गुरुवार, 19 जनवरी 2017

दो कविताएँ

।। एकात्म अवस्था ।।

देह अंतरिक्ष के नक्षत्र हैं
नयन और अधर
सूर्य और चन्द

देह में देह का
लीन हो जाना
और फिर विलीन
विदेह प्रणय की
एकात्म अवस्था

।। स्मृति-भवन ।।

शब्दों से परे जाकर
रचे जाते हैं     शब्द
प्रेम में

संप्रेषण की सरस भाषा
प्रेम से परे जाकर रचती है
प्रेम

बह सकें जिसमें
बाधाओं के पाषाण-खंड
और बनाये 'घर'
जो मृत्यु के बाद भी
शेष रहे
स्मृति-भवन स्वरूप

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

तीन कविताएँ

।। ओढ़नी की रंगीनियाँ ।।

वह
पहनता है     मेरी आँखें
अपने चश्में की तरह

वह
धारण करता है     मेरा समय
अपनी घड़ी की तरह

वह
सुनता है        मेरे ही शब्द
अपनी आवाज में

वह
देखता है         अपने सपनों में
मेरी ओढ़नी की ही रंगीनियाँ
प्रेम में

।। सुंदरतम रहस्य ।।

ख़ुद को
छोड़ दिया है      मुझमें
जैसे      शब्दों में
छूट जाता है     इतिहास

सपनों की कोमलता
आकार लेने लगती है      सच्चाई में
अनुराग का रंग
उतरने लगता है      देह में
पलकों में लरजने लगते हैं
ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य

आँखें       ओंठों की तरह
मुस्कुराने लगती हैं
सिर्फ़, तुम्हें सोचने भर से

।। विश्वास के पर्याय ।।

बहुत चुपचाप
व्याकुल चित्त में
गूँथती है     शब्दों की परछाईं
साँसों में      सुगंध
धड़कनों में       आवाज़
सब पर्याय हैं       प्रेम में
स्पर्श के लिए

तृषा के क्षणों में
उसे सिर्फ़ 'प्रेम चाहिए'
जैसे       प्रकृति को वसंत

अपने सिरहाने
रखती है        प्रिय के शब्द
विश्वास के पर्याय

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

रविवार, 1 जनवरी 2017

दो कविताएँ























।। सौंपने के लिए ।।

मन के भोजपत्र पर
अदृश्य भाषा में
स्पर्श लिखता है
प्रणय का अमिट महाकाव्य
कि पूरी देह छूट जाती है
प्रिय-देह में
विदेह होने के लिए

पृथ्वी का विलक्षण प्रेम
उमड़ आता है
भीतर-ही-भीतर
तुम्हारे होने पर
कि सृष्टि का संपूर्ण अमूर्त सौंदर्य
मूर्त हो उठता है
हृदय की अँजुली में
तुम्हें सौंपने के लिए

।। नदी की गहराई ।।

अपनी
स्मृतियों में
तुम्हारे प्रतिबिम्ब के
उझकते ही
मैं
नदी हो जाती हूँ

प्रवाहित होने लगता है
मुझमें जीवन
तुम्हारी बाँहों के
दोनों तटों के बीच
मैं उठने लगती हूँ
अपनी देह की सतह से
नदी की गहराई की तरह

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)