सोमवार, 24 जुलाई 2017

।। स्मृतियों का स्पर्श ।।

'अकेलापन' पतझर की तरह
उड़ता फड़फड़ाता है ।

तुम्हारी तस्वीर से
उतरता है स्मृतियों का स्पर्श
देह मुलायम होने लगती है
तुम्हारी चाहत की तरह

तुम्हारे शब्द
सपनों की आँख हैं 
जिससे रचती हूँ भविष्य  

तुम्हारी हथेलियों ने
मेरी हथेली में
छोड़ा है    भावी रेखाओं का छापा
जैसे मेरे हृदय ने
तुम्हारे हृदय ने
छोड़ा है     अपनेपन का विस्मरणीय स्मृति चित्र
कि तुम्हारे प्राणों में मैं
अपने पूर्ण को देखती हूँ

तुम्हारी साँसों से
लेना चाहती हूँ     साँसों की शक्ति
जिससे मेरे भीतर
तुम्हारे सपने जी सकें
वैसे ही       जैसे चाहत से
गर्भ में मुझसे साँस ले रहा है शिशु

तुम्हारे नाम को
लिख रहा है
मेरे गर्भ की दीवारों में
और रक्त में सान रहा है
तुम्हारे बीज का रस सुगंध
जो प्रणय का प्रथम प्राण बीज है
तुम्हारे नाम का
मेरी देह भूमि को
मातृभूमि में तब्दील करते हुए ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

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