शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

तीन कविताएँ

।। ओढ़नी की रंगीनियाँ ।।

वह
पहनता है     मेरी आँखें
अपने चश्में की तरह

वह
धारण करता है     मेरा समय
अपनी घड़ी की तरह

वह
सुनता है        मेरे ही शब्द
अपनी आवाज में

वह
देखता है         अपने सपनों में
मेरी ओढ़नी की ही रंगीनियाँ
प्रेम में

।। सुंदरतम रहस्य ।।

ख़ुद को
छोड़ दिया है      मुझमें
जैसे      शब्दों में
छूट जाता है     इतिहास

सपनों की कोमलता
आकार लेने लगती है      सच्चाई में
अनुराग का रंग
उतरने लगता है      देह में
पलकों में लरजने लगते हैं
ऋतुओं के सुंदरतम रहस्य

आँखें       ओंठों की तरह
मुस्कुराने लगती हैं
सिर्फ़, तुम्हें सोचने भर से

।। विश्वास के पर्याय ।।

बहुत चुपचाप
व्याकुल चित्त में
गूँथती है     शब्दों की परछाईं
साँसों में      सुगंध
धड़कनों में       आवाज़
सब पर्याय हैं       प्रेम में
स्पर्श के लिए

तृषा के क्षणों में
उसे सिर्फ़ 'प्रेम चाहिए'
जैसे       प्रकृति को वसंत

अपने सिरहाने
रखती है        प्रिय के शब्द
विश्वास के पर्याय

('भोजपत्र' शीर्षक कविता संग्रह से)

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