ढोतीं

प्राचीन चर्च के स्थापत्य में
बोलता है   धर्म का इतिहास
इतिहास की इमारतें
खोलती हैं   अतीत का रहस्य

सत्ता और धर्म के युद्ध का इतिहास
सोया है   आल्पस की
कोमो और लोगानो घाटी में
झूम रहा है   झील की लहरियों में
अतीत का युद्धपूर्ण इतिहास

वसंत और ग्रीष्म में
झील के तट में गमक उठते हैं
फूलों के रंगीले झुंड

रंगीन प्रकृति
झील के आईने में
देखती है   अपना झिलमिलाता
रंगीन सौंदर्य

झील का नीलाभी सौंदर्य
कि जैसे पिघल उठे हों
नीलम और पन्ना के पहाड़
प्रकृति के रसभरे आदेश से

झील के तटीले नगर-भीतर
टँगी हैं पत्थर की ऐतिहासिक घंटियाँ
पथरिया आल्पस के
सुदृढ़ता का राग
गाती हैं अनवरत   झील की तरंगे

तट से लगकर ही
सुना जा सकता है जिसका अनहद नाद
और जल के सौंदर्य में
बिना डूबे ही
पिया जा सकता है   जल को
जैसे आँखें जीती हैं
झील-सुख
बग़ैर झील में उतरे-उतराये

झील के दोनों पाटों के गाँव घर
अपनी जगमगाहट में मनाते हैं    रोज़
देव-दीपावली
जैसे काशी की कार्तिक पूर्णिमा
होती हो रोज़
झील के मनोरम अभिवादन में ।

 (नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

पुष्पिता का पहला उपन्यास 'छिन्नमूल'


विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित एक दर्जन से भी अधिक कविता-संग्रहों की रचयिता 
पुष्पिता अवस्थी का अभी हाल ही में पहला उपन्यास 
'छिन्नमूल' 
प्रकाशित होकर सामने आया है । अंतिका प्रकाशन द्धारा प्रकाशित 
'छिन्नमूल' सिर्फ पुष्पिता अवस्थी का ही पहला उपन्यास नहीं  है 
- बल्कि औपनिवेशिक दौर में बतौर गुलाम सूरीनाम गए 
भारतवंशी किसान-मजदूरों की संघर्षगाथा के साथ-साथ 
वहाँ की वर्तमान जीवन-दशा, रहन-सहन, रीति-रिवाज और 
सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को उद्घाटित करने वाला 
अपने ढंग का भी पहला उपन्यास है । 
अरसे तक सूरीनाम में रह चुकीं पुष्पिता अवस्थी ने 
जितने सारे डिटेल्स के साथ सूरीनाम के संपूर्ण जन-जीवन को 
दैनंदिन व्यवहारों और कार्य-कलापों के विवरण के साथ 
इस उपन्यास में समेटा है, वह इसको महाकाव्यात्मक विस्तार और ऊँचाई देता है । 
248 पृष्ठों में समायी 'छिन्नमूल' की मूल कथा में 
राजनीति, समाज, संस्कृति, इतिहास, धर्म और दर्शन 
अंतरगुंफित हैं । एक तरह से कहा जाए तो इस उपन्यास का 
नायक एक व्यक्ति न होकर पूरा सूरीनाम देश है । 
यूँ ललिता, रोहित, रिचर्ड, रोहित की माँ, गंगा, सुष्मिता आदि के अलावा 
कई ऐसे छोटे-छोटे चरित्र इसमें हैं जिनकी क्षणिक उपस्थिति भी 
अविस्मरणीय हो जाती है । ललिता के मार्फत तो 
इसके संपूर्ण आख्यान सामने आते ही हैं, 
सूरीनाम के बनने-बिगड़ने के दास्तान भी आगे बढ़ते हैं । 
धर्म की दुकानें वहाँ भी हैं और भारत की धर्मार्थ संस्थाओं के हस्तक्षेप भी 
- भले उसके रूप/स्वरूप अलग हों । 
उदारीकरण के तमाम दुष्प्रभावों के साथ-साथ 
औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष भी वहाँ दीखते हैं । 
इन तमाम बातों को इतने चाक्षुष और विश्वसनीय तरीक़े से 
'छिन्नमूल' की कथा में पिरोया गया है कि 
पाठक लगातार अपने आप को कथा भूमि के साथ महसूस करता है । 
 'छिन्नमूल' का कृतिकार के आत्मिक अनुभव और अनुभूति से 
इतना गहरा जुड़ाव प्रतीत होता है, 
जैसे उपन्यास की संपूर्ण कथा उनके देखे-भोगे सच का विवरण हो ।
पुष्पिता अवस्थी ने 'छिन्नमूल' को प्रसिद्ध कथाकार और 'पहल' संपादक 
ज्ञानरंजन को सादर समर्पित किया है । 
इसके आवरण पर सूरीनाम नदी के निकट 
पारामारिबो स्थित होटल तोरारिका की दीवार पर लगी 
म्यूरल पेंटिंग की छायाकृति को देखा जा सकता है ।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

कुछ छोटी कविताएँ

।। नाखून ।। 

आदमी 
धीरे-धीरे कुतरता है 
अपनी औरत को 
जैसे 
वह 
उसके ही हाथ का 
नाखून हो । 

।। जोंक ।। 

आदमी 
चूमते हुए चाटता है     औरत को 
जोंक की तरह 
बाहर से भीतर तक 

।। ताबूत ।। 

औरत की देह ही 
औरत का ताबूत है 
जिसे    वह 
जान पाती है 
उम्र ढलने के बाद 

जीवन भर 
एक ही यात्रा 
दैहिक ताबूत से 
भौतिक ताबूत तक 

।। ग्रेवयार्ड ।। 

एक ग्रेवयार्ड से 
गुज़रते हुए औरत 
सोचती है 
चलती हुई कारों के 
उस पार 
मृतकों का ग्रेवयार्ड है 
और 
इस पार 
चलते और चलाते मनुष्यों का 
ज़िंदा ग्रेवयार्ड 

।। आवाज़ ।। 

संपूर्ण देह को 
एक नया शब्द चाहिए 
आत्मा भी शामिल हो जिसमें 
और दिखाई दे 
जैसे देह में 
दिखाई देती हैं    आँखें 

देह 
आत्मा की ज़रूरत 
नहीं समझती है 

आत्मा का दुःख 
सिर्फ़ आत्मा जानती है 
और साँसों से कहती है 
सिर्फ़ ब्रह्माण्ड के लिए

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

शनिवार, 13 अगस्त 2016

।। साल्विनी ।।

माँ के सौंदर्य रस ने रची है
देह सरस
कि जैसे
नैसर्गिक सौंदर्य ने धारण की है देह
पुनः जीने के लिए

हृदय ने खोली है अपनी आँखें
तुम्हारी आँखों में
अधरों ने किया है धारण
संवेदनाओं का स्पंदन

सौंदर्य ने लिया है चित्रलिखित
अपरूप रूप
कि सौंदर्य-बूँद ने रची है
संपूर्ण देह

कि चंचलता भी लरजती है तुममें
तुमसे संभलकर
प्रेम भी उझकता है   दबे पाँव
चेहरे पर

जीवन की तरंगे भी सहेजती हैं तुम्हें
तुममें ही
सौंदर्य को साधने के लिए
कृत्रिम और आधुनिक हो चुके समय से
बचाने के लिए
कभी तुम्हारी 'माँ' की तरह
कभी तुम्हारे 'पिता' की तरह

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

।। अर्ना ।।

स्त्रीदेह धारी
आत्मा का नाम है ...

झिलमिलाती नीली आँखों में
दिखती है   आत्मा की
पारदर्शी स्थिर परछाईं
पूर्ण चाँद सरीखी ।

शब्दों में
गूँजती है   उसकी आत्मा की
अनोखी आवाज़

अर्ना की
स्त्री देह को
अचंचल बनाए हुए हैं
साधनारत आत्मा

चेहरे पर उसके
सधा हुआ है   आत्मा का सौंदर्य
कि पवित्र हो जाती है
दृष्टा की दृष्टि से अंतर्दृष्टि तक

अर्ना ने
रची है    अपनी आत्मा की भाषा
वह सुनती है    आत्मा की आवाज़

अर्ना
अपनी आत्मा की सहचर है
जानती है    आत्मा की शक्ति को
निज शक्ति में संचारित करना

वह जानती है    चुप्पी को सुनना
मौन को पढ़ना
अर्ना की आँखों में
रहती है    उसकी आत्मा
नील जलजीवी परी सरीखी
लख कर जिसे
पवित्र कर लेती है   दुनिया
अपने संस्कार

संपूर्ण देह में
तरंगित है    आत्मा
स्पर्श में उसके
अपना असर
छोड़ती है    आत्मा

नीदरलैंड   देश के
महारानी दिवस को जन्मी   अर्ना
ख़ुश है कि   इस दिन
पूरे देश में
रहता है अवकाश
और अवकाश को जीने की
उत्सवी आज़ादी

आत्मा की अलौकिक आभा के कारण
अर्ना की देह में चमकता है विलक्षण सौंदर्य
जिसके लिए तरसती हैं   विश्वसुंदियाँ और महारानियाँ तक

(नए प्रकाशित कविता संग्रह 'गर्भ की उतरन' से)

सोमवार, 8 अगस्त 2016

डॉक्टर रेवती रमण के मूल्यांकन के अनुसार पुष्पिता अवस्थी का 'भोजपत्र' शकुंतला का कमल-पत्र है

पुष्पिता अवस्थी ने पिछले दिनों ही प्रकाशित अपना एक कविता संग्रह 'भोजपत्र'
वरिष्ठ कवि शमशेर बहादुर सिंह की स्मृति को समर्पित किया है ।
समर्पण-संदेश में उन्होंने शमशेर को 
'प्रेम की अंतर्पर्तों के चितेरे' 
के रूप में रेखांकित किया है ।
अंतिका प्रकाशन द्धारा प्रकाशित 'भोजपत्र' के
समर्पण-संदेश में पुष्पिता ने अपनी एक कविता की
कुछेक पंक्तियों को भी प्रस्तुत किया है, जो इस प्रकार हैं :
'प्रणय-देह के भोजपत्र हैं
  मन
  मानस
   आत्मा
    देह
सृष्टि और ब्रह्मांड
समाया है इनमें प्रेम और प्रेम में समाये हैं ये'


'भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह में 174 पृष्ठों में पुष्पिता की 127 कविताएँ 
प्रकाशित हैं । दस पृष्ठों में डॉक्टर रेवती रमण ने इन कविताओं का 
वस्तुपरक मूल्यांकन किया है । संकलन का आवरण चित्र 
शशिकला देवी की रचना है । फ्लैप पर डॉक्टर रेवती रमण के
'अनुभूति का रजकण ही प्रणय है' शीर्षक मूल्यांकन आलेख का
एक महत्त्वपूर्ण अंश है, जो इस प्रकार है :
'भोजपत्र' की अधिसंख्य कविताएँ प्रेम करने और पाने की प्रक्रिया से उपलब्ध आनंद का इजहार है । कवयित्री अपने पाठकों को आश्वस्त कर पाती हैं कि जो लिखा है, महसूस करके लिखा है । प्रेम घटित हुआ है तो अनुभूति विलक्षण हुई है । औरों को भी होती होगी, पर उनके वश में भाषा नहीं होती । सच तो यह भी है कि एक स्त्री चाहे जिस सामाजिक संस्तर की हो, पुरुष की हक़ीक़त जानती है; जबकि एक पुरुष के लिए सभ्यता के आरंभ से ही वह रहस्य बनी रही है । भारतीयता के विशेष संदर्भ में उसका सौंदर्य लाज भरा सौंदर्य रहा है । कई बार तो उसका शील ही सौंदर्य होता है । प्रसंग यहाँ प्रणय का है - प्रेम, स्नेह, प्यार, प्रीत उसके भिन्न नाम हैं । पुष्पिता की कविता प्रेम-धुन है, प्रणय-मणि है । उसकी लिपि 'हृदय लिपि' है, पर विचार बुद्धि से रहित नहीं । यह बुद्धि-वैभव से संपन्न स्त्री के चैतन्य का उल्लास है । इसमें हद बेहद का भाव-भेद निराकार हुआ है । बल्कि, कहना चाहिए कि पुष्पिता जीवन और जिजीविषा के लिए कोई हद मानती ही नहीं हैं । सच्ची और संपूर्ण प्रेमानुभूति आदमी को जैसे सूफी बना देती है, पुष्पिता प्रेम को 'बेगमपुरा' की अवधारणा में ढाल देती हैं । प्रेम में हर तरह का अभाव स्व-भाव बन गया है । प्रेमानुभूति का ऐसा प्रशस्त प्रांगण उन्होंने अपने अनुसंधान और यायावरी से संभव किया है । संप्रति, मैं ऐसी दूसरी कवयित्री को नहीं जानता जो इतने सरल, सहज ढंग से काया और मन को उजागर कर सके । अभिव्यक्ति में कहीं स्थूल का समावेश नहीं । उन्होंने जातीय कविता के गहन अध्ययन से बिंबों और प्रतीकों के प्रयोग में महारत हासिल की है । कोई चाहे तो मीरा, महादेवी, आन्दाल और ललद्यद को प्रसंगवश, याद कर सकता है । पुष्पिता का 'भोजपत्र' शकुंतला का कमल-पत्र है । उसमें वही कोमलता और दीप्ति है जो कालिदास का वाग्वैभव है । लेकिन इन कविताओं को पढ़ते हुए हमें चण्डीदास याद आते हैं, जयदेव और विद्यापति भी ।

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

पुष्पिता अवस्थी की उपस्थिति के कारण अंतरराष्ट्रीय चीज़ महोत्सव का उद्घाटन कार्यक्रम हिंदी साहित्य संसार के लिए भी एक उल्लेखनीय अवसर बना

प्रख्यात हिंदी कवयित्री पुष्पिता अवस्थी की मौजूदगी ने 
उत्तरी हॉलैंड के प्राचीन शहर अलकमार के सिटी सेंटर में नहर के तट पर स्थित 
चीज़ संग्रहालय में आयोजित हुए ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय चीज़ महोत्सव के 
उद्घाटन कार्यक्रम को एक अलग तरह की गरिमा व भावनात्मक संलग्नता प्रदान की । 
यह उद्घाटन कार्यक्रम के आयोजकों की व्यापक संवेदनशील सोच का भी 
सुबूत है कि उन्होंने एक व्यावसायिक पहचान वाले कार्यक्रम में 
एक लेखक - वह भी एक कवि की मौजूदगी को सुनिश्चित किया । 
हॉलैंड के महत्त्वपूर्ण लेखकों, गायकों, पेंटरों, अभिनेताओं, खिलाड़ियों व 
प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति में - 
अलकमार के मेयर पित ओखेन ब्राउन तथा उनकी पत्नी ऐली के नेतृत्व में 
हॉलैंड में भारत के राजदूत जेएस मुकुल द्धारा अपनी पत्नी मीता के साथ मिलकर 
उद्घाटित किया गया यह कार्यक्रम 
पुष्पिता अवस्थी की उपस्थिति के कारण 
हिंदी साहित्य संसार के लिए भी एक उल्लेखनीय अवसर बन गया । उल्लेखनीय है कि 'चीज़' ने हॉलैंड को दुनिया में एक विशेष पहचान दी हुई है । 
 पूरी दुनिया में हॉलैंड की चीज़ की अपनी अविस्मरणीय स्वाद अस्मिता है 
जिसे डच भाषा में 'कास' कहते हैं । अलकमार स्थित चीज़ संग्रहालय के 
सामने के विशाल प्रांगण में प्रत्येक वर्ष चीज़ का बाजार लगता है, 
जिसमें दुनिया भर के अनुभवी व पारखी लोग बोली लगा कर 
चीज़ का दाम तय करते हैं । यह चीज़ संग्रहालय 1597 से 1599 के बीच 
बनकर तैयार हुआ था, जिसमें चीज़ बनाये जाने के उपकरणों की 
ऐतिहासिक तस्वीरें और चीज़ निर्माण से जुड़े तमाम दस्तावेज़ हैं । 
यहाँ चीज़ पर बनी फ़िल्में और स्लाइड-शो देखने/दिखाने का भी प्रावधान है । 
प्रत्येक वर्ष यहाँ होने वाले चीज़ महोत्सव का इंतज़ार 
दुनिया के बड़े चीज़ निर्माताओं व कारोबारियों को होता है । इस वर्ष का चीज़ महोत्सव इसलिए और उल्लेखनीय बन गया 
क्योंकि इसमें पहली बार किसी कवि - 
और वह भी पुष्पिता अवस्थी जैसी प्रख्यात व प्रतिष्ठित हिंदी कवि की 
उपस्थिति में इस महोत्सव का उद्घाटन हुआ । 
कार्यक्रम के कुछेक दृश्य इन तस्वीरों में देखे जा सकते हैं :






मंगलवार, 2 अगस्त 2016

।। 'धी' हो तुम ।।

कवि ने
लख लिया है    तुम्हें
जैसे  अलख निरंजन को
लखता है   वह

कवि ने
ध्वनि विस्फोट में तुम्हारे
सुन लिया है तुम्हें   जैसे
बादलों की भीतरिया
मेघदूती अनुगूँज हो तुम !

तुम्हारी आवाज़
खिले हुए फूल की तरह है
प्रस्फुटित
और सुवासित

भाषा की
मात्र दुभाषिया ही नहीं
वरण
भाष्यशिल्पी हो
खजुराहो के शिल्पियों की तरह
हिंदी काव्यभाषा का
करती हो    सहज देहांतरण
रूसी भाषा में

निजभाषा की
प्राणरक्षक 'माँ' होकर
गाँठती हो   रिश्ता
सांस्कृतिक भाषा परिवार से
अन्य भाषाओं के
सृजन की सर्जक
संवेदनाओं के रूपांतरण में प्रवीण

अपनी मेधा से
पिलाती हुई   शब्दों को अर्थ

सुनते हुए
देखती हो
पढ़ते हुए
समझती हो
अपने मौन में भी
बोलती हो
सच्चे अर्थों में
'धी' हो तुम
अनास्तासिया गुरिया