संदेश

December, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तीन छोटी कविताएँ

चित्र
।। सूत्र ।।

प्रेम में हम जनमते हैं      जीवन
और जीवन में हम
जानते हैं अथाह अछोर अनंत-प्रेम
।। देह की पृथ्वी में ।।
वह रचाती है      ह्रदय में प्रेम का अथाह महासागर अनाम और अलौकिक पृथ्वी के महासागरों से इतर मन की देह की पृथ्वी का महासागर
।। अनश्वर ।।
प्रिय का हर शब्द प्रेम की वंशावली है
देह अनश्वर है जीवित रहती है    आत्मा की देह में    देह प्रेम की तरह
('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से) 

।। ध्वनि-गुंजन ।।

चित्र
अनन्य अनुराग में उन्मत्त अविचल थिरकती उपासना के कानन में करती है     उपवास
साँसों से जपते हुए आँसुओं का चढ़ाती है     अर्ध्य ताप में तपकर होती है सजल     उजल
ऐसे में निर्मल शब्द देह में पहुँच कर घुल जाते हैं      रक्त में बन जाते हैं      देह की नेह पहचान
विदेह हुई देह में होती है     मात्र प्रणय देह
बहुत चुपचाप व्याकुल चित्त में गूँथती है    शब्दों की परछाईं साँसों में सिहरन धड़कनों में ध्वनि-स्पंदन सब पर्याय हैं     प्रेम में                       सिद्ध साधना के                       मूल मंत्र
('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। कौंध-गूँज ।।

चित्र
अंतस में चट्टान हो चुकी समय की पर्तें चटकती रहती हैं      जब-तब वजूद के कुछ शब्द अधरों पर लेते हैं      अपना आकार
वर्षों बाद देह ने ध्वनित होते सुना    स्वयं को    स्वयं में आँखें पहचान सकीं अपने आँसुओं का नमक और पानी अधरों में हुई     बाँसुरी-सी सुगंधित सिहरन और पकी फसल की तरह हम दोनों ने लिया        एक-दूसरे का नाम
तैयार की निज की हथेलियाँ हथेलियों को भरने के लिए चित्त की गंध उतरने लगी थी चेतना में मन के बीजण लौट आए    फिर से भीतर से बाहर तक तुम्हारी आकांक्षाओं की अनथकी आहटें तुम्हारे धैर्य के कुछ अनिवार्य शब्द प्रार्थना से संयुक्त हो गूँजते हैं       आत्मा में
हृदय की मंजुषा में सुरक्षित स्पर्श की हथेलियों का स्पंदन अनुभूतियों के नए रेखा-चित्र आकुल धड़कनों की धुन में गाते हैं       नई लय जो बजते ही रहते हैं निरंतर
('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

।। प्रिय की हथेली ।।

चित्र
समय की धार उतारती हैं उँगलियों से नाखून और याद आती है तुम्हारी हथेली की पृथ्वी जो मेरे कटे हुए नाखूनों को भी अपनी मुट्ठी की मंजूषा में सहेज रखना चाहती थी
तुम्हारी हथेली की अनुपस्थिति में पृथ्वी छोटी लगती है जहाँ मेरे टूटे नाखून को रखने की जगह नहीं बची न ओंठों के शब्द और न आँखों का प्यार
जिन हथेलियों में सकेल लिया करती थी भरा-पूरा दिन एकांत रातें बची हैं      उनमें करुण-बेचैनी सपनों की सिहरनें समुद्री मन की सरहदों का शोर
तुम्हारी आँखों में सोकर आँखें देखती थीं भविष्य के उन्मादक स्वप्न तुम्हारे वक्ष में सिमटकर अपने लिए सुनी है समय की धड़कनें जो हैं सपनों की मृत्यु के विरुद्ध
('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)