गुरुवार, 17 अगस्त 2017

।। प्रतीक्षा के स्वप्न बीज ।।
















प्रतीक्षा में
बोए हैं  स्वप्न बीज
उड़ते समेल के फाहों को
मुट्ठी में समेटा है
विरोधी हवाओं के बीच

प्रतीक्षा में
मन के आँसुओं ने धोई है
मन की चौखट
और आँखों ने प्राणवायु से
सुखाई है जमीन

अधरों ने
शब्दों से बनाई है   अल्पना
और धड़कनों ने
प्रतीक्षा की लय में
गाए हैं     बिलकुल नए गीत

प्रतीक्षा में
होती हैं    आहटें
पाँवों की परछाईं
हथेलियों की गुहारती पुकार
आँखों के आले में
प्रिय के आने का उजाला समाने लगता है
और एक सूर्य-लोक
खिल उठता है

प्रतीक्षा के सन्नाटे में
कौंधती है
आगमन अनुगूँज
और शून्यता में
तिर आती हैं
पिघली हुईं
तरल आत्मीयता की लहरें
कि समाने लगता है
अपने भीतर
स्मृतियों की परछाईं का
अमिट संसार
आँखों में
साँसों में
पसीज आई हथेली में

आँखों की पृथ्वी पर
होती हैं     तुम्हारी मन ऋतुएँ
नक्षत्र से निरखते हैं
तुम्हारे नयन निष्पलक

चुपचाप परखती हैं     आँखें
अलौकिक प्रभालोक
तुम्हारे प्रणय का
अक्षय आकाँक्षा वलय ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

बुधवार, 16 अगस्त 2017

।। वियोग सुख ।।

तुमसे
छुपाकर जीती हूँ
तुम्हारा वियोग

आवाज में ही
दबा ले जाती हूँ रुलाई
लिखने से पहले
शब्दों से खींच लेती हूँ
बिछोह की पीड़ा

तुम तक
पहुँचने वाले
सूर्य और चंद्र में
चमकने देती हूँ
चूमा हुआ प्रेम

बिछोह के दर्द को
घोलती हूँ
रक्त भीतर
कि आँख में
जन्म न लें आँसू

ओठों की तड़प को
अपनी ही
उँगलियों से
मसलती रहती हूँ
बेबसी के दारुण क्षणों में
फिर भी
ओंठ सिसकते ही रहते हैं
साँस की तरह
अपने प्रेम के बिछोह में

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह  से)

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

।। धुन ।।
















घर में तुम
घर की तरह बचे हो
मुझमें      मेरी तरह

तुम्हारे जाते हुए
पाँवों को
नहीं रोक सके
आँख के आँसू
पर, तुम्हारी परछाईं
बनी है मुझसे
तुम्हारे साथ
तुम्हारी खामोशी में
समाया है      मेरा मौन
जैसे    तुम्हारे शब्दों में
मेरे शब्द
तुम्हारी आवाज में
मेरी धुन

तुम्हारे जूतों को
तुम्हारे पाँव के बिना
रहने की आदत नहीं
पर पाँव भीतर
होने पर भी
उनका 'जी' नहीं भरता है
तुम्हारी प्रतीक्षा में
सिकुड़ रहे हैं
हमकदम होने के लिए

तुम्हारी कंघी को
फिरा लेती हूँ अपने केशों में
तुम्हारी सहलाती
उँगलियाँ हैं       वे

तुमसे उतरे हुए कपड़े
रहते हैं मेरे सिरहाने
तुम्हारी अनुपस्थिति को
भरती हूँ तुम्हारी सुगंध के वक्ष से
जिस पर मेरा सिर
महसूसता है तुम्हें
और सुगंध से
मिलता है रास्ता
तुम तक पहुँचने के लिए
घनेरी रात में

तुम्हारी छोड़ी हुई
हर चीज को
छूती हूँ
कि जैसे अपने
स्पर्श में से
बचे हो तुम
हर वस्तु में
कि
तुम्हारे देखे गए
आईने में आदमकद
देखती हूँ खुद को
अहल्या की तरह
पुनर्प्राणार्जित
मेरी साँसों में
चलती है तुम्हारी साँस
जैसे     तुम्हारे जीवन में
मेरा जीवन ।
 
('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

गुरुवार, 10 अगस्त 2017

।। देह-विदेह ।।
















दो गोलार्द्धों में
बाँट दिए जाने के बावजूद
पृथ्वी
भीतर से कभी
दो ध्रुव नहीं होती
मेरी तुम्हारी तरह

तुम्हारी साँसें
हवा बनकर
हिस्सा होती हैं
मेरे बाहर और भीतर की प्रकृति
तुमसे सृष्टि बनती है ।

तुम्हारा होना
मेरे लिए रोशनी है ।
तुम्हारा वक्ष
धरती बनकर है
मेरे पास

तुम्हारे होने से
पूरी पृथ्वी मेरी अपनी है
घर की तरह
चिड़ियों की चहक में
तुम्हारे ही शब्द हैं
मेरी मुक्ति के लिए

मुक्ति के बिना
शब्द भी गले नहीं मिलते हैं
मुक्ति के बिना
सपने भी आँखों के घर में
नहीं बसते हैं ।

मुक्ति के बिना
प्रकृति का राग भी
चेतना का संगीत नहीं बनता है ।
मुक्ति के बिना
आत्मा नहीं समझ पाती है
प्रेम की भाषा

मुक्ति के बिना
सब कुछ देह तक सीमित रहता है
मुक्ति में ही होती है देह   विदेह ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

बुधवार, 9 अगस्त 2017

।। एकांत रातें ।।

समय की
हवाओं की धार
उतारती हैं उँगलियों से नाखून
और याद आती है
तुम्हारी हथेली की पृथ्वी
जो मेरे कटे हुए नाखूनों को भी
अपनी मुट्ठी की मंजूषा में
सहेज रखना चाहती थी

तुम्हारी हथेली की
अनुपस्थिति में
पृथ्वी छोटी लगती है
बहुत छोटी
जहाँ मेरे टूटे नाखून को
रखने की जगह नहीं है
न ओठों के शब्द
और न आँखों का प्यार

जिन हथेलियों में
सकेल लिया करती थी
भरा-पूरा दिन
एकांत रातें
बची हैं   उनमें
करुण बेचैनी
सपनों की सिहरनें
समुद्री मन की सरहदों का शोर

तुम्हारी आँखों में सोकर
आँखें देखती थीं
भविष्य के उन्मादक स्वप्न
तुम्हारे वक्ष में सिमटकर
अपने लिए सुनी है
समय की धड़कनें
जो हैं
सपनों की मृत्यु के विरुद्ध ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

।। अनोखे शब्द ।।

समुद्र-पार की उड़ान से पहुँचा है
भारी हैं     उसके पंख
अलौकिक है     प्रेम
जो समर्पित होता है
समुद्री दूरी के बावजूद
प्रतीक्षित और विरल
जीवन-स्पर्श के लिए

तुम्हारे-अपने संबंधों के लिए
रची है मैंने
एक अनूठी भाषा
जिसके शब्द
रातों की तनहाई
और नींदों के सपनों से बने हैं

खुली आँखों में
सपनों का घर है
आँखों के पाँव
पहचानते हैं हृदय का रास्ता
काँच हुई देह पर
गिरते हैं     ओठों के बूँद-शब्द

पिघलता है     रंगों का सौंदर्य
अकेलेपन की आग में
स्मृतियों की गीली रेत पर
चलती हैं      अधीर आकांक्षाएँ

अभिलाषाएँ
वेनेजुएला के राष्ट्रीय पुष्प-वृक्ष
'ग्रीन हार्ट' का पर्याय नहीं है
जो सिर्फ एक दिन के लिए
हवाओं में खिलता है
अपनी साँसों में
और जीता है जीवन सौंदर्य-बोध के लिए

तुम्हारा     अपना प्रेम
अलौकिक प्रणय-नदी का
लौकिक तट
तटबंध हैं         मैं और तुम

पूर्णिमा का सौंदर्यबोधी चाँद
मन भीतर पिघलकर
रुपहला समुद्र बनकर
समा जाता है
आँखों की पृथ्वी में
अपनी जगह बनाते हुए
महासागर की तरह

चमक चाँदनी के रुपहले डोरों से
मन बुनता है      सारी रात
अपने लिए        सुहाग-चूनर
तुम्हारे लिए        सुहाग-साफा

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)