बुधवार, 9 अगस्त 2017

।। एकांत रातें ।।

समय की
हवाओं की धार
उतारती हैं उँगलियों से नाखून
और याद आती है
तुम्हारी हथेली की पृथ्वी
जो मेरे कटे हुए नाखूनों को भी
अपनी मुट्ठी की मंजूषा में
सहेज रखना चाहती थी

तुम्हारी हथेली की
अनुपस्थिति में
पृथ्वी छोटी लगती है
बहुत छोटी
जहाँ मेरे टूटे नाखून को
रखने की जगह नहीं है
न ओठों के शब्द
और न आँखों का प्यार

जिन हथेलियों में
सकेल लिया करती थी
भरा-पूरा दिन
एकांत रातें
बची हैं   उनमें
करुण बेचैनी
सपनों की सिहरनें
समुद्री मन की सरहदों का शोर

तुम्हारी आँखों में सोकर
आँखें देखती थीं
भविष्य के उन्मादक स्वप्न
तुम्हारे वक्ष में सिमटकर
अपने लिए सुनी है
समय की धड़कनें
जो हैं
सपनों की मृत्यु के विरुद्ध ।

('रस गगन गुफा में अझर झरै' शीर्षक कविता संग्रह से)

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